बेटी के नाम दसवीं पाती : मैं तुम्हारी शहद से मीठी बातों की मिसरी को बहुत याद करूँगा!

दीपक गौतम, सतना मध्य प्रदेश

प्रिय मुनिया

मेरी लाडो, मैं तुम्हें यह पत्र तब लिख रहा हूँ, जब हमने रात में तुम्हारी शरारतों का एक छोटा सा वीडियो शूट किया था। पिछले कुछ दिनों में मैंने तुम्हारे कुछ वीडियो बनाए हैं। जल्द ही कुछ और वीडियो शूट करूँगा। तुम्हारी तोतली जबान की मिठास से घुले ये वीडियो तुम्हारे बचपन की सबसे सुखद स्मृतियों में से एक हैं। इन्हें सहेजे जाने के क्रम में यह मेरा पहला कदम है। दरअसल जीवन का सबसे सुखद पहलू यही है कि मोह-माया से भरे इस संसार में जब अपनी संतान से प्रेम के धागे जुड़ते हैं, तब वास्तव में एक पुरुष अपनी पशुता से ऊपर उठकर थोड़ा अधिक मनुष्यता की ओर कदम बढ़ाता है। तुम अभी यह बात समझने के लिए बहुत छोटी हो, लेकिन फिर भी तुमसे यह बात कह रहा हूँ।

क्योंकि अब तुम्हारी बातें बड़ी हो चली हैं। तुम्हें हर वक्त अपने आस-पास माँ-बाप और दादा-दादी सब चाहिए होते हैं। सोने से पहले तुम अपने मन की पोटली से सारे रिश्तों के सिरे पकड़कर उनका हिसाब-किताब करना शुरू कर देती हो। मसलन कि दादी कहाँ है? बब्बा कहाँ हैं? आरव, शौर्य और ॐ भैया कहाँ है? बहना कहाँ है? हमारे पास ये सब क्यों नहीं हैं? मैं तुम्हें जवाब देते हुए अक्सर ये सोचता हूँ कि यदि इंसानी रिश्तों में इतना प्रेम और फिकर बड़े होने के बाद भी बचा रह जाए, तो सचमुच जीवन कितना सुन्दर हो जाए।

बहरहाल तुम्हारी तोतली जबान में सना प्रेम मुझे याद दिलाता रहता है कि ये बस कुछ दिनों की बात है। धीरे-धीरे तुम्हारे शब्द साफ होने लगे हैं। महज कुछ वक्त के बाद तुम्हारी जबान से ये तोतलापन गायब हो जाएगा। अभी तुम दिन में हजार बार जब ये कहती हो, “पापा, मैं आपसे बहुत प्याल कलती हूँ”, तो शब्दों की मिठास कानों से घुलती हुई हृदय की गहराई तक पहुँचती है। तुम यहीं नहीं रुकती तुम्हारे मीठे शब्दों के साथ साथ तुम चुम्बनों के भी अम्बार लगा देती हो। कभी इस गाल पर कभी उस गाल, पर कभी माथे पर तो कभी हाथ और उसकी हथेलियों पर। जब मैं रात को 10 से 11 के बीच काम खत्म करके घर पहुँचता हूँ, तो ये तुम्हारा रोज का शगल है। सच कहूँ तो दिनभर की थकान के बाद जब घर लौटता हूँ और तुम गले से लिपटकर पापा-पापा करती हो, तो जिन्दगी के खूबसूरत होने का एहसास होता है।

मेरी लाडो

मैं तुम्हें यह पत्र लगभग डेढ़ माह बाद लिख पा रहा हूँ। यूँ तो सोचता हूँ और दिल से चाहता भी हूँ कि अब कम से कम हर सप्ताह हमारे बीच का अनकहा इन पत्रों में दर्ज होता रहे। लेकिन कामकाजी व्यस्तता और व्यवसायिक उलझनों के बीच मोबाइल पर टाइप करना अब दुष्कर लगने लगा है। इसीलिए, बस तुम्हें पत्र लिखने के सिलसिले को जारी रखने के लिए अब मुझे एक लैपटॉप लेने की सूझ रही है। खासकर तुम्हारी माँ को इन प्रेम पातियों का बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है। इन्हें पढ़ने के बाद उसकी सबसे पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि मेरे बारे में पत्र में कुछ नहीं लिखा है। अब तुम ही कहो कि भला एक माँ के प्रेम को शब्दों में बाँध पाने और लिख पाने की क्षमता किसी में कहाँ है?

