लोग भूल गए कि दशहरे पर पान क्यों खाते हैं और अब पूछते हैं या खाने वालों पर हँसते हैं!

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

हिन्दुस्तान सम्भवत: दुनिया में इक़लौता या फिर उन गिनती के देशों में शुमार होगा, जहाँ लोग अपनी परम्पराओं पर गर्व नहीं करते। बल्कि उनका मज़ाक बनाते हैं। उन पर सवाल करते हैं। परम्पराओं के विज्ञान को नहीं समझते मगर उथले विज्ञान की कसौटी पर परम्पराओं को कसने की कोशिश ज़रूर किया करते हैं। 

ऐसी ही एक परमपरा है दशहरे पर पान खाना और खिलाना। दशहरे की बधाई के आदान-प्रदान के दौरान कुछ लोगों से बात हुई तो इस पर भी चर्चा हो गई कि किसके यहाँ कैसे दशहरा मनाते हैं। इस मौक़े पर क्या-कुछ करते हैं। इसी क्रम में जब हमारी ओर से बताया गया कि हमारे यहाँ तो एक-दूसरे के माथे पर विजय तिलक लगाते हैं। इसके बाद मीठे पान का बीड़ा खिलाते और खाते हैं। यह सुनते ही कुछ लोग हँस दिए। ज़ाहिर है, सवाल भी किए उन्होंने। हमने उनके ज़वाब भी दिए। हालाँकि वे ज़वाबों से कितने सन्तुष्ट हुए, पता नहीं। फिर भी, उन सवालों-ज़वाबों को #अपनीडिजिटलडायरी पर दर्ज़ करने का मसला सरोकार वाला लगा, सो एक-एक कर परत खोलता हूँ, देखिए। 

ये पान खाने का क्या रिवाज़ हुआ भला? पान खाना ही क्यों, दाँत में फँस जाता है? 

तो भाई आपको पान की ख़ूबियाँ मालूम ही नहीं हैं। सुनिए, पान के पत्ते में भरपूर एंटीऑक्सीडेंट होते हैं। एंटीऑक्सीडेंट यानि प्रतिउपचायक, जो शरीर से विषाक्त पदार्थों को कम करते हैं। इससे हमारी कोशिकाएँ ख़राब होने से बच जाती हैं। उनकी उम्र बढ़ जाती है। शरीर भी कई क़िस्म के रोगों से मुक्त होता है। उसकी भी उम्र बढ़ती है। पान का पत्ता शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा भी नियंत्रित करता है। यूरिक एसिड बढ़ जाए तो पथरी हो जाती है। जोड़ों में ठहर जाए तो सूजन, जकड़न, हो जाए।  पान चबाने से विभिन्न पाचक रस पैदा होते हैं। इससे हमारा पाचन-तंत्र सुधरता है। गैस, क़ब्ज़, आदि की समस्याएँ ठीक होती हैं। मुँह में छाले होने पर, या मसूढ़ों में कोई गाँठ हो जाने पर भी पान के पत्ते औषधि का काम करते हैं। पान के पत्ते में एंटीबायोटिक गुण भी होते हैं। इससे मौसमी संक्रमण से बचे रहने में मदद मिलती है। पान के साथ लगाया जाने वाले ‘थोड़ा सा चूना‘ कैल्शियम की आपूर्ति करके दाँत मज़बूत करता है। 

मतलब, सालभर में एक दिन, दशहरे पर पान खिलाने से इतने फ़ायदे मिल जाते हैं?

ऐसा कोई दावा नहीं है कि सालभर में एक दिन पान खाने-खिलाने से इतने फ़ायदे मिल जाते हैं। उसके लिए रोज़ एक-दो पान खाने चाहिए। पहले लोग दोनों समय खाना खाने के बाद पान खाते भी थे। लेकिन, दशहरे पर पान खाने-खिलाने की परम्परा के पीछे एक विशेष कारण है। वह है- सभी परिजनों, मित्रों, परिचितों के लिए स्वस्थ निरोगी काया की कामना। इस दिन यह कामना प्रतीक रूप से इसलिए भी प्रकट होती है क्योंकि यह त्यौहार शारदीय नवरात्रि के अगले दिन आता है। और शारदीय नवरात्रि दो ऋतुओं के संधि-काल (वर्षा के बाद शरद) में आती हैं। मौसम धीरे-धीरे बदलना शुरू होता है, जो तमाम संक्रामक बीमारियाँ भी साथ लाता है। इसीलिए नौ दिनों तक उपवास के माध्यम से खान-पान का संयम भी किया जाता है। शरीर साधना की अवस्था में रहता है। फिर दसवें दिन जब वह सामान्य खान-पान की प्रक्रिया में आता है, तो उस बदलाव को वह ठीक से सँभाल ले, इसलिए पान के रूप में औषधि दी जाती है। 

अच्छा तो मीठे पान का बीड़ा ही खिलाने का क्या मतलब है?

मीठा पान इसलिए ताकि रिश्तों-नातों, परस्पर सम्बन्धों में मिठास बनी रहे। हालाँकि मीठा पान न भी हो, सादा हो, तब भी कोई हर्ज़ नहीं माना जाता। पान का अधिक महत्त्व होता है, स्वाद का नहीं। और जहाँ तक पान का बीड़ा बनाकर देने की बात है, तो हम सबने आम बोलचाल में यह सुना होगा, ‘बीड़ा उठाना’। यानि किसी काम की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेना। बस, उसी को याद करने-कराने के लिए ‘बीड़ा दिया जाता है, उठाया जाता है’। सबको स्मरण कराया जाता है कि भगवान श्रीराम ने समाज में बुराई के प्रतीक रावण को ख़त्म करने का बीड़ा उठाया था। इसी तरह, हम आप भी बुराई को ख़त्म करने का बीड़ा उठाएँ। बुराई ख़त्म करें, अच्छे वातावरण में मिलकर रहें। और माथे पर विजय तिलक लगाने के पीछे भी इसी कामना का भाव निहित होता है। 

तो क्या अब भी किसी को दशहरे पर पान खाने-खिलाने से कोई परहेज़ होगा?

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