‘मेरो मन मेरा वृन्दावन’ : रास, रस और उपासना

समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल, मध्यप्रदेश

वृन्दावन की रसोपासना में प्रेम के उत्तुंग शिखर और विरहसिन्धु के अतल तल से प्रवेश है। इसमें पात्रता का एक ही पैमाना है- प्रेमास्पद की लीलाओं में निमग्न हो जाना। और इसका आधार बनता है रास। भौंडे सिनेमा और वेब-सीरीज़ में आप रासलीला को चाहे जिस घिनौने सन्दर्भ में देखें, लेकिन अस्ल में मानव द्वारा सम्भव विशुद्धतम भाव की अनुभूति की रीति ही रास है। रास में कहीं कोई शास्त्रीय नाट्य संस्कार नहीं। नाट्य में अभिनय होता है, यहाँ भाव में निमग्नता होती है। यह वह प्रेमघन धाम है, जहाँ जाकर फिर वापस लौटा नहीं जाता, यथा- “यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।”

लीलानुकरण के उद्धरण प्राचीन हैं। अपनी मुरली की तान से गोपियों को रास में खींचकर जब यमुना पुलिन में नटवर अदृश्य हो गए, तो कहते हैं तब विरहानल में दग्ध गोपियों ने प्रियतम की लीलाओं का अनुकरण किया। इस तरह तपन से शांति पाने का उपक्रम किया। रास में लीलानुकरण करते हैं, बृज के ब्राह्मण बालक। रास मंडली के अधिकारी रसिक परम्परा के सन्त या गृहस्थ भक्त रहते हैं, ज्यादातर निम्बार्क, गौड़ीय और वल्लभकुल सम्प्रदाय से।

बृज में एक-दो नहीं बल्कि सैकड़ों और यदि थोड़ा श्रम करें तो लाखों आख्यान मिलेंगे, जहाँ रास के दर्शन मात्र से लोगों को प्रेम-भक्ति के साधन की उपलब्धि हो गई। राधावल्लभीय सन्त बाबा प्रेमानन्द इन दिनों साधक, विशेषकर युवाओं में खासे लोकप्रिय हैं। ज्ञान और भक्ति के अद्भुत सामंजस्य भरे उनके वार्तालाप देश-विदेश विभिन्न मत-मतान्तरों के असंख्य साधकों को आकृष्ट कर रहे हैं। बताते हैं कि काशी में दशनामी सन्यास परम्परा में ज्ञान मार्ग की साधना में लम्बे समय तक निरत रहने के बाद एक सन्त उन्हें आग्रहपूर्वक रासलीला देखने ले गए। और बस फिर घनश्याम की लीला का जादू चल गया। रासलीला के आस्वादन से ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ (सारा जगत ही ब्रह्म है) भावापन्न साधु वृन्दावन आकर निकुंज लीला रस के मधुकर बन गए।

बृज की अन्यतम विभूति पंडित श्री गयाप्रसाद जी महाराज का जीवन भी रासबिहारी ठाकुर के अनन्य प्रेम से परिचालित रहा। पंडितजी महाराज का रासप्रेम सभी साधकों में सुप्रसिद्ध है। वे एक बार जिस रासबिहारी का रूप देख लेते, उस बालक को आजन्म भगवद्भाव से ग्रहण करते। और भगवान भी अपनी प्रीति निभाते। रास दर्शन के समय पंडितजी महाराज मन ही मन जो कुछ मनोरथ या प्रश्न करते, रासबिहारी उसे शब्दश: पूरा करते। कहते हैं, जब भगवद्विरह से व्यथित पंडित जी ने मन ही मन रासबिहारी ठाकुर से पूछा कि उन्हें आगे क्या करना चाहिए? तो रास के बीच से ठाकुर ने पंडितजी महाराज को आदेश दिया, “बाबा तू गिर्राज चले जा।” और बस अपने ठाकुर की आज्ञा से बाबा प्रेम से उद्भुत विरक्ति के साथ श्री गिर्राज जी की तलहटी में सेवा में आ गए। उसके बाद से और बृजवासियों में पंडितजी महाराज सचल गिर्राज के रूप मान्य हो गए।

पंडित गया प्रसाद जी महाराज का यह वीडियो देखिए। 

यह उनके लीलासंवरण के कुछ तीन माह पहले का है। यूट्यूब पर उपलब्ध यह एक अत्यन्त दुर्लभ विडियो क्लिप है। करीब 100 वर्ष से अधिक आयु में भी महाराज जी की रासबिहारी ठाकुर और उनके संगी साथियों के प्रति श्रद्धा की बानगी इस वीडियो में देखिए। इससे रासबिहारी ठाकुर के प्रति बृजवासियों के भाव का प्रमाण मिलता है।

सौभाग्य से इस बार मुझे भी वृन्दावन के कार्तिकी प्रवास में एक प्राचीन और सुप्रतिष्ठित स्थान पर रास का दर्शन हुआ। बरसाना मोर कुटी की मोरलीला का दर्शन था। राधा जू सखियों के साथ मोर देखने पहुँचीं तो वहाँ उन्हें कोई मोर नहीं दिखा। फिर यकायक माधव ही मोर बनकर प्रकट हो जाते हैं। अष्टछाप कवियों के लीलादर्शी पदों का शास्त्रीय रीति से गायन, सन्त-समाज की उपस्थिति। इस सबके बावजूद इसमें मुझे विशेष आकर्षण नहीं लगा क्योंकि एक तो मेरे अपने मन का मैल ही था, जो रसिक बिहारी, राधाजू, सखीजू के बजाय उपस्थित जनों पर यहाँ-वहाँ छिटक रहा था। कभी वहाँ बैठे बच्चों की चपलता तो कभी रासबिहारी और संगी साथियों के बीच की बातचीत पर ध्यान जा रहा था। सच कहूँ तो उससे कहीं ज्यादा गिरावट मेरे ज़ेहन में दर्ज़ थी। सोच रहा था – आधुनिकता के नाम पर मनोमस्तिष्क में जो गन्दगी भरी है, उसे हमने अंगीकार कर लिया है। उस पृष्ठभूमि में रास के पवित्र भावों में निमग्न होना कितना सम्भव है? यह विचार किसी कीमत पर छोड़ने को तैयार न था, मानो सम्पूर्ण कलियुग की ताक़त इसके पीछे लगी हुई थी।

खैर… अगले दिन कार्तिक भंडारे में जाना था। परिक्रमा मार्ग में किनारे पर कपड़ों का छोटे शामियाने के भीतर लाला, लाली और एक सखी विराजमान थे। एक ओर हारमोनियम लिए एक पंडितजी पदगान कर रह थे। तभी सफेद अचला और दुशाला लपेटे नंगे पाँव एक गौरवर्ण कृषकाय वयोवृद्ध निम्बार्की महात्मा वहाँ से गुजरे। उनकी ओर ध्यान सहसा आकर्षित होने का कारण उनकी दृष्टि थी, जो सदा भूमि पर लगी रहती। रासलीला देखते उनके पाँव ठिठके, खड़े होकर देखने लगे। तब उनके आरक्त डबडबाएं नैनों की ओर ध्यान गया। खुद को संभालकर उन्होंने भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया और फिर एकतरफ खड़े होकर चुपचाप रासबिहारी और राधाजू को निहारते रहे। देखते-देखते उनके भाव बदलने लगे। उनके वृद्ध शरीर में कम्पन होने लगा। आँखों से अश्रु बहने लगे। कोई चार-पाँच मिनट के बाद अपने सजल नेत्र चुपचाप दुशाले से पोंछकर कुछ भेंट और प्रणाम अर्पित कर धीरे-धीरे आगे बढ़ चले।

कार्तिकी पूर्णिमा पर वृन्दावन के एक महान सन्त की स्मृति में भंडारा गौशाला में था। प्रत्येक सम्प्रदाय, आश्रमों के सन्त-महन्त वहाँ उपस्थित थे। वहाँ मैंने देखा कि परिक्रमा मार्ग पर रासलीला देखते जिन निम्बार्की सन्त के दर्शन हुए थे, वे वहाँ भी पहुँचे हैं। वही भावभंगिमा, झुके हुए सजल नेत्र। आते ही गौशाला के द्वार पर ही साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और सामने दिखने वाले सभी सन्तों को नमस्कार करते आगे बढ़ने लगे। उनके हर क्रियाकलाप में दीनता, पवित्रता और प्रेम की कोई अलहदा स्थिति दिख पड़ती थी। जाते वक्त हम भी उनके पीछे चल पड़े। पीछे लौटते वे फिर रासलीला के पास खड़े रह गए। कोई घंटे भर लीला खत्म होने तक वे एक कोने में खड़े रहे। होठ कुछ काँपते या बुदबुदाते।

प्रसंग पूर्ण होने पर वे भूमिष्ठ हो प्रणाम कर आगे बढ़ चले। उन्हें जाते देखते मैं यह सोचने लगा, शायद मन में वृन्दावन बसाना इसी को कहते हैं। यदि मन वृन्दावन हो जाए, तो लाला और लाली को आने में फिर देरी की सम्भावना नहीं। और क्या यह किसी आश्चर्य से कम है कि संस्कृति के अपमिश्रण काल में भी रासरस में निमज्जित करते रसिक बिहारी, श्रीराधाजू और ललिता, विशाखादि सखियों का पाँचभौतिक वृन्दावन में आज भी दर्शन हो जाता है?
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(नोट : #अपनीडिजिटलडायरी के शुरुआती और सुधी-सदस्यों में से एक हैं समीर। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि रखते हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ भी लिखा लिया करते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराया करते हैं।)
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