यूँ भी तुम्हारी माँ अपने काम के सिलसिले में हर माह लगभग दस रोज हम दोनों से किस तरह दूर रहती है, ये भला उससे बेहतर कौन समझता होगा? हर बार तुमसे विदा लेते हुए उसकी आँखें पसीज जाती हैं। जब तुम अपनी तोतली जबान से कहती हो, ‘मम्मा तुम कहाँ जा लही हो, मीतिंग काम कलने जा लही हो क्या?” तब उसका जाना और कठिन हो जाता है। ये तुम्हारी माँ कि पेशागत जरूरत है कि उसे दफ्तर के चक्कर में अक्सर भ्रमण पर रहना पड़ता है। इस छोटी सी उम्र में तुम ये समझ पाती हो और उसे पूरे प्रेम से विदा करती हो, यह देखकर मैं आश्चर्य से भर जाता हूँ। यह सोचकर कि साढ़े तीन साल की बच्ची इतनी बेफिक्री से आखिर कैसे अपनी माँ से दूर रह पाती है? अगले ही पल विचार आता है कि बेटियाँ प्रेम की वो बारीक डोर हैं, जो परिवारों को अपने संस्कारों से जोड़े रखती हैं।

इस पुरुष प्रधान समाज में हम सदियों से देखते आ रहे हैं कि बाप के घर से बेटियाँ ही विदा होती हैं। बेटों की विदाई अब भी इस समाज में इतनी सहज स्वीकार्य नहीं है। शायद इसलिए भी कि पुरुष के अन्दर अपना बसेरा छोड़कर नया संसार रचने की क्षमता ही नहीं है। प्रकृति ने नारी को ही नया रचने का वरदान दिया है। मैं ये मानता हूँ कि विज्ञान कितना भी आगे चला जाए पुरुष में माँ जितनी ममता, त्याग, समर्पण और प्रेम नहीं भर सकता।

मेरी मुनिया

मैं ये पत्र लिखते-लिखते कहाँ से कहाँ पहुँच गया? मुझे पता ही नहीं चला। कायदा तो यह है कि हमारे बीच की बतकही और प्रेम ही इन पत्रों में उकेरा जाए, लेकिन कभी-कभी दुनियावी बातें भी इसमें न चाहते हुए लिख ही जाती हैं। यह सब लिखने का एक ही मकसद है कि तुम यह जान सको कि जीवन में बेटी के आने के बाद एक पुरुष की देह में धँसा पिता कैसे धीरे-धीरे बाहर आता है। इन प्रेम पातियों की बतकही को समझने में तुम्हें शायद वक्त लगेगा। तुम यह भी शायद ही समझ पाओ कि बेटियों जितना स्नेह एक पिता अपने पुत्र को नहीं दे पाता है। कम से कम मुझे तो यही लगता है। ईश्वर से किसी वरदान की तरह तुम्हें माँगा था और भगवती की कृपा से तुम ही हमारे संसार में प्रेम का रस भरने चली आई।

मेरी जान, आगे समाचार यह है कि लगभग एक पखवाड़े बाद फिर से तुम्हारा स्कूल शुरू हो जाएगा। तुम सुबह से दोपहर तक के लिए स्कूल में व्यस्त रहोगी, जैसा कि अभी कहती रहती हो, “मैं स्कूल दाऊँगी, पापा और मम्मा मीतिंग काम के लिए ओफिस दाएँगे.. ओफिस।” शायद कुछ दिन ही और तुम्हारा ये तोतलापन हमारे जीवन में माधुर्य घोल सकेगा। क्योंकि अब तुम्हारे शब्द पहले से साफ निकलने लगे हैं। र को ल और ज को द कहने के अलावा अब तुम्हारी जबान में ज्यादा गड़बड़ नहीं रह गया है। लेकिन, मेरी जान तुम्हारे तोतलेपन की मिठास हमारे जीवन से कुछ वक्त बाद भले ओझल हो जाए, मैं तुम्हारी शहद से मीठी बातों की इस मिसरी को बहुत याद करूँगा।

जैसा कि तुम विदा लेते समय कहती हो, “अपना ध्यान लखना। हम फिल मिलेंगे।” यहीं इन्हीं पत्रों की दुनिया में अपने हिस्से के कुछ और किस्से जज्ब करने के लिए। इस तोतली मिठास के लिए शुक्रिया मेरी गिलहरी। लव यू मेरी जान ❣️😘

शेष समाचार अगले पत्र में। तुम्हें ढेर सारा प्यार और दुलार। 💝

तुम्हारा पिता 

17 जून 2025

#मुनिया #Letterstomuniya #9thlettertomuniya #Betikenaampatii #Letterstomunia #मुनियाकेनामपाती 

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अपनी बेटी के नाम दीपक की पिछली चिटि्ठयाँ 

9- बेटी के नाम नौवीं पाती : मुझमें और अधिक मनुष्यता भरने के लिए शुक्रिया मेरी गिलहरी
8- बेटी के नाम आठवीं पाती : तुम्हें जीवन की पाठशाला का पहला कदम मुबारक हो बिटवा
7- बेटी के नाम सातवीं पाती : हमारी चुप्पियाँ तुम्हारे इंतजार में हैं, तुम जल्दी आना….।
6 – बेटी के नाम छठवीं पाती : तुम्हारी मुस्कान हर दर्द भुला देती है
5- बेटी के नाम पाँचवीं पाती : तुम्हारे साथ बीता हर पल सुनहरा है
4. बेटी के नाम चौथी पाती : तुम्हारा होना जीवन की सबसे ख़ूबसूरत रंगत है 
3.  एक पिता की बेटी के नाम तीसरी पाती : तुम्हारा रोना हमारी आँखों से छलकेगा 
2. एक पिता की बेटी के नाम दूसरी पाती….मैं तुम्हें प्रेम की मिल्कियत सौंप जाऊँगा 
1. प्रिय मुनिया, मेरी लाडो, आगे समाचार यह है कि…

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