जीवन में हमें ग़लत साबित करने वाले बहुत मिलेंगे, पर हम हमेशा ग़लत नहीं होते

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 27/11/2021

एक मैयत में गया था आज। घर में तो सब ठीक था। रास्ते में भी दुख उमग रहा था। पर श्मशान में मुखाग्नि से कपाल क्रिया के बीच फुर्सत के घंटों में हम सब लोगों ने उस मृतक को इतना ग़लत साबित किया कि यदि वह सुन लेता तो शायद जन्म के क्षण ही मरने का निश्चय कर लेता। दिलचस्प यह कि बाहर निकलते समय श्मशान वैराग्य का टैग सबके मन मस्तिष्क और आत्मा पर नत्थी था। 

जीवन में हमें ग़लत साबित करने वाले बहुत मिलेंगे। पर हम हमेशा ग़लत नहीं होते। हमने जो भी किया, सोचा, विचारा और कहा तथा अतीत, वर्तमान या भविष्य में करेंगे- वह हमारा निर्णय था। किसी को उस पर फैसला करने का अधिकार नहीं है। इसलिए जो ग़लत साबित कर रहे हैं, उन्हें तत्काल त्याग दिया जाए। जीवन की उम्र भले ही छोटी हो पर दायरा बहुत बड़ा है। 

हम सब एक न एक बार झूठ बोलते हैं। रोज, हर समय और यही झूठ हमे ज़िन्दा रखते हैं। हमें किसी के सामने सच बोलने की ज़रूरत भी नहीं है और न ही झूठ को सच साबित करने की। वस्तुतः झूठ ही परिस्थिति का बखान है। परिस्थिति की जाणीव वही कर सकता है, जो उसमें या तो फँसा हो या उससे गुज़र रहा हो। इसलिए हमारा बोला गया शब्द या वाक्य या वर्णन हमारे द्वारा कहा गया एक शब्द चित्र है। एक आख्यान, जिसमें पूरा कभी कहा ही नहीं जा सकता। हर बार बहुत कुछ छूटता है। इसलिए पश्चाताप करके मन मत छोटा नहीं करना चाहिए कि मैंने झूठ बोला। यदि कोई हमसे कुछ कह रहा है तो उसे भी अपूर्ण समझें।  तत्काल भूल जाएँ क्योंकि जो देखा, सुना और कहा गया है, वह महज झूठ का एक पुलिंदा है। एक कृत्रिम परिस्थिति का वर्णन मात्र। 

जीवन में कभी स्पष्टीकरण मत दीजिए। अपने आपको सबसे ज़्यादा देना पड़ते हैं ये हमें। क्योंकि बाकी सबसे तो हम बदतमीज़ी या ओछेपन से निपट लेंगे। पर अपने आपको, अपने किए-धरे का स्पष्टीकरण देना पड़ता है। मनुष्य ने स्वप्रताड़ना के अनेक उपकरण इज़ाद किए हैं। स्पष्टीकरण उनमें से श्रेष्ठ आविष्कार है। जबकि होना तो ठीक उल्टा था। अपनी बात कहिए। अपने मन-मस्तिष्क में जोर से कहिए और इतनी ताकत से कि फिर कभी पलटना न पड़े किसी पश्चाताप के लिए। पर, पछताने का कोई बहाना मत खोजिए। मैंने किया और इस पर मुझे कोई खेद नहीं है, यह आपको जीत दिलाएगा।

सबसे सुन लीजिए। पर अपने को जैसा लगता है वैसा कीजिए। अपना विचार, अपना जीवन, अपने स्वप्न और अपनी क्षमताओं से आप वाक़िफ़ हैं। आपको क्या अच्छा लगता है। आपकी पसन्द क्या है। आपकी प्राथमिकता क्या है। सबसे ज़्यादा क्या करने से खुशी मिलती है, यह सब आपको ही मालूम है। इसलिए अपनी मानो, दोनो कानों से आती व्योमभर की आवाज़ों का एक पथ निश्चित है। वे आएँगी मरने के बाद भी और एक सरल या तिर्यक रेखा में गमन कर निकल जाएँगी। पर इन दो कानों के बीच जो अनहद नाद की तरह से आवाज़ें उठती हैं, गूंजती हैं, शोर मचाती हैं और आग़ाह करती हैं, उन पर फोकस करना जरूरी है। ताकि वे स्थिर हो जाएँ।  

किसी के कहने, सुनने से कोई फर्क नही पड़ता। लोग बोलेंगे। भीड़ की क्या परवाह करना। जब लगे कि अपनी प्रसन्नता या दुख किसी और के नियंत्रण में जा रहा है तो बगैर किसी लिहाज़ के उस बन्धन को तोड़ देना बेहतर है। चाहे वह कितना ही मज़बूत, करीबी या भावनात्मक क्यों न हो। 

जीवन में सब कुछ सीखते, सुनते, देखते, समझते हुए ही पाँच दशक पूर्ण कर छठवें के आधे पर आ गया हूँ। फिर कोई कहता है कि “मैं यह समझा रहा था, आपको बता रहा था, या इसे यूँ समझे कि” तो लगता है, क्या अपनी कोई समझ नहीं। अपनी शिक्षा, दुनियावी चातुर्य भरे जीवन का कोई मोल नहीं। क्या अब अपने अनुभव कालातीत हो गए। याद आता है कि चन्द रुपयों या नौकरी के लिए समझौते बहुत किए। आठ वर्ष पूर्व नौकरी छोड़ी भी इसलिए थी और तब से बहुत कम संसाधनों और सीमित खर्चों में अपने को समेट लिया था। पर कभी गरीबी का नंगा प्रदर्शन नहीं किया। आज भी यही माद्दा है। मेरे पास अब समय बहुत कम बचा है। अपने भीतर यही सुनना चाहता हूँ कि सब ठीक हुआ। जो हुआ अच्छे के लिए हुआ। इस समय में यही हिम्मत बनी रहे, हाथ हमेशा ऊपर बना रहे। आज तक माँगा नहीं तो अब इस बित्तेभर समय में पसारना न पड़े। समय कम है और अब करने को कुछ भी शेष नहीं है। रंग खत्म हो गए हैं और कैनवास भर गया है। 

