जो जीव को घुमाता रहता है, जानिए उस पुद्गल के बारे में

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 29/3/2022

महत्त्वपूर्ण तत्त्वों की चर्चा में अजीव की भी चर्चा आवश्यक है। यह अजीव ही तो है जिसे हम देख पाते हैं। स्पर्श कर पाते हैं। जैन आचार्य कहते हैं जो जीव नहीं, वह अजीव है। जीव का विपरीत अजीव है। अर्थात् जिसमें चेतना नहीं है, जिसमें ज्ञान नहीं है, वह अजीव की श्रेणी में आता है। 

हालाँकि ग़ौर करने लायक है कि इस अजीव में चेतना भले न हो, ज्ञान हो न हो, मगर जीव को घुमाए यही रहता है। जो अचेतन है, जो मूर्त है, वह अजीव है। इस अजीव तत्त्वों में सबसे महत्त्वपूर्ण है ‘पुद्गल’। इस ‘पुद्गल’ को आधुनिक विज्ञान में मैटर या ऊर्जा के रूप में समझ सकते हैं। यह भौतिक वस्तु यह ऊर्जा ही हमारे समस्त आकर्षण का केन्द्र बनी रहती है। 

इस ‘पुद्गल’ की आचार्य बड़ी सार्थक परिभाषा देते हैं, “जो पूर्ण रूप से गल जाए और जुड़ जाए वह पुद्गल है।  

पूरणगलनान्वर्थसंज्ञत्वात् पुद्गलाः। भेदसंघाताम्यां च पूर्यंते गलंते चेति पूरणगलनात्मिकां क्रियामंतर्भाव्य पुद्गलशब्दोऽन्वर्थ:….पुद्गलानाद्वा। अथवा पुमांसो जीवाः, तैः शरीराहार-विषयकरणोपकरणादिभावेन गिल्यंत इति पुद्गलाः।(राजवर्तिक 5/1/24)

अर्थात् भेद और संघात से पूरण और गलन को प्राप्त हों वे पुद्गल हैं। यह पुद्गल द्रव्य की अन्वयर्थ संज्ञा है। अथवा पुरुष यानी जीव जिनको शरीर, आहार विषय और इन्द्रिय-उपकरण आदि के रूप में निगलें अर्थात् ग्रहण करें वे पुद्गल हैं। 

“गलनपूरणस्वभावसनाथः पुद्गलः”(द्रव्यसंग्रह 15)

जो गलन-पूरण स्वभाव सहित है, वह पुद्गल है। यह परिभाषा पढ़ ऐसा लगता है कि आचार्य कहना चाह रहे हैं कि – ये पुद्गल जिससे चिपक जाएं, उसे गला दें और जिससे छुट जाएं उसे पूर्ण कर दें। 

तात्पर्य यह कि पुद्गल से जो चिपका रहे वह जन्म मरण में फंसा रहे, पुद्गल से अलग हो जाते वह मुक्त हो जाए। पुद्गलों की विशेषता है कि इन्हें स्पर्श कर सकते हैं, सूँघ सकते हैं, देख सकते हैं, चख सकते हैं, इनका स्वाद ले सकते हैं।

वास्तव में पुद्गल मूर्त चीजें हैं अर्थात् जो भी प्रकृति में मूर्त है, वह पुद्गल का रूप ही है। रूपवान होना इसका लक्षण है। पुद्गल परमाणु रूप है। पुद्गल की सूक्ष्मतम अवस्था परमाणु है। 

समस्त संसार में जो कुछ भी देखते हैं उन सबका कारण यही अजीव है। आत्मा जब तक इन पुद्गलों से चिपकी हुई है, तब तक वह जन्म और मरण के बन्धनों से बँधी है। जैसे ही आत्मा पुद्गलों से मुक्त हुई वह आत्मा मुक्त-आत्मा में परवर्तित हो जाती है।

पुद्गल आत्मा को बाँधे रहते हैं। अगर सरल भाषा में कहें तो हमारी इन्द्रियों का अपने अपने कार्यों के प्रति मोह ही पुद्गल है। यह मोह जब तक रहता है आत्मा जीवन चक्र में घूमती रहती है। जैसे ही मोह समाप्त वैसे मुक्त हो जाती है। सम्भवत: इसलिए पुद्गलों का स्वरूप बताते हुए आचार्य कहते हैं कि स्पर्श , रस , गंध वाले पुद्गल होते हैं। (स्पर्शरस गंध वर्णवंत: पुद्गला: तत्वार्थ सूत्र 5/23)

व्यक्ति प्राय: इन्द्रियों के वश में रहते हुए अपने जीवन को चला रहा होता है। जैसे ही इन पुद्गलों से मुक्त हुए। इन इन्द्रियों के बन्धनों से मुक्त हुए, हम जिन हो जाते हैं। जिनेन्द्र हो जाते हैं। 
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(अनुज, मूल रूप से बरेली, उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। दिल्ली में रहते हैं और अध्यापन कार्य से जुड़े हैं। वे #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापक सदस्यों में से हैं। यह लेख, उनकी ‘भारतीय दर्शन’ श्रृंखला की 51वीं कड़ी है।) 
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अनुज राज की ‘भारतीय दर्शन’ श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ… 
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1 : भारतीय दर्शन की उत्पत्ति कैसे हुई होगी?

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