निर्गुण की होरी : गगन मंडल अरूझाई, नित फाग मची है…

द्वारिकानाथ पांडेय, कानपुर, उत्तर प्रदेश से

होली मतलब रंग। रंग है तो रंगने वाला होगा ही। फिर अगर कोई आए और सीधे रंगकर चला जाए तो भला होली कैसी? बिना चुहल और हँसोड़पन के भला कहीं रंगने और रंगाने का मजा है?

राधा-कृष्ण से लेकर, भूतनाथ और श्रीराम तक सबकी होली में प्रेम है। प्रिय की प्रतीति है। सशरीर उपस्थिति का बोध है। छुअन का अनुभव है और इन सबसे अधिक हिलने-मिलने का भाव है। अर्थात् सब सगुण है। फिर निर्गुण की होली कैसी होगी? निरंग? नहीं। निर्गुण की होली भी सगुण जितनी ही रंगीन है। निर्गुणी रचने वाले भी उतने ही बड़े रंगरेज हैं।

और इस भौतिक संसार में तो एक बार ही वर्ष में फागुन का महीना आता है। इसी एक अवसर पर फाग की धुन और रस सबको रससिक्त करता है। लेकिन निर्गुणी के यहांँ‌ फागुन का महीना सदा बना रहता है। ‘गगन मंडल अरूझाई, नित फाग मची है।’ रोज ही फाग का आनन्द बरस रहा है। मन में फाग का आनन्द उठ रहा है।

अबीर और गुलाल की वर्षा भी रोज हो रही है। ‘इंगला, पिंगला तारी देवै, सुखमन गावत होरी।’ प्राण संचार में सहायक इंगला और पिंगला नाड़ी ताली बजा-बजा कर नाच रही हैं। तो सुषुम्ना होरी गाकर चित्त को आनन्दित कर रही हैं। तीनों नाड़ियों की जागृति अर्थात मुक्ति।

‘फगुआ नाम दियो मोहिं सतगुरु तन की तपन बुझाई। कहै कबीर मगन भइ बिरहिनि आवागवन नसाई।’ गुरु कृपा से निर्गुणी के यहाँ ऐसा फागुन आया है, जिसने मुक्ति के कठिन मार्ग को भी उत्सव बना दिया है। इस सांसारिक आवागमन से मुक्त कर दिया है। इसीलिए यहाँ जो है, सब गुरुकृपा का प्रसाद है। ‘गुरु गुलाल जी रंग चढ़ायो, भीखा नूर भरो री।’ गुरु ने ऐसे रंग में रंग दिया है, जिसका नूर चित्त से झलक रहा है। गुरु का रंग उसके ज्ञान का प्रकाश है, जिसके बाद किसी भी तरह की कलुषता बच ही नहीं सकती है।

निर्गुण का रंग गुरु का ज्ञान है। निर्गुण का फाग उस घट-घट वासी का गुणगान है। नाड़ी जागृति ही अनाहत नाद है। निर्गुण में उस परब्रह्म के रंग में मिलकर एकाकार होना ही अन्तिम लक्ष्य है।

कबीर दास जी लिखते भी हैं…

गगन मंडल अरूझाई, नित फाग मची है। 
ज्ञान गुलाल अबीर अरगजा सखियाँ लै-लै धाई 
उमँगि उमँगि रंग डारि पिया पर फगुआ देहु भलाई 
गगन मंडल बिच होरी मची है, कोइ गुरु गम ते लखि पाई 
सबद डोर जहँ अगर ढरतु है सोभा बरनि न जाई   
फगुवा नाम दियो मोहिं सतगुरु, तन की तपन बुझाई
कहै ‘कबीर’ मगन भइ बिरहिनि आवागवन नसाई। 
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(नोट : द्वारिकानाथ युवा हैं। सुन्दर लिखते हैं। यह लेख उनकी लेखनी का प्रमाण है। मूल रूप से कानपुर के हैं। अभी लखनऊ में रहकर पढ़ रहे हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज इनके पसन्दीदा विषय हैं। वह होली पर ऐसे कुछ लेखों की श्रृंखला लिख रहे हैं, जिसे उन्होंने #अपनीडिजिटलडायरी पर प्रकाशित करने की सहमति दी है।) 
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द्वारिकानाथ की होली श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ 
3. अवध में होरी : माता सीता के लिए मना करना सम्भव न था, वे तथास्तु बोलीं और मूर्छित हो गईं
2. जो रस बरस रहा बरसाने, सो रस तीन लोक में न
1. भूत, पिशाच, बटोरी…. दिगम्बर खेलें मसाने में होरी

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