धर्म-परम्परा में हाथियों के इस्तेमाल से ‘पेटा’ के पेट में दर्द, रोज कटते पशुओं पर चुप्पी क्यों?

पवन जैन ‘घुवारा’, टीकमगढ़, मध्य प्रदेश

‘पेटा’, मतलब पीपुल्स फॉर एथिकल ट्रीटमेन्ट ऑफ एनीमल्स। इस संगठन की कहानी विचित्र है। देशभर यह संगठन इस बात के लिए अभियान चलाता है कि पशुओं के साथ कोई क्रूरता न हो। उन्हें अच्छी स्थितियों में रखा जाए। उनकी सेहत, वगैरा का ख्याल रखा जाए। अच्छी बात है। इसमें कोई बुराई भी नहीं। हम सब इस बात पर सहमत हैं कि इंसानों की तरह पशुओं को भी अच्छा जीवन जीने का अधिकार है।

यद्यपि इस तरह की वैचारिक आम सहमति के बावजूद ‘पेटा’ के मामले मे एक दिक्कत है। यह कि पेटा को हमेशा से भारत की धर्म-परम्पराओं, आयोजनों में पशुओं के उपयोग पर आपत्ति रहती है। इसका ताजा प्रमाण है, अभी महाराष्ट्र का। वहाँ कोल्हापुर जिले में स्थित जैन समाज के नांदनी मठ में 30-35 सालों से एक हथिनी पली हुई थी। उसका नाम है, महादेवी (माधुरी)। उसे मठ में बड़े लाड़-प्यार से रखा गया, बड़ा किया गया। बीच-बीच में जैन समाज के आयोजनों में उसे सजा-सँवारकर दर्शनार्थियों के सामने भी लाया जाता रहा। 

लेकिन इसी दौरान यह देखकर ‘पेटा’ के पेट दर्द उठ गया। किसी प्राकृतिक कारण से महादेवी के शरीर पर उभर आए घाव, जैसे निशानों को आधार पर संगठन ने अदालत में याचिका लगा दी कि जैन मठ में हथिनी पर अत्याचार हो रहा है। उसे बेहद चिन्ताजनक स्थितियों में रखा जा रहा है। इसलिए उसे मठ से हटाकर किसी पुनर्वास केन्द्र में भेज दिया जाए। अदालत ने संगठन के तर्क को स्वीकार भी कर लिया और महादेवी को जामनगर स्थित ‘वनतारा’ भेजने का आदेश सुना दिया। ‘वनतारा’, जो अम्बानी समूह का ‘आलीशान खुला चिड़ियाघर’ है। 

बॉम्बै उच्च न्यायालय के आदेश पर देश की सर्वोच्च अदालत ने भी मुहर लगा दी और महादेवी को जबर्दस्ती जैन मठ से निकालकर ‘वनतारा’ भेज दिया गया। इस दौरान सामने आए वीडियो आदि में सभी ने देखा कि महादेवी को किस तरह उसकी इच्छा के विरुद्ध मठ से ले जाया गया। उसकी आँखों में आँसू भी सभी ने देखे। यहाँ तक कि ‘वनतारा’ पहुँचने के बाद भी उसकी भावुक स्थिति और वहाँ के लोगों के साथ सहयोग न करने की उसकी कोशिशें भी सबने देखीं। फिर भी ‘पेटा’ को यह समझ नहीं आया कि उससे कोई गलती हुई है। 

अलबत्ता, आम जनता को तुरन्त समझ आया कि महादेवी को इस तरह जबरन जैन मठ से नहीं ले जाया जाना चाहिए था। उसने जमकर खुलेआम सड़कों पर आकर विरोध किया। पैदल जुलूस निकाला। इस दबाव का असर यह हुआ कि अब ‘वनतारा’ के अधिकारियों, महाराष्ट्र सरकार के अफसरों, आदि ने मिलकर यह तय किया है कि महादेवी को वापस जैन मठ में भेज दिया जाएगा। इसके लिए सभी इंतजाम और सहयोग ‘वनतारा’ के जिम्मेदार लोग करेंगे। इस कदम का स्वागत है। लेकिन फिर भी मेरे सवाल अपनी जगह कायम हैं।

सवाल यह है कि विदेशी धन से संचालित ‘पेटा’ जैसी संस्थाओं को हमेशा भारत के धार्मिक-सामाजिक अनुष्ठानों से ही परेशानी क्यों होती है? भारत की संस्कृति और उसके सामाजिक ढाँचे को ही ये अपने निशाने पर क्यों लेती हैं? ‘पेटा’ को ही लें। उसे वैष्णो देवी जैसे धर्मस्थलों में पहाड़ चढ़ने के लिए जानवरों के इस्तेमाल पर भी परेशानी रहती है। मैं पूछता हूँ कि ऐसे मामलों में उसके तर्क ठीक भी मान लिए जाएँ, तब भी इस संगठन को देशभर के कसाईघरों में रोज लाखों की तादाद में कटने वाले पशुओं के मामले में दिक्कत क्यों नहीं होती? विशेष मौकों पर लाखों पशुओं की ‘कुर्बानी’ के विरोध में आवाज उठाने की इस संगठन में हिम्मत क्यों नहीं दिखती? 

ये गम्भीर सवाल हैं। इन पर भारतीय समाज के एक महत्त्वपूर्ण तथा अभिन्न हिस्से के रूप में हम सभी को विचार करना चाहिए।  

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(पवन जैन मूल रूप से बुन्देलखण्ड के टीकमगढ़ जिले के सक्रिय सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। जनसामान्य से जुड़े मसलों पर वह लगातार आवाज बुलन्द करते हैं। उनकी पत्नी प्रियंका भी उन्हीं की तरह सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय रहती हैं। लेख के रूप में वे अपने विचार #अपनीडिजिटलडायरी को व्हाट्स एप के जरिए भेजते हैं।) 

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