टीम डायरी, 30/10/2020
शरद पूर्णिमा पर भगवान कृष्ण को खीर का भोग लगाना। वृन्दावन की गोपियों के साथ उनके महारास को याद करना। उन्हें नौका विहार कराना। ये सब साल-दर-साल होता आया है। पर क्या कभी इस अवसर पर भगवान शिव की स्तुति के बारे में सोचा गया? शायद नहीं। या सोचा भी गया होगा तो बहुत कम। भाेपाल, मध्य प्रदेश से वैष्णवी द्विवेदी ने यह सोचा है। शरद पूर्णिमा का उत्सव और शिव की स्तुति। शरद-शिव-स्तुति-उत्सव। भरतनाट्यम के माध्यम से।
उद्देश्य बहुत स्पष्ट और तार्किक है उनका। चन्द्रमा शिव का श्रृंगार हैं। उनके शीश पर विराजे हैं। और शिव भगवान कृष्ण के आराध्य। ऐसे में अगर शरद के चन्द्रमा की अमृत वर्षा के दौरान शिव की स्तुति की जाए तो कृष्ण स्वयं प्रसन्न नहीं होंगे क्या? ज़रूर होंगे। बल्कि कुछ ज़्यादा ही होंगे। और फिर कहते हैं, इसी शरद पूर्णिमा की रात महादेव भी तो आए थे गोपी बनकर। वृन्दावन में भगवान कृष्ण के साथ महारास करने। तो ये मौका उनकी प्रसन्नता से भी जुड़ता है।
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(वैष्णवी छह साल की उम्र से नृत्य सीख रही हैं। बीते डेढ़ साल से वे देश की जानी-मानी नृत्यांगना डॉक्टर लता सिंह मुंशी से भरतनाट्यम की विधिवत् औपचारिक शिक्षा ले रही हैं। उन्होंने अपने नृत्य का वीडियो #अपनीडिजिटलडायरी के लिए सोशल मीडिया (Social Media) के माध्यम से भेजा है।)
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