फिल्मों में अक़्सर सेना और पुलिस के अफ़सर सिगरेट क्यों पीते रहते हैं?

टीम डायरी

अभी 31 मई को ‘विश्व तम्बाकू निषेध दिवस’ मनाया गया। हर साल मनाया जाता है। इस साल भी रस्म निभा ली गई। हाँ, रस्म ही क्योंकि वर्ष 1988 से लगातार हर साल यह आयोजन होते रहने के बावज़ूद अब तक दुनियाभर में तम्बाकू और तम्बाकू उत्पादों पर कोई रोक तो लग नहीं पाई। बल्कि दिनों-दिन जनसामान्य में इन उत्पादों का धड़ल्ले से प्रचलन बढ़ ही रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के कुछ आँकड़े हैं। ग़ौर करें। 

इन आँकड़ों के अनुसार, दुनिया में  1.3 अरब लोग तम्बाकू तथा तम्बाकू उत्पादों का सेवन करते हैं। इनमें 80 फ़ीसद लोग मध्यम और निम्न आय वर्ग वाले देशों के नागरिक होते हैं। इन देशों में भारत भी है। दूसरे अर्थों में 80 करोड़ के आस-पास तम्बाकू और तम्बाकू उत्पादों के उपयोगकर्ता भारत जैसे या उससे कम आय वर्ग वाले देशों में पाए जाते हैं। इनमें से लगभग 80 लाख लोग इस ख़राब आदत के कारण हर साल अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। इनमें भी 13 लाख लोग तो बेचारे, गेहूँ के साथ घुन की तरह पिस जाते हैं। मतलब वे लोग तम्बाकू या तम्बाकू उत्पादों का सेवन नहीं करते। फिर भी इन बुरी आदतों के शिकार लोगों के सम्पर्क में आकर मारे जाते हैं। 

इंसान ही नहीं, ज़मीन और जंगलों को भी तम्बाकू से नुकसान से होता है। आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि हर साल दुनियाभर में लगभग 35 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में तम्बाकू की खेती होती है। इससे ज़मीन तो ख़राब होती ही है, लगभग दो लाख हेक्टेयर क्षेत्र के जंगल भी बर्बाद हो जाते हैं। और भी तमाम नुक़सान ही नुक़सान हैं। फ़ायदा तो कुछ है नहीं। फिर भी, तम्बाकू और तम्बाकू उत्पादों पर रोक नहीं लगाई जाती, क्यों? बल्कि बढ़-चढ़ कर तम्बाकू और तम्बाकू उत्पादों का प्रचार-प्रसार ही किया जाता है। यह भी नहीं होता कि प्रचार-प्रसार ही रोक दें। 

आलम यह है कि जनमानस पर गहरा असर छोड़ने वाले माध्यम सिनेमा में तो फिल्मी नायक पुलिस और विभिन्न सेनाओं के अफ़सरों की भूमिका निभाते हुए भी ऐसे सिगरेट फूँकते हैं, मानो इससे उनका रुतबा बढ़ता हो। इन अभिनेताओं को फिल्मी पर्दे पर ऐसी वाहियात हरक़त करते हुए यह तक ध्यान नहीं रहता कि नई उम्र के बच्चों पर क्या असर पड़ेगा? वे बच्चे, जो उन्हें ‘वास्तविकता में नायक’ मानने लगते हैं। यहाँ तक कि उन्हें यूँ धुआँ उड़ाते देखकर कई किशोर तो इतना तक सोच लेते हैं कि पुलिस और सेना के अफ़सर सच में ऐसे ही काम करते होंगे। 

अभी एक दिन पहले की बात है। एक किशोरवय बालक अपने घर में फिल्म देख रहा था, ‘स्काई फोर्स’। उसमें सेना के अफ़सरों की भूमिका निभाने वाले अभिनेताओं को सिगरेट फूँकते हुए देखकर उस बच्चे ने अपने पिता से पूछ ही लिया आख़िर, “ये सेना या पुलिस के अफ़सर क्या सच में सिगरेट पीते-पीते ही काम करते हैं? फिल्मों में उन्हें ऐसे क्यों दिखाते हैं?” बालक को ज़वाब देते हुए पिता ने जो बताया, वह न सिर्फ़ उल्लेखनीय है, बल्कि उसमें इस मसले से जुड़े अन्य कई सवालों के उत्तर भी देखे जा सकते हैं।

उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं है कि सेना या पुलिस के अफ़सर सिगरेट पीते-पीते ही काम करते हैं। बल्कि सच्चाई तो यह है कि काम करते समय सिगरेट पीना उनके अनुशासन के ख़िलाफ़ होता है। सिगरेट पीना किसी की व्यक्तिगत आदत हो सकता है। पर उसे भी सिगरेट पीने के लिए कार्यस्थल से दूर जाना पड़ता है। हाँ, लेकिन फिल्मों का मामला अलग होता है। वहाँ अभिनेताओं-अभिनेत्रियों को सिगरेट पीते हुए दिखाना किसी की निजी आदत से ज़्यादा बाज़ार और कारोबार से सेचालित मामला होता है। इस प्रचार-प्रसार के लिए करोड़ों रुपए दिए जाते हैं।” 

लेकिन सरकार तो रोक लगा सकती है? वह क्यों नहीं रोकती? यह सवाल भी आना ही था। स्वाभाविक था। अलबतता, इसका उत्तर भी समान ही था। बाज़ार और कारोबार। इसी चक्कर में सरकारें भी कोई रोक-टोक नहीं लगातीं। इस बात की पुष्टि के लिए भी फिर आँकड़ों का सहारा लेते हैं। सिर्फ़ भारत के आँकड़े। भारतीय तम्बाकू संस्थान की वेबसाइट पर मौज़ूद आँकड़ों के अनुसार, साल 2022-23 में भारत सरकार को तम्बाकू तथा तम्बाकू उत्पादों से 72,788 करोड़ रुपए का राजस्व मिला था। यह जानकारी सरकार ने ख़ुद लोकसभा में दी थी। 

तो अब बताइए, इतनी बड़ी रकम से कोई ऐसे ही हाथ धो लेगा क्या? नहीं न? इसीलिए, कितने ही साल धूम्रपान निषेध दिवस, तम्बाकू निषेध दिवस की रस्में पूरी की जाती रहें। कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला। चमक-दमक की दुनियावाले यूँ ही धुआँ उड़ा-उड़ाकर प्रचार-प्रसार करते रहेंगे और तम्बाकू तथा तम्बाकू उत्पादों से लोगों की जान बचाने के प्रयासों को धुआँ-धुआँ करते रहेंगे। हाँ अलबत्ता, हम-आप अपने स्तर पर ज़रूर ख़ुद को तथा अपनी जान-पहचान वालों को भी रोक सकते हैं। बशर्ते, हम ऐसा करना चाहें तो। 

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