एक पिता की बेटी के नाम दूसरी पाती….मैं तुम्हें प्रेम की मिल्कियत सौंप जाऊँगा

दीपक गौतम, सतना, मध्य प्रदेश, 30/3/2022

प्रिय मुनिया, 

तुम्हें यह दूसरी पाती लिखते हुए बड़ा हर्ष हो रहा है, क्योंकि तुम चार दिन के बाद बीते रविवार 30 जनवरी को अस्पताल से घर आ गई हो। तुम और तुम्हारी माँ अब दोनों स्वस्थ हो। इससे बेहतर भला क्या हो सकता है। इस दौर में कोरोना माहामारी के बीच अस्पताल नाम से भी अब डर लगने लगा है। ऐसे में तुम्हारा सुरक्षित घर आ जाना किसी बड़ी नेमत से कम नहीं है। अस्पताल में कटा एक-एक दिन बड़ा कठिन और बेसबर कर देने वाला था। अब जब तुम्हें घर आए हुए हफ्ते भर से अधिक समय हो गया है, तो तुम्हें यह दूसरी पाती लिख रहा हूँ। तुम जीवन में बसन्त लेकर आई हो, तभी तो ये भी सुखद संयोग रहा कि अबकी बसन्त पंचमी भी 5 फरवरी को रही और हमारी शादी की सालगिरह भी। आज जब मैं ये पत्र तुम्हारे लिए बनाए पिटारे में पोस्ट कर रहा हूँ, तो मेरा जन्मदिन भी है। इन तरीखों में लिपटी छोटी-छोटी खुशियाँ तुम्हारे आने से और बढ़ गई हैं। 

प्रिय मुनिया, इस पत्र के साथ कुछ तस्वीरें भी तुम्हें मिलेंगी, जो इस बीते वक्त की इबारतों की गवाह होंगी, उनमें तुम्हारी नानी माँ, दादी माँ, मासी और मामा सहित हम सब का स्नेह बरसता दिख रहा है। यूँ तो तुम्हारे नन्हें पैर हमारी ज़िन्दगी की सूखी जमीन पर पहले ही कदम रख चुके हैं, लेकिन तुम्हारे पदार्पण पर तुम्हारे पैरों की ली गई छाप और तुम्हारे स्वागत में सजावट भरा घर तुम्हारे आने से और खिल उठा है। सच कहूँ तो घर अब तक घर नहीं लगता था। अब तुम्हारी किलकारियों से घर में रौनक बनी रहती है। ठीक इस वक्त उनींदी आँखों से रात के दो बजे जब मैं तुम्हें ये पत्र लिख रहा हूँ, तो मोबाइल के स्क्रीन से तुम जाग न जाओ ये भी डर सता रहा है। आँखें बीते सप्ताह भर से तुम्हारे साथ हुए रतजगों की साक्षी हैं। अब मैं और तुम्हारी माँ रात में कम अलसुबह के बाद ही अपनी नींद की ज्यादातर ख़ुराक पूरी कर पाते हैं। मेरा सुबह दफ्तर पहुँचना भी तुम्हारे जागने और सोने के हिसाब से तय होने लगा है। 

प्रिय मुनिया, तुम्हारी माँ इन दिनों अपने काम से कुछ माह की छुट्टी पर हैं, जिसे मातृत्त्व अवकाश कहते हैं। लेकिन मुझे ऐसे किसी अवकाश को लेने की इजाज़त नहीं है। मुनिया तुम्हारे आने के दो साल पहले ही मैं लगभग डेढ़ दशक की सक्रिय पत्रकारिता से छुट्टी लेकर गाँव के आग़ोश में जी रहा हूँ। अब मैं अपने एक छोटे से व्यवसाय को खड़ा करने के लिए मशक्कत कर रहा हूँ। इतने वर्ष कई शहरों की ख़ाक छानने के बाद आख़िरकार स्थायी ठिकाना अपने गृह जिले को ही बनाना पड़ा है। दर-बदर भटकने के अनुभव बटोरे, याराने इकट्ठे किए और लोगों का प्रेम समेटा। बस, यही मेरी असल पूँजी है। इसलिए मैं तुम्हें यही कह सकता हूँ कि प्रेम की राह कभी मत छोड़ना। खुद से प्रेम करना सीखोगी, तभी प्रेम के मायने समझ सकोगी और इंसानियत के लिए सबसे जरूरी इस संजीवनी का इस्तेमाल करने का हुनर तराशना तुम्हारे लिए सम्भव हो सकेगा। मैं इस बात से पूरा इत्तेफाक रखता हूँ कि प्रेम से भरा इंसान ही सारी कायनात को ख़ूबसूरती की नज़र से देख सकता है। 

