मनु भाकर ने निशानेबाज़ी में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा है।
टीम डायरी
भारत की निशानेबाज़ मनु भाकर ने रविवार को पेरिस ओलम्पिक में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। उन्होंने 10 मीटर एयर पिस्टल प्रतिस्पर्धा में यह उपलब्धि हासिल की। इसके साथ ही वह देश की पहली महिला निशानेबाज़ भी बन गईं, जिन्हेांने ओलम्पिक में पदक जीता है। उनसे पहले पुरुष निशानेबाज़ों (राज्यवर्धन सिंह राठौड़-2004, अभिनव बिन्द्रा-2008, विजय कुमार-2012, गगन नारंग-2012) ने ही ओलम्पिक पदक जीते थे।
निशानेबाज़ी में पूरे 12 साल बाद भारत के ख़ाते में ओलम्पिक पदक आया है। इस लिहाज़ से भी 22 वर्षीय मनु भाकर की यह उपलब्धि निश्चित रूप से बहुत मायने रखती है। इसीलिए उनकी चौतरफ़ा प्रशंसा भी हो रही है। हालाँकि इससे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है वह बात, जो पदक जीतने के बाद ख़ुद मनु ने कही। उनसे ख़बरनवीसों ने प्रश्न किया, “प्रतिस्पर्धा के अन्तिम चरण में आख़िरी लम्हों के दौरान आपके दिमाग़ में आख़िर क्या चल रहा था?”
इस पर उन्होंने ज़वाब दिया, “मेरे दिमाग़ भगवद् गीता चल रही थी। मैंने भगवद् गीता को कई-कई बार पढ़ा है। उसमें अर्जुन से श्रीकृष्ण कहते हैं – तुम सिर्फ़ अपने कर्म पर ध्यान दो। जिस कर्म के लिए तुम्हें चुना गया है। जो तुम्हें ज़िम्मेदारी मिली है, तुम्हें उसका निर्वाह करना है। उसके परिणाम पर ध्यान नहीं देना है। कर्म करना ही तुम्हारे वश में है, उसका परिणाम नहीं। इसलिए कर्म करो और परिणाम समय पर छोड़ दो। मैंने वही किया।”
मनु की उपलब्धि की पृष्ठभूमि में असल में यही सबसे महत्त्वपूर्ण बात रही। ऐसी, जो हर क्षेत्र में समान महत्त्व रखती है। सबके लिए मायने रखती है। सबको बराबर से प्रेरित करती है। हर काम पूर्णता से करने के लिए प्रोत्साहित करती है। और फिर परिणाम जैसा भी हो, जो भी हो, उसे स्वीकार करने की ताक़त देती है। उत्साह-हतोत्साह की जकड़न से बाहर ले जाकर फिर नए सिरे से अगला काम उतनी ही पूर्णता से करने का हौसला देती है।
कभी आज़माकर देखिए, भगवद् गीता हमारे लिए भी ऐसी ही मददगार बन सकती है। हमारा मार्गदर्शन कर सकती है। हमारी प्रेरणा, हमारा प्रोत्साहन बन सकती है।
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