लगता है, हम सब एक टाइटैनिक में इस समय सवार हैं और जहाज डूब रहा है

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 22/5/2021

यहाँ आसमान में कड़क बिजलियाँ चमक रही है। बादलों की गड़गड़ाहट में किसी की आवाज सुनाई नहीं देती। बरसात की बूंदें बड़े ओलों के रूप में गिर रही हैं। 

खेतों में गेहूँ कटा पड़ा है। चना मुस्तैदी से खड़ा है। सेम से लेकर बाकी सब्जियाँ झूम रही हैं। लेकिन काले बादल देखकर किसान की आँखें रो रही हैं। वह खेत मे बिजूका बनकर रह गया है, बस।

उसकी प्रार्थनाएँ ईश्वर,अल्लाह तक नही पहुँच रहीं। क्षत-विक्षत आत्मा को वह धिक्कार रहा है। मानसून में अतिवर्षा ने उसकी मक्का, धान, सोयाबीन की फसल को खराब कर दिया था। अब चार माह जी-तोड़ मेहनत से गेहूँ के सुनहरे गोशे जवान किए थे। चनों में दूध आ ही रहा था कि इस बरसात ने सब बर्बाद कर दिया। 

दूसरी ओर सम्पूर्ण धरा पर हाहाकार मचा हुआ है। एक छोटे से जीव ने सम्पूर्ण विकास और जन्तु जगत की सबसे विकसित कौम यानि मनुष्य को ही अपने पंजे में जकड़ लिया है। हर ओर से चीत्कार, चीखें और बेबसी के स्वर सुनाई दे रहे हैं। 

हमने ही किया है यह ध्वंस और दोहन। इतना मथा धरती, जल, अग्नि, वायु और आसमान को कि सबकुछ छीन लिया। अपनी महत्वकांक्षा बुझाने के लिए, छीज दिया सबकुछ और अब जब क्रूर प्रतिफ़ल मिल रहे हैं तो आँसू कम पड़ गए हैं, इस दानावल में। 

मैं देख रहा हूँ, खूब बोलता हूँ, खूब सोचता हूँ, खूब विरोध और दुर्भाव भी सहता हूँ। पर सच कहने और बोलने से चूकता नही हूँ। अपने एकांत में भी हरदम यही एकालाप चलता रहता है। कल्याण शब्द और वसुधा, आसमान, अग्नि या वायु को नही जानता पर लगता है कि बस अपने आसपास को ठीक रख सकूँ। दो लोगों के लिए भी इस धरा को सुन्दर बना सकूँ, तो शायद कुछ कर पाने और मनुष्य जीवन जीने का श्राप पूरा हो सके और मुक्ति मिले। 

बाहर पानी तेज हो गया है। विपदाएँ और जीवन संघर्ष पटरी पर समानान्तर रूप से चमक रहा है। नीला आसमान काला हो गया है। बड़े-बड़े ओलों के बदले अब तेज बारिश हो रही है।

मैं आज ही जाखनौद के एक खेत में गेहूँ काटती महिलाओं से बात कर रहा था। उनकी आँखें बार-बार घूँघट हटाकर आसमान को देख लेती थीं। इस क्षण में मैंने ख़ौफ़ देखा था, चेहरों पर उनके। कटे हुए गेहूँ के पुआल को वे अपने सीने से लगाकर जब ज़मीन पर रखती थीं, तो वात्सल्य भाव देखते बनता था। उन महिलाओं और किसानों पर आज की रात कैसी बीत रही होगी, यह कल्पना कर ही काँप रहा हूँ।

किससे, किसके लिए, कितनी, कैसी प्रार्थनाएँ करूँ, यह हिम्मत भी खोता जा रहा हूँ। चहुँओर मौत ही मौत है। आवाज़ों के शोर बढ़ रहे हैं। मौत का अट्टाहास पूरी बेशर्मी से सम्पूर्ण धरती पर फैलता जा रहा है। चेहरों पर उपजे भय की लकीरें मेरे कमरे के गाढ़े रंग से गहरी हो गई हैं। अकुलाहट में मैं बदहवास हो गया हूँ। कातर स्वर, थमे से ऊपर उठे हाथ और मजबूर कदम।

उफ़! ये क्या हो रहा है सब। लगता है, हम सब एक टाइटैनिक में इस समय सवार हैं और जहाज डूब रहा है। कुछ लोग अब भी एक घेरे में संगीत बजाकर अपने शौक पूरे कर रहे हैं और दुनिया में लोग छोटी कश्तियाँ लेकर मौत से बचने के उपक्रम में लगे हैं। 

(संदीप जी स्वतंत्र लेखक हैं। यह लेख उनकी ‘एकांत की अकुलाहट’ श्रृंखला की 11वीं कड़ी है। #अपनीडिजिटलडायरी की टीम को प्रोत्साहन देने के लिए उन्होंने इस श्रृंखला के सभी लेख अपनी स्वेच्छा से, सहर्ष उपलब्ध कराए हैं। वह भी बिना कोई पारिश्रमिक लिए। इस मायने में उनके निजी अनुभवों/विचारों की यह पठनीय श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी की टीम के लिए पहली कमाई की तरह है। अपने पाठकों और सहभागियों को लगातार स्वस्थ, रोचक, प्रेरक, सरोकार से भरी पठनीय सामग्री उपलब्ध कराने का लक्ष्य लेकर सतत् प्रयास कर रही ‘डायरी’ टीम इसके लिए संदीप जी की आभारी है।) 
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इस श्रृंखला की पिछली  कड़ियाँ  ये रहीं : 

10वीं कड़ी : लगता है, अपना खाने-पीने का कोटा खत्म हो गया है!

नौवीं कड़ी : मैं थककर मौत का इन्तज़ार नहीं करना चाहता…

आठवीं कड़ी : गुरुदेव कहते हैं, ‘एकला चलो रे’ और मैं एकला चलता रहा, चलता रहा…

सातवीं कड़ी : स्मृतियों के धागे से वक़्त को पकड़ता हूँ, ताकि पिंजर से आत्मा के निकलने का नाद गूँजे

छठी कड़ीः आज मैं मुआफ़ी माँगने पलटकर पीछे आया हूँ, मुझे मुआफ़ कर दो 

पांचवीं कड़ीः ‘मत कर तू अभिमान’ सिर्फ गाने से या कहने से नहीं चलेगा!

चौथी कड़ीः रातभर नदी के बहते पानी में पाँव डालकर बैठे रहना…फिर याद आता उसे अपना कमरा

तीसरी कड़ीः काश, चाँद की आभा भी नीली होती, सितारे भी और अंधेरा भी नीला हो जाता!

दूसरी कड़ीः जब कोई विमान अपने ताकतवर पंखों से चीरता हुआ इसके भीतर पहुँच जाता है तो…

पहली कड़ीः किसी ने पूछा कि पेड़ का रंग कैसा हो, तो मैंने बहुत सोचकर देर से जवाब दिया- नीला!

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