सांकेतिक तस्वीर
टीम डायरी
मैल निकालने के लिए रुई वाली डंडी अगर कान में डालते हैं तो सावधान हो जाइए। ऐसा एक जाने-माने चिकित्सक कह रहे हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) से प्रशिक्षित डॉक्टर सोरभ सेठी का दावा है कि रुई वाली डंडी, जिसे क्यू टिप या कॉटन बड्स भी कहते हैं, कानों को 70 प्रतिशत तक नुकसान पहुँचा सकती है। उन्होंने इस बाबत सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी जारी किया है।
इस वीडियो में डॉक्टर सेठी ने बताया है कि शरीर के अन्य हिस्सों की तरह हमारे कान भी अपनी सफाई और अपना सुधार करना जानते हैं। यह प्रक्रिया प्राकृतिक रूप से चलती रहती है। इसीलिए अक्सर कानों से मैल अपने आप बाहर निकल आता है। उसे यूँ ही बाहर फेंका जा सकता है। उसके लिए रुई वाली डंडी कान में डालने की जरूरत नहीं होती। लेकिन अक्सर होता यह है कि जब भी अतिरिक्त मैल कान से बाहर आता है, तो हमें लगता है कि उसकी मात्रा कुछ ज्यादा ही हो गई है। इसके बाद हम रुई वाली डंडी या ऐसे ही किसी अन्य तरीके से कान का मैल पूरा का पूरा साफ करने की कोशिश करने लगते हैं।
डॉक्टर सेठी के मुताबिक, मैल साफ करने की कोशिश में जब हम रूई वाली डंडी को कान की गहराई में ले जाते हैं तो उसका उल्टा असर होता है। मैल निकलता कम है, भीतर अधिक धँस जाता है। इस तरह कई बार में उसकी परत-दर-परत जमा होती जाती है और हमारी सुनने की क्षमता कम होती जाती है। कई बार तो कान के पर्दे को भी नुकसान हो जाता है, जो और घातक है।
डॉक्टर सेठी का दावा है कि कानों में 70 प्रतिशत तक नुकसान रुई वाली डंडी की वजह से ही होता है। जबकि उसके उपयोग की कोई जरूरत ही नहीं होती। प्राकृतिक प्रक्रिया से कान अतिरिक्त मैल खुद बाहर निकाल देते हैं और जो रह जाता है उसका होना बाहरी संक्रमण, आदि से कानों की सुरक्षा के लिए जरूरी होता है। अपनी इस चेतावनी के साथ वे अपील करते हैं कि इस जानकारी को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाया जाना चाहिए। ताकि लोगों को बेवजह के नुकसान से बचाया जा सकें।
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