इन गाढ़े नीले रंग की दीवारों वाले कमरे में इसलिए घड़ी की सुइयाँ आपको नही मिलेंगीं। यहाँ समय हावी नहीं होता। मैं न ही समय के बन्धन मानता हूँ। मुझे मालूम है कि मेरे पास कितना समय शेष है। अब जितना भी है, वह मैं अपने हिसाब से तय करूँगा। 

(संदीप जी स्वतंत्र लेखक हैं। यह लेख उनकी ‘एकांत की अकुलाहट’ श्रृंखला की 37वीं कड़ी है। #अपनीडिजिटलडायरी की टीम को प्रोत्साहन देने के लिए उन्होंने इस श्रृंखला के सभी लेख अपनी स्वेच्छा से, सहर्ष उपलब्ध कराए हैं। वह भी बिना कोई पारिश्रमिक लिए। इस मायने में उनके निजी अनुभवों/विचारों की यह पठनीय श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी की टीम के लिए पहली कमाई की तरह है। अपने पाठकों और सहभागियों को लगातार स्वस्थ, रोचक, प्रेरक, सरोकार से भरी पठनीय सामग्री उपलब्ध कराने का लक्ष्य लेकर सतत् प्रयास कर रही ‘डायरी’ टीम इसके लिए संदीप जी की आभारी है।) 
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इस श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ  ये रहीं : 
36 : ऊँचाईयाँ नीचे देखने से मना करती हैं
35.: स्मृतियों के जंगल मे यादें कभी नहीं मरतीं
34 : विचित्र हैं हम.. जाना भीतर है और चलते बाहर हैं, दबे पाँव
33 : किसी के भी अतीत में जाएँगे तो कीचड़ के सिवा कुछ नहीं मिलेगा
32 : आधा-अधूरा रह जाना एक सच्चाई है, वह भी दर्शनीय हो सकती है
31 : लगातार भारहीन होते जाना ही जीवन है
30 : महामारी सिर्फ वह नहीं जो दिखाई दे रही है!
29 : देखना सहज है, उसे भीतर उतार पाना विलक्षण, जिसने यह साध लिया वह…
28 : पहचान खोना अभेद्य किले को जीतने सा है!
27 :  पूर्णता ही ख़ोख़लेपन का सर्वोच्च और अनन्तिम सत्य है!
26 : अधूरापन जीवन है और पूर्णता एक कल्पना!
25 : हम जितने वाचाल, बहिर्मुखी होते हैं, अन्दर से उतने एकाकी, दुखी भी
24 : अपने पिंजरे हमें ख़ुद ही तोड़ने होंगे
23 : बड़ा दिल होने से जीवन लम्बा हो जाएगा, यह निश्चित नहीं है
22 : जो जीवन को जितनी जल्दी समझ जाएगा, मर जाएगा 
21 : लम्बी दूरी तय करनी हो तो सिर पर कम वज़न रखकर चलो 
20 : हम सब कहीं न कही ग़लत हैं 
19 : प्रकृति अपनी लय में जो चाहती है, हमें बनाकर ही छोड़ती है, हम चाहे जो कर लें! 
18 : जो सहज और सरल है वही यह जंग भी जीत पाएगा 
17 : विस्मृति बड़ी नेमत है और एक दिन मैं भी भुला ही दिया जाऊँगा! 
16 : बता नीलकंठ, इस गरल विष का रहस्य क्या है? 
15 : दूर कहीं पदचाप सुनाई देते हैं…‘वा घर सबसे न्यारा’ .. 
14 : बाबू , तुम्हारा खून बहुत अलग है, इंसानों का खून नहीं है… 
13 : रास्ते की धूप में ख़ुद ही चलना पड़ता है, निर्जन पथ पर अकेले ही निकलना होगा 
12 : बीती जा रही है सबकी उमर पर हम मानने को तैयार ही नहीं हैं 
11 : लगता है, हम सब एक टाइटैनिक में इस समय सवार हैं और जहाज डूब रहा है 
10 : लगता है, अपना खाने-पीने का कोटा खत्म हो गया है! 
9 : मैं थककर मौत का इन्तज़ार नहीं करना चाहता… 
8 : गुरुदेव कहते हैं, ‘एकला चलो रे’ और मैं एकला चलता रहा, चलता रहा… 
7 : स्मृतियों के धागे से वक़्त को पकड़ता हूँ, ताकि पिंजर से आत्मा के निकलने का नाद गूँजे 
6. आज मैं मुआफ़ी माँगने पलटकर पीछे आया हूँ, मुझे मुआफ़ कर दो  
5. ‘मत कर तू अभिमान’ सिर्फ गाने से या कहने से नहीं चलेगा! 
4. रातभर नदी के बहते पानी में पाँव डालकर बैठे रहना…फिर याद आता उसे अपना कमरा 
3. काश, चाँद की आभा भी नीली होती, सितारे भी और अंधेरा भी नीला हो जाता! 
2. जब कोई विमान अपने ताकतवर पंखों से चीरता हुआ इसके भीतर पहुँच जाता है तो… 
1. किसी ने पूछा कि पेड़ का रंग कैसा हो, तो मैंने बहुत सोचकर देर से जवाब दिया- नीला!

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