प्रिय मुनिया, मैं अपने अनुभव के आधार पर बस यही कह सकता हूँ कि भले ही लाख छद्म-छलावों, झूठ, फरेब, विश्वासघात , जालसाजी और मक्कारी से भरी हो ये दुनिया। यहाँ अब भी ईमानदार, मेहनतक़श और प्रेम से भरे सच्चे लोगों की कमी नहीं है। इसलिए ये दुनिया अब भी ख़ूबसूरत है और रहने के क़ाबिल है। बस, तुम प्रेम की डगर पर चलते रहना, क्योंकि प्रेम वो ‘पारस’ है, जो पत्थर को भी सोना बना देता है। इतिहास गवाह है कि ‘प्रेमपाश’ में बँधकर स्वयं ईश्वर को भी भक्त के लिए प्रकृति के शाश्वत नियम बदलने पड़े हैं, क्योंकि ‘इस धरा पर जब कुछ नहीं था तब भी प्रेम था और जब कुछ नहीं रहेगा, तब भी सिर्फ प्रेम ही बचेगा’। 

प्रिय मुनिया, मेरी बिट्टो तुम्हारे साथ इन दिनों वक़्त बिताना जीवन के सारे तमस को हर लेना है। मैं तुम्हारे पास आकर देश-दुनिया की फिक्र और फ़िकरे सब भूल जाता हूँ। जब तुम बिछौने पर सोती हो तो तुम्हें अपलक देखने का मोह मैं छोड़ नहीं पाता हूँ। इन दिनों हो रहे रतगजों का एक ये भी कारण है। आज 6 फरवरी 2022 को मेरे इस जन्मदिन के ठीक पहले की इस रात को मैंने तुम्हें ये दूसरा पत्र लिखकर एक सुखद याद बना लिया है। चार दिन पहले से लिखे जा रहे इस पत्र को पूरा करते हुए मुझे खुशी हो रही है कि तुम्हारी मोहब्बत में तुम्हें पत्र लिखने का ये सिलसला चलता रहेगा। क्योंकि मैंने जीवन में कुछ भी अधूरा न छोड़ने की कसम खाने के बावज़ूद बहुत कुछ अधूरा ही छोड़ दिया है। मैं अपनी बेपरवाहियों, लापरवाह रवैये और बेफिक्री भरे स्वभाव पर कभी लगाम नहीं लगा सका। शायद इसीलिए वक्त के साथ-साथ और आवारा होता चला गया। बहरहाल मैं तुमसे ये पत्र पूरा करते हुए बस, इतना कहना चाहता हूँ कि मेरी ज़िन्दगी में उपलब्धियों का कोई पिटारा नहीं है। मेरी अब तक की कुल जमा ज़िन्दगी का ‘प्रेम’ ही हासिल है। यही मेरी असल पूँजी है। इसलिए मैं मेरी मिल्कियत से तुम्हें ये प्रेम की अपार सम्पदा ही सौंप पाऊँगा।

शेष अगले पत्र में…। तुम्हें ढेर सारा प्यार। लव यू। 

तुम्हारा पिता

दीपक गौतम…….7/2/2022
——— 
(दीपक, स्वतंत्र पत्रकार हैं। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में लगभग डेढ़ दशक तक राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, राज एक्सप्रेस तथा लोकमत जैसे संस्थानों में मुख्यधारा की पत्रकारिता कर चुके हैं। इन दिनों अपने गाँव से ही स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। इन्होंने बेटी के लिए लिखा यह बेहद भावनात्मक पत्र के ई-मेल पर #अपनीडिजिटलडायरी तक भेजा है। यह 4 हिस्सों में है। यह उनमें से दूसरा है।)
———
1. बेटी के नाम पहली पाती : प्रिय मुनिया, मेरी लाडो, आगे समाचार यह है कि… 

सोशल मीडिया पर शेयर करें
Apni Digital Diary

Share
Published by
Apni Digital Diary

Recent Posts

पर्यावरण दिवस, ईंधन बचाने की बातें और निजी कारों का ऐसा तमाम-जाम, दिलचस्प है न?

मैं बेंगलुरू में जहाँ रहता हूँ, वहाँ अपने घर के सामने रोज इस तरह का… Read More

3 hours ago

लिंक्डइन के जरिए नौकरी का जाल, चीन से पाँच देशों की जासूसी, भारतीय भी सावधान रहें!

लिंक्डइन के जरिए नौकरी का जाल बिछाकर, रोजगार की तलाश कर रहे लोगों को काम… Read More

1 day ago

‘शिक्षक’ ने अपने कौड़ी के ज्ञान से ‘पत्रकार’ को दो कौड़ी का साबित कर दिया, देखिए वीडियो!

देश की एक जानी-मानी ‘पत्रकार’ ने ऑनलाइन पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए कह दिया कि… Read More

2 days ago

क्या हम भारतीयों को सार्वजनिक नियम-कायदे मानने की तमीज नहीं? अभी बहस तो यही है!

अभी एक-दो दिन से मीडिया-सोशल मीडिया में यह बहस चल रही है कि हम भारतीयों… Read More

3 days ago

अपने हिस्से का योगदान दीजिए, वरना लू के थपेड़ों से रोज 3,400 लोग मरने लग जाएँगे!

एक नया अध्ययन हुआ है। इसमें भारत और उसके आस-पास के देशों में लगातार बढ़ती… Read More

4 days ago

इस लड़की ने दो लाख की नौकरी छोड़कर 60 हजार रुपए महीने में खुशी खरीदी है!

खुशी पाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। ज्यादातर लोग अमूमन बड़ी से बड़ी नौकरी… Read More

5 days ago