कर्म केवल शरीर से कहीं होना नहीं है….

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 5/4/2022

दो मित्र थे। वे हर शनिवार की शाम एक वेश्या के पास जाया करते थे। एक शाम जब वे वेश्या के घर जा रहे थे, तभी उनकी दृष्‍टि रास्ते में एक कथा-स्थल पर पड़ी। वहाँ कोई संत कथा सुना रहे थे। तब पहला मित्र ने दूसरे से कहा, “आज आप आनन्द हेतु जाइए। मैं कथा सुनूँगा।” इसके बाद दूसरा मित्र पहले को छोड़कर आगे बढ़ गया। लेकिन कथा सुनने बैठा मित्र उसे नहीं छोड़ पाया। वह अब उसी के बारे में सोचता रहा कि वह जीवन के सुख ले रहा होगा। और मैं यहाँ बैठा हूँ। ऐसी जगह, जहाँ त्याग, तपस्या की बातें हो रही हैं। अभी इन सबकी मेरी आयु कहाँ है। मेरा मित्र कहीं अधिक बुध्दिमान है, क्योंकि मेरी तरह आध्यात्मिक प्रवचन में उसका मन नहीं अटका। उधर, दिलचस्प ये कि दूसरा मित्र भी वेश्या के पास पहुँचकर पहले के बारे में सोच रहा है। वह सोच रहा है कि उसके मित्र ने कितना अच्छा किया जो आध्यात्मिक प्रवचन में बैठने का विकल्प चुना। इस तरह उसने अपनी मुक्ति का मार्ग चुन लिया। और मैं यहाँ गन्दगी में फँस गया। इस तरह दोनों मित्र विपरीत स्थलों पर बैठकर विरोधाभासी विचारों से ग्रस्त नज़र आते हैं। 

