राजस्थान के लोककलाकार मामे खान ने लोकवाद्यों की पूरी ऑर्केस्ट्रा बनाई है।
टीम डायरी
कहते हैं, मुसलमान ‘वन्देमातरम्’ नहीं गाते। उन्हें इससे आपत्ति है। कुछ हद तक यह बात सही भी है क्योंकि ख़ुद को मुस्लिम समुदाय का पैरोकार मानने, समझने और कहने वाले तमाम नेताओं के इस बाबत बयान आते रहते हैं। ऐसी कई तस्वीरें भी आती हैं, जब इस समुदाय के लोग ‘वन्देमातरम्’ के दौरान इसे गाना तो दूर, उसके सम्मान में खड़े तक नहीं होते। लेकिन नीचे जो वीडियो दिया गया है, वह इस आम वास्तविकता से उलट है।
इस वीडियो में राजस्थान के मशहूर लोकगायक मामे खान ‘वन्देमातरम्’ गाते दिख रहे हैं। यही नहीं, लोकवाद्ययंत्रों की उनकी ऑरकेस्ट्रा का हर साज़िन्दा उसी शिद्दत से ‘वन्देमातरम्’ की संगत करता दिख रहा है, जिस तन्मयता से मामे खान उसे गा रहे हैं। जबकि उनकी ऑरकेस्ट्रा में 95 फ़ीसद साज़िन्दे भी मुस्लिम हैं।
इसी स्वतंत्रता दिवस पर मुम्बई के नीता-मुकेश अम्बानी सांस्कृतिक केन्द्र में एक कार्यक्रम हुआ था। उसी कार्यक्रम का यह वीडियो है। इसे मामे खान के ही यू-ट्यूब चैनल से लिया गया है। इस चैनल को थोड़ा खँगालने पर पता चलता है कि यह कोई पहली बार नहीं है, जब मामे खान ने ‘वन्देमातरम्’ गाया हो। वे पहले भी कई मौकों पर इसे गा चुके हैं। इससे पता चलता है कि उन्होंने किसी तात्कालिक स्थिति को ध्यान में रखकर ऐसा नहीं किया है।
‘वन्देमातरम्’ गाना मामे खान की रुचि का प्रतीत होता है। क्योंकि वे गाते भी पूरा हैं। फिल्मी गायकों की तरह उसके बोलों में परिवर्तन नहीं करते। उसकी आत्मा के साथ छेड़छाड़ नहीं करते। बल्कि उसके साथ पूरी आत्मीयता से जुड़ते हैं। इतना ही नहीं, उनके इस वीडियो के नीचे दिए विवरण से एक और दिलचस्प बात चलती है कि लोकवाद्ययंत्रों की उनकी यह ऑरकेस्ट्रा भी हिन्दुस्तान में ही नहीं, सम्भवत: दुनिया में पहली और अनोखी है।
एक नज़र डालिए इस ऑरकेस्ट्रा के वाद्ययंत्रों और साज़िन्दों, संगतकारों पर…
गायकी : जमील खान, जलाल खान, लूना खान, बरकत खान, भुट्टा खान, रूपे खान, स्वरूप खान, जमाल खान।
ढोलक : सवाई खान, मुस्ताक खान, सलमान खान, दायम खान।
करतल (नारद मुनि अँगुलियों में फँसाकर बजाते हैं) : शफी खान, दिलावर खान, फिरोज खान, थाने खाने।
कमायचा (सरोद जैसा वाद्ययंत्र) : कवरू खान, घमसे खान, बक्शे खान, रफीक खान।
सुरनाई (शहनाई जैसा वाद्ययंत्र) : अजीज खान, रजब खान।
मुरली (पारम्परिक बाँसुरी) : नजीर खान, दिलवर खान।
भपंग (डमरू जैसा वाद्ययंत्र। काँख में दबाकर एक ही तरफ से बजाते हैं) : यूसुफ खान, महमूद खान, दायम खान।
नगाड़ा : शरवन राम, मुकेश
तंबूरा (शास्त्रीय तानपूरे का देसी रूप) : भालू राम, दादा खान, केसू राम।
ढोल : चनन खान, रसूल खान, रिझू खान, सरीफ खान।
चिम्प (चिमटा, फकीर लोग बजाते हैं) : घमंडे खान।
सारंगी (शस्त्रीय संगीत में भी प्रयुक्त होता है) : सद्दाम खान, शम्सू खान, जाकिर खान, असलम खान।
अलगोजा (एक साथ बजाई जाने वाली दो सीधी बाँसुरी) : शाकुर खान लंगा, इदू खान।
मोरचंग (लोहे का बना देसी माउथ ऑर्गन) : कल्याण खान, मोती खान।
मटका : सादिक खान।
इस सूची को देखकर अन्दाज़ा लग सकता है कि मामे खान न सिर्फ ‘वन्देमातरम्’ जैसी प्रस्तुतियों से देश के प्रति अपनी निष्ठा प्रदर्शित कर रहे हैं, बल्कि लोकवाद्ययंत्रों, लोककलाकारों की पहचान क़ायम रखने के लिए भी कितने समर्पित हैं। उनके जैसी शख़्सियतों की जितनी प्रशंसा, जितना समर्थन किया जाए, कम है।
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