प्रतीकात्मक तस्वीर
टीम डायरी
यह मामला जितना ‘रोचक-सोचक’ है, उतना ही ‘सरोकार’ जुड़ा हुआ भी। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की परिवार अदालत में तलाक का एक मामला चल रहा है। पत्नी ने तलाक की अर्जी लगाई है। क्योंकि उसे अपने पति के साथ खड़े होने, उठने-बैठने में शर्म आती है। और शर्म की वजह क्या है? पति पुरोहित हैं। पुरोहिताई का काम करते हैं। धोती-कुर्ता पहनते हैं, तिलक लगाते हैं, शिखा धारण करते हैं।
अब कोई पूछ सकता है कि भाई, इसमें शर्म की क्या बात है। यह तो विशुद्ध भारतीय वेश-भूषा है। पुरोहितों और उनके परिवारों के लिए यह वेश-भूषा सम्मान की बात होती है। पर नहीं, पुरोहित जी की पत्नी अब चूँकि सब-इंस्पेक्टर बन गईं हैं, इसलिए उन्हें अपने पति की वेश-भूषा अपनी शान के अनुरूप नहीं लगती। इसीलिए उन्होंