प्रकृति मतान्धता का भार ही भारी मन से उठा रही है

डॉक्टर रोहित कौशिक, हापुड़, उत्तर प्रदेश से

आजकल यदि किसी प्रकार कोई परंपरा में निष्ठावान् व्यक्ति हम जैसे ज्ञानलवदुर्विदग्ध के सम्मुखी हो जाए तो क्या मज़ाल कि हम उस व्यक्ति को सुनेंगे। अरे! व्यंग्य-तर्कपूर्ण वचनों से उसके निष्ठापूर्ण हृदयरुपी छत्ते में अनगिनत वाण(शब्द)-वृष्टि कर देगें क्योंकि हम अपनी सत्ता भी उतनी ही मानते हैं जो समय पड़ने पर हमारे तर्कों के वर्म से हमे बचा ले। अरे! भाई! यही तर्क तो कवच है हमारा।

अध्यात्म, श्रद्धा, आस्था, निष्ठा, संस्कृति, सभ्यता और परम्परा ऐसे सभी शब्दों को मानो केवल ‘अनुशासन’ संज्ञा ने तिरोभूत कर दिया है। ऐसे शब्द अब प्रदर्शनार्थ हमारे विचार-संप्रेषक- फेसबुक, वॉट्स एप और ट्विटर आदि पर ही व्यवहृत हैं। व्यवहार में तो कभी से इन संज्ञाओं को दरकिनार कर दम्भी-मन विश्वविजयी बनने की कल्पना में पुलकित-सा चल पड़ा है। आप ध्यान से ऊपरी संज्ञाओं को पढेंगे तो समझ पाएँगे कि इनकी विद्यमानता में मानव मानव था। उसे म्कनबंजपवद- म् कन बव (अन्दर से बाहर लाने की क्रिया, जो संभवतः दुर्भावनाओें को भी ले आए) से अधिक शिक्षा-उपादान (निमित्तमूलक) का ज्ञान था। उस काल में मानव दृष्ट, अनुमान और आगमादि प्रमाणानुप्राणित विचारों में संचरणशील था। अर्थात् किसी वस्तु की सत्ता में वह प्रत्यक्ष के अलावा अन्य युक्त प्रमाणों को मानता था।

ख़ैर, इस प्रयोजनवादी मानव ने धर्म छोड़ा, नैतिकता छोड़ी, समभाव छोड़ा। फलतः देही ने उसके देह को छोड़ा। इस मानव के भोजन की अनैतिकता का सोचेंगे। इसने विश्राम करना भी नहीं जाना। लेटा है विश्राम के लिए, पर मोबाईल निहारता है अपलक (बिना पलक झुकाए)। आँखें विश्राम नहीं ले पातीं और डॉक्टर के पास भागता है। इसकी जीवन-शैली सुदूर, यापन-शैली भी दूर और मानव स्वयं अपने प्रति निष्ठुर। ऐसे निष्ठुर से क्या रह जाती है आस? हाय! निश्वास। पढ़ने में शायद यह वाक्य उपदेश लगे किन्तु क्या आप आज नहीं देख रहे हैं कि कोरोना नामक इस त्रासदी ने कितने देशों को सदियों पीछे पहुँचा दिया। हितभुक्, ऋतभुक्, मितभुक्। यह उपनिषद-वचन है। इसमें पदों का विपर्यय संभव है।

अरे! हितकारक ‘पदार्थ’ खाओ (हितभुक्)। लेकिन यदि ‘हित’ शब्द को मानव अध्यात्म के बिना ही सोचेगा तो- ‘मांसात् मांसं प्रवर्धते’ अन्य जन्तु के शरीर-शरीर अवयव और अण्डे भी खाएगा। इसी प्रकार ऋतु यानी मौसम के अनुकूल खाना (ऋतभुक्) और मितभुक् (सीमित खाओ)! ‘परान्न दुर्लभ है लोक में शरीर तो फिर मिल जाएगा’, ऐसी भावना के साथ नहीं। मानव ने आचार-व्यवहार त्यागा क्योंकि ये उसके लिए बीते जमाने की बीती बातें थीं। इसके साथ ही मानव ने जीवन को जीने का तरीका सदियों पहले त्याग दिया। उसने जीवन को नहीं समय को बिताने का मन बनाया अपनी जीवन-अवधि तक। औरों का आगे क्या होगा? कैसे आगामी लोग गुज़र-बसर करेंगे आदि, ऐसे चिन्तकों के चिन्ताहारक विचार उसने दरकिनार किए।

कुछ ज्ञानी कहते हैं कि – मानव हिंसक होता है। मैं कहता हूँ, “मानव ने कभी-कभी अपना हिंसक स्वभाव प्रकट किया है। वरना उसने जो भी किया, मनोविनोद के लिए किया। चाहे वह कलिंग जैसा भयंकर युद्ध हो अथवा प्रथम-द्वितीय विश्वयुद्ध हो या परस्पर संघर्ष हों। इन सबमें मानव ने अपनी महत्वाकांक्षारुपी मन-रंजन के ढीढ़ रंगों से रंगा है। चीन के वुहान (बू-गंध वाली हानि) अर्थात् श्वास-प्रश्वास को रोकने वाली नगरी से स्थानापन्न कोरोना बीमारी से मारे-मारे घूम रहे हैं।इससे चिन्तित वे भी हैं जो मानव के मनोरंजनात्मक परहानि में लिप्त नहीं थे। प्रत्यक्षतः और जीवन जी रहे थे समय नहीं यापन कर रहे थे।

मैं व्यवहारों से अनुभव करता हूँ कि मानव ने जीवन जीना प्रारंभ न करके ‘जी’ अनुसार समय-यापन करना जारी रखा है। ऐसी अन्य न जाने कितनी बीमारी मानव के ऐसे स्वेच्छा-आचरण को दण्डित करने के लिए आने वाली हैं? यह सब सोचकर ही मन त्रासद-भावों से भर जाता है। मन के अनुसार चलने से ही आज विश्व में व्यापक दुःखसागर गहराता जा रहा है। यदि नम (झुका हुआ) मन हो तो इसमें सर्वकल्याण का अंश वास कर सकता है। गर्वित-मन मन(भारमापक)भर भार की स्वार्थपरायणता से ऐसे संसार को संसरण से रोक देगा।

प्रकृति मतान्धता का भार ही भारी मन से उठा रही है। ऐसे में एक चिन्तन सर्वसुखाय ही न सही, स्वसुखाय (अपने परिवार, वर्ग आदि) मानकर ही अज्ञानाप्लावित मन को नम्र बनाने का प्रयास करें। खान-पान,चाल-चलन और रहन-सहन में अध्यात्म (अपने भीतर की ओर ले जाने वाले) पथ में -सत्व (उदात्त) रज (रागात्मक) और तम (आवरणपरक) भावों में दीपक में व्यवहृत बाती, तेल और पात्र (आधार) के समान रहें। (प्रदीपवच्चार्थतो वृत्तिः)
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(यह चिंतनशील लेख लिखने वाले डॉक्टर रोहित, उदय प्रताप इंटर कॉलेज सपनावत, हापुड़ में संस्कृत के सहायक अध्यापक हैं)

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