टीम डायरी
देश की शिक्षा-प्रणाली पर सवाल उठते रहे हैं। अब भी उठ रहे हैं। लेकिन ऐसा शायद पहली बार ही है जब किसी ने युवाओं को 12वीं के बाद पढ़ाई बंद कर देने का सुझाव दिया हो। वह भी इस आधार पर कि उच्च शिक्षा की प्रणाली तो स्कूल स्तर की व्यवस्था से भी खराब है। उससे किसी को रोजगार या व्यवसाय में अधिक लाभ नहीं मिल सकता। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वाकई ऐसा ही है?
दरअसल एक कारोबारी हैं सौरभ मुखर्जी। मार्सलस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स नाम की कम्पनी के स्ंस्थापक हैं। उनका कहना है, “भारत की शिक्षा प्रणाली अब भी रट्टा मार पद्धति पर आधारित है। विद्यालय के स्तर पर ही नहीं, महाविद्यालयों की परीक्षाओं में भी इस पद्धति से बच्चे परीक्षाएँ पास करते हैं। इसी कारण स्नातक करने वाले 100 बच्चों में सिर्फ 3 ही ऐसे होते हैं, जिन्हें ठीक-ठाक नौकरी मिल सके। जबकि जो बच्चे महाविद्यालय नहीं जाते, 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ किसी काम में लग जाते हैं, उनमें से लगभग 30-40 प्रतिशत बच्चे अच्छी खासी कमाई कर लेते हैं, बढ़िया रोजगार पा लेते हैं। इसलिए बेहतर है कि महाविद्यालय स्तर की पढ़ाई की ही न जाए।”
मुखर्जी के अनुसार, “महाविद्यालयों में बच्चों को रोजगार या कमाई का कौशल नहीं सिखाए जाते। बल्कि रट्टा मार कर निर्धारित पाठ्यक्रम की परीक्षा पास करने पर ही पूरा ध्यान दिया जाता है। इसी कारण भारत में अब तक अपने कार्यक्षेत्र में कुशल और दक्ष काम कामगारों की कमी बनी हुई है।” उन्होंने मुम्बई का एक उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि वहाँ वातानुकूलित कमरों में बैठकर नक्शे, योजनाएँ वगैरा बनाने वाले पढ़े-लिखे लोगों से ज्यादा तो सामान्य मजदूर कमा लेता है। जेसीबी मशीनों जैसे उपकरण चलाने वाले और अधिक कमाते हैं। तो ऐसी पढ़ाई का फायदा क्या? मुखर्जी की इन बातों पर दो राय हो सकती है। पर क्या ये खारिज करने लायक हैं?
