मीडिया बताए, इस देश में सम्प्रदाय क्या एक ही ‘विशेष’ है और बाकी सब भीड़ हैं?

अनुज राज पाठक, दिल्ली

मेरी पुरानी आदत में थोड़ा परिवर्तन आ गया है। अब सुबह-सुबह अखबार से खबर नहीं पढ़ता। ख़बरिया वेबसाइटों पर ख़बरें देखने लगता हूँ। इससे पूरे दिन ताज़ा खबरें मिलती रहती हैं। मगर पता नहीं क्यों, आजकल ख़बरों को पढ़ने से सुकून नहीं मिलता। बल्कि बेचैनी ही बढ़ जाया करती है। कई बार तो ज़्यादा ही। 

कहते हैं, मीडिया वह माध्यम है जो समाज के सभी पहलुओं को सबके सामने रखता है। लेकिन सच कहूँ, तो आजकल ख़बरें पढ़ते समय ऐसा बिल्कुल भी अनुभव नहीं होता। उनकी भाषा, उनकी शैली, उनकी लाइनों में छिपा मन्तव्य, सब ऐसा लगता है जैसे कोई एक पक्ष की तरफ झुका हो और दूसरे को दबाता हो।

ख़बरें ही नहीं, ‘बड़े’ कहलाने वाले लेखकों, स्तम्भकारों के लेखन का चरित्र भी ऐसा ही एकपक्षीय आभास देता है। धर्म और सम्प्रदाय से जुड़े मामलों में तो यह एकपक्षीय आभास विशेष रूप से होता है। ख़ासकर तीज-त्यौहारों के अवसरों पर कहीं न कहीं अक्सर होने वाले तनाव से जुड़ी ख़बरों या लेखों पर ग़ौर कीजिए। अधिकांश को पढ़कर महसूस होता है, जैसे इस देश में ‘सम्प्रदाय सिर्फ़ एक ही विशेष’ है। बाकी सब भीड़ हैं मानो।  

अभी उत्तर प्रदेश के बहराइच का ही एक मामला ले लीजिए। वहाँ साम्प्रदायिक हिसा हो गई। एक बच्चे को उपद्रवियों ने घर से खींचकर बाहर निकाला और गोली मार दी। लेकिन इसके बावज़ूद मीडिया के सभी माध्यमों में इन निर्मम हत्यारों के लिए लिखा गया- ‘सम्प्रदाय विशेष के लोग’। क्यों? यही नहीं, इसके ठीक उलट जब कभी कोई कथित गौरक्षक किसी क़साई या उसके किसी सहयोगी को रंगे हाथ पकड़ लेते हैं। उसे पीटते हैं और अधिक पीटने से उसकी मौत हो जाती है, तो लिखा जाता है- “गौरक्षकों ने पीट-पीटकर मुस्लिम की हत्या कर दी।” क्यों? 

मीडिया को इन दोनों ‘क्यों’ का उत्तर गम्भीरता से देना चाहिए। क्योंकि हत्याएँ तो दोनों तरह की घटनाएँ हैं। फिर उनके बारे में लिखते हुए भेद किसलिए? अगर गौररक्षकों ने किसी की पीटकर हत्या की, जो कि ग़लत ही है ताे दूसरे सम्प्रदाय के लोगों ने भी वही ग़लती की। तब क्यों नहीं लिखा जाता कि ‘मुस्लिमों’ ने एक हिन्दू युवक को घर से खींचकर गोली मार दी। अगर ‘मुस्लिम’ समाज के किसी व्यक्ति की हत्या होने पर उसके धर्म का उल्लेख हो सकता है तो उसी सम्प्रदाय के लोग जब हत्याएँ करते हैं, धार्मिक जुलूसों पर पत्थरबाज़ी करते हैं तो उनके धर्म का उल्लेख क्यों नहीं किया जाता? जब वे आगजनी करते हैं, दंगे-फ़साद करते हैं, बलात्कार-अपहरण करते हैं, जबरन धर्मान्तरण कराते हैं, तब उनके धर्म का उल्लेख करने से परहेज़ क्यों किया जाता है? क्या वे सिर्फ़ तभी ‘मुस्लिम’ होते हैं, जब वे ‘पीड़ित’ हों? जब वे साम्प्रदायिक उन्माद से जुड़े अपराधों में सम्मिलित होते हैं, तो ‘विशेष’ हो जाते हैं? 

वे खुलेआम ‘सर तन से ज़ुदा’ के नारे लगाएँ। अपने धार्मिक ज़ुलूसों में हथियार लहराएँ। और फिर भी ‘विशेष’ कहलाएँ? वे दूसरे सम्प्रदाय के लोगों को ‘काफ़िर’ कहते फिरें। उनकी पूजा-पद्धति को नीचा दिखाएँ। उसका मज़ाक बनाएँ। फिर भी वे ‘विशेष’ कहलाएँ। जबकि कोई उनके सम्प्रदाय की किताबों में लिखी बातों का ही सार्वजनिक उल्लेख कर दे, तो वह व्यक्ति आरोपी हो जाए और ये ‘बेचारे, पीड़ित मुस्लिम’ हो जाएँ। ये कैसा विचित्र माहौल बनाया है मीडिया ने? क्या वह ‘समानता’, ‘निरपेक्षता’ जैसे शब्दों के अर्थ एकदम भूल चुका है? 

मीडिया के लिए यह आत्मचिन्तन का विषय है। उसे आत्मचिन्तन करना चाहिए। क्योंकि अगर उसका यह भेदपूर्ण रवैया देश की बहुसंख्य आबादी के चिन्तन में चढ़ गया, तो ख़ुद उसी के लिए चिन्ताएँ बढ़ जाएँगी, ये तय मानिए। सिर्फ़ उसी की ही क्यों, समाज और सरकार की चिन्ताएँ भी बढ़ सकती हैं इससे। 

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(नोट : अनुज दिल्ली में संस्कृत शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापकों में शामिल हैं। अच्छा लिखते हैं। इससे पहले डायरी पर ही ‘भारतीय दर्शन’ और ‘मृच्छकटिकम्’ जैसी श्रृंखलाओं के जरिए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। समय-समय पर दूसरे विषयों पर समृद्ध लेख लिखते रहते हैं।)

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