सांकेतिक तस्वीर
टीम डायरी
सप्ताह में तीन-चार दिन भी अगर ‘बाल दिवस’ मना लिया जाए, तो जीवन में कभी ‘मधुमेह दिवस’ यानि ‘डाइबिटीज डे’ मनाने की नौबत नहीं आएगी। मजाक मत समझिए, सच्चाई है यह और दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉक्टर अजय अग्रवाल की बातों का निचोड़ भी।
देखिए, ‘बाल दिवस’ क्यों मनाया जाता है? बच्चों के बचपन को समारोहपूर्वक मनाने के लिए न। ऐसे ही ‘मधुमेह दिवस’ क्यों मनाते हैं? ताकि लोग इस बीमारी के प्रति जागरूक हों, और सचेत रहें, सुरक्षित रहें। अभी 14 नवम्बर को ये दोनों ही दिवस एक साथ आए और इसी मौके पर डॉक्टर अग्रवाल ने दोनों आयोजनों का सन्दर्भ-प्रसंग एक साथ जोड़कर बढ़िया ‘रोचक-सोचक’ सन्देश दिया, जो ‘सरोकार’ भरा भी है।
उनके मुताबिक, मधुमेह या डाइबिटीज कोई ऐसी बीमारी नहीं, जिसका बोझ सिर पर लेकर हम घूमते रहें और सामान्य जीवन ही न जी पाएँ। यह बीमारी अपनी जीवनचर्या को फिर व्यवस्थित करने का वास्तव में एक अवसर है। इसके लिए करना क्या है? ‘बाल दिवस’ मनाना है। मतलब बचपन का उत्सव मनाना है। बच्चों की तरह हँसना है। उन्हीं के जैसे शारीरिक रूप से सक्रिय रहना है, खूब दौड़-धूप करनी है। भूख लगे, तभी खाना है। जितनी भूख लगे, उतना ही खाना है। रात को जल्दी सोना है, सुबह जल्दी उठ जाना है। जब हँसने का मौका आए तो बच्चों की तरह खिलखिलाकर हँसना है और जब दुखी हों तो उन्हीं तरह, बिना लाज-शरम के रो लेना है।
डॉक्टर साहब की मानें तो अगर हम सप्ताह में इस तरह तीन-चार दिन भी बेझिझक अपने ‘बचपन का उत्सव’ मनाते रहें, तो सिर्फ मधुमेह से ही नहीं, तनाव-अवसाद जैसी बीमारियों से भी दूर रह सकते हैं। हमारे दिल और दिमाग पर बोझ कम पड़ेगा तो वे भी स्वस्थ रहेंगे और दिल का दौरा पड़ने या मस्तिष्क आधात (ब्रेन स्ट्रोक), जैसी बीमारियों से भी बचेंगे। तो कहिए, है न ‘बाल दिवस’ मनाने के फायदे ही फायदे?
फिर सोच क्या रहे हैं? मनाइए आज से ही…, ‘बाल दिवस’…, और स्वस्थ रहिए, प्रसन्न रहिए।
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