शिखा पांडे, अहमदाबाद, गुजरात से, 22/11/2020
अल-सुबह सबसे पहले उठना। देर रात सबसे बाद में सोना। परिवार के एक-एक सदस्य की छोटी से बड़ी, हर चीज का ख्याल रखना। घर के भीतर कब, क्या और कैसे होना है, उस सबका सोचना। उसे करना और कराना। ये पहचान है भारतीय गृहिणी की।
मायके में माता-पिता, भाई, ताऊ, चाचा। ससुराल में सास-ससुर, पति, बच्चे। हर किसी की जिम्मेदारी अपने कन्धों पर लिए रहती है, भारतीय गृहिणी। इसके लिए उसे कहने-सुनने के दौरान तमगे बड़े-बड़े दिए जाते हैं। लेकिन सही मायने में श्रेय शायद ही दिया जाता हो। इन जिम्मेदारियों को निभाते हुए बहुतायत भारतीय स्त्री आज भी अपने सपने खो देती है। अपने लक्ष्य भुला देती है। रास्ता ‘अपने’ से बदलकर ‘अपनों के लिए’ के लिए कर लेती है। फिर भी उसकी मान्यता अक्सर कम ही आँकी जाती है। आख़िर क्यों? यह विचारणीय है। शायद इसलिए क्योंकि वह अपनों के लिए अपने अस्तित्व को खो देने का, भुला देने का रास्ता चुनती है। लेकिन अगर इसके उलट वह अपने अस्तित्व-व्यक्तित्व को सँवारते हुए, अपनों के लिए जिए तो? तब यकीनन उसकी साख, मान्यता बढ़ना तय हो सकता है। फिर दूसरा तथ्य ये भी है कि हम जब खुद मजबूत होते हैं, तो दूसरों की मदद अधिक बेहतर तरीके से कर पाते हैं। इस हिसाब से भी भारतीय गृहिणी का अपने बारे में सोचना लाजिमी है।
अहमदाबाद, गुजरात से शिखा पांडे यही बता रही हैं। उनकी बातें सुनने लायक हैं। सोचने, समझने लायक भी।
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(शिखा पांडे नियमित रूप से #अपनीडिजिटलडायरी के लिए अपने विचार, अनुभव भेजती हैं। उन्होंने व्हाट्स ऐप सन्देश के माध्यम से #अपनीडिजिटलडायरी को यह वीडियो भेजा है।)
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