पहलगााम आतंकी हमला : इस आतंक के ख़ात्मे के लिए तुम हथियार कब उठाओगे?

दीपक गौतम, सतना मध्य प्रदेश

उसने पूछा- क्या धर्म है तुम्हारा?
मेरे मुँह से निकला- राम-राम और गोली चल गई।
मैं मर चुका हूँ अब,
मगर इसका मतलब ये नहीं कि तुम बच जाओगे।

ये आतंक था या मजहबी नफरत का गुबार,
अभी पहचान होना बाकी है इसकी।
लेकिन अगर यूँ ही गोली चलेगी बेवजह,
तो तुम भी, बेमौत निपट जाओगे।

ये आतंक उसी शक्ल में आया है,
जिसने पहले न जाने कितनों को रुलाया है।
कल कोई यूँ ही आया फिर इसी भेष में,
तो तुम अपना धर्म मत बताना,
वरना मार दिए जाओगे…, हाँ, मार दिए जाओगे।

इस बहकावे में मत रहना कि अल्लाह हु अकबर कहकर बच जाओगे। 
‘धर्म’ बताने पर तुम भी गोली से दाग दिए जाओगे।
अभी ये तय नहीं कि देश के किस कोने में और कब भून दिए जाओगे?
ज़वाबी नफरत की गोली से, देश के किसी भी कोने में, छलनी कर दिए जाओगे।

मैं नहीं जानता कि गर कोई अपने ही देश में धर्म पूछकर मुझे गोली मार दे,
तो मैं कैसे, किस मुँह से कहूँगा- भारत माता की जय?
आतंक के जलजले में जुबाँ से कैसे निकलेगा- वन्दे मातरम?

मैं पूछता हूँ – मरती मानवता के बीच भी ये नफ़रत कुछ कम हो सके,
कोई तो गोली होगी इसके लिए भी, उसे कब चलाओगे?
जो काट दे जड़ें आतंक की वो तलवार कब उठाओगे?
मैं जानना चाहता हूँ- इस आतंक के ख़ात्मे के लिए
तुम हथियार कब उठाओगे?

@ दीपक गौतम

#PehalgamTerrorAttack #TerrorAttack 

————

(दीपक मध्यप्रदेश के सतना जिले के छोटे से गाँव जसो में जन्मे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से 2007-09 में ‘मास्टर ऑफ जर्नलिज्म’ (एमजे) में स्नातकोत्तर किया। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में लगभग डेढ़ दशक तक राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, राज एक्सप्रेस और लोकमत जैसे संस्थानों में कार्यरत रहे। साथ में लगभग डेढ़ साल मध्यप्रदेश माध्यम के लिए रचनात्मक लेखन भी किया। इन दिनों स्वतंत्र लेखन करते हैं। बीते 15 सालों से शहर-दर-शहर भटकने के बाद फिलवक्त गाँव को जी रहे हैं। बस, वहीं से अपनी अनुभूतियों को शब्दों के सहारे उकेर देते हैं। कभी लेख तो कभी कविता की सूरत में। अपने लिखे हुए को #अपनीडिजिटलडायरी के साथ साझा भी करते हैं, ताकि वे #डायरी के पाठकों तक पहुँचें। ये कविता भी उन्हीं प्रयासों का हिस्सा है।)

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