दरअसल, यही कर्म के योग का बन्धन है। कर्म केवल शरीर से कहीं होना नहीं है, अपितु मन, वचन से भी कहीं होना है। इस तरह कर्म मानसिक, वाचिक और कायिक तीनों ही होते हैं और इसी तरह कर्म बन्धन भी। हम शरीर के स्तर पर या मानसिक स्तर पर उक्त व्यक्तियों की तरह कहीं के कहीं हैं। हमारी मानसिक और शारीरिक स्थिति में तारतम्य हो, एकरूपता हो, तभी हम सत्कर्म की ओर वास्तव में प्रवृत्त होते हैं। जैन आचार्य कहते हैं कि जैसे गीले कपड़े में धूल के कण स्वयं चिपक जाते हैं, वैसे ही हमारे कर्म हमसे चिपकते रहते हैं (यथार्द्रं वस्त्रं … आत्मा योगानीतं कर्म सर्वप्रदेशैगृर्ह्णाति)। यह कर्मों का आकर्षण आत्मा को खींचकर उसका हनन करता है। कर्म उस आत्मा को जन्म-बन्धन के चक्र में खींचते रहते हैं। हम क्रोध, अहंकार, माया और लोभ से कर्मों के आकर्षण से खिंचे बन्धन से बँध जाते हैं। जैसे ही बन्धनों से मुक्त हुए हम जिन हो जाते हैं। 
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(अनुज, मूल रूप से बरेली, उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। दिल्ली में रहते हैं और अध्यापन कार्य से जुड़े हैं। वे #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापक सदस्यों में से हैं। यह लेख, उनकी ‘भारतीय दर्शन’ श्रृंखला की 52वीं कड़ी है।) 
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अनुज राज की ‘भारतीय दर्शन’ श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ… 
51. जो जीव को घुमाता रहता है, जानिए उस पुद्गल के बारे में
50. यह ज्ञान बड़ी विचित्र चीज है! जानते हैं कैसे…
49. संसारी और मुक्त जीव में क्या भेद है, इस छोटी कहानी से समझ सकते हैं
48. गुणवान नारी सृष्टि में अग्रिम पद धारण करती है…
47.चेतना लक्षणो जीव:, ऐसा क्यों कहा गया है? 
46. जानते हैं, जैन दर्शन में दिगम्बर रहने और वस्त्र धारण करने की परिस्थितियों के बारे में
45. अपरिग्रह : जो मिले, सब ईश्वर को समर्पित कर दो
44. महावीर स्वामी के बजट में मानव और ब्रह्मचर्य
43.सौ हाथों से कमाओ और हजार हाथों से बाँट दो
42. सत्यव्रत कैसा हो? यह बताते हुए जैन आचार्य कहते हैं…
41. भगवान महावीर मानव के अधोपतन का कारण क्या बताते हैं?
40. सम्यक् ज्ञान : …का रहीम हरि को घट्यो, जो भृगु मारी लात!
39. भगवान महावीर ने अपने उपदेशों में जिन तीन रत्नों की चर्चा की, वे कौन से हैं?
38. जाे जिनेन्द्र कहे गए, वे कौन लोग हैं और क्यों?
37. कब अहिंसा भी परपीड़न का कारण बनती है?
36. सोचिए कि जो हुआ, जो कहा, जो जाना, क्या वही अंतिम सत्य है
35: जो क्षमा करे वो महावीर, जो क्षमा सिखाए वो महावीर…
34 : बौद्ध अपनी ही ज़मीन से छिन्न होकर भिन्न क्यों है?
33 : मुक्ति का सबसे आसान रास्ता बुद्ध कौन सा बताते हैं?
32 : हमेशा सौम्य रहने वाले बुद्ध अन्तिम उपदेश में कठोर क्यों होते हैं? 
31 : बुद्ध तो मतभिन्नता का भी आदर करते थे, तो उनके अनुयायी मतभेद क्यों पैदा कर रहे हैं?
30 : “गए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास”
29 : कोई है ही नहीं ईश्वर, जिसे अपने पाप समर्पित कर हम मुक्त हो जाएँ!
28 : बुद्ध कुछ प्रश्नों पर मौन हो जाते हैं, मुस्कुरा उठते हैं, क्यों?
27 : महात्मा बुद्ध आत्मा को क्यों नकार देते हैं?
26 : कृष्ण और बुद्ध के बीच मौलिक अन्तर क्या हैं?
25 : बुद्ध की बताई ‘सम्यक समाधि’, ‘गुरुओं’ की तरह, अर्जुन के जैसी
24 : सम्यक स्मृति; कि हम मोक्ष के पथ पर बढ़ें, तालिबान नहीं, कृष्ण हो सकें
23 : सम्यक प्रयत्न; बोल्ट ने ओलम्पिक में 115 सेकेंड दौड़ने के लिए जो श्रम किया, वैसा! 
22 : सम्यक आजीविका : ऐसा कार्य, आय का ऐसा स्रोत जो ‘सद्’ हो, अच्छा हो 
21 : सम्यक कर्म : सही क्या, गलत क्या, इसका निर्णय कैसे हो? 
20 : सम्यक वचन : वाणी के व्यवहार से हर व्यक्ति के स्तर का पता चलता है 
19 : सम्यक ज्ञान, हम जब समाज का हित सोचते हैं, स्वयं का हित स्वत: होने लगता है 
18 : बुद्ध बताते हैं, दु:ख से छुटकारा पाने का सही मार्ग क्या है 
17 : बुद्ध त्याग का तीसरे आर्य-सत्य के रूप में परिचय क्यों कराते हैं? 
16 : प्रश्न है, सदियाँ बीत जाने के बाद भी बुद्ध एक ही क्यों हुए भला? 
15 : धर्म-पालन की तृष्णा भी कैसे दु:ख का कारण बन सकती है? 
14 : “अपने प्रकाशक खुद बनो”, बुद्ध के इस कथन का अर्थ क्या है? 
13 : बुद्ध की दृष्टि में दु:ख क्या है और आर्यसत्य कौन से हैं? 
12 : वैशाख पूर्णिमा, बुद्ध का पुनर्जन्म और धर्मचक्रप्रवर्तन 
11 : सिद्धार्थ के बुद्ध हो जाने की यात्रा की भूमिका कैसे तैयार हुई? 
10 :विवादित होने पर भी चार्वाक दर्शन लोकप्रिय क्यों रहा है? 
9 : दर्शन हमें परिवर्तन की राह दिखाता है, विश्वरथ से विश्वामित्र हो जाने की! 
8 : यह वैश्विक महामारी कोरोना हमें किस ‘दर्शन’ से साक्षात् करा रही है?  
7 : ज्ञान हमें दुःख से, भय से मुक्ति दिलाता है, जानें कैसे? 
6 : स्वयं को जानना है तो वेद को जानें, वे समस्त ज्ञान का स्रोत है 
5 : आचार्य चार्वाक के मत का दूसरा नाम ‘लोकायत’ क्यों पड़ा? 
4 : चार्वाक हमें भूत-भविष्य के बोझ से मुक्त करना चाहते हैं, पर क्या हम हो पाए हैं? 
3 : ‘चारु-वाक्’…औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होए! 
2 : परम् ब्रह्म को जानने, प्राप्त करने का क्रम कैसे शुरू हुआ होगा? 
1 : भारतीय दर्शन की उत्पत्ति कैसे हुई होगी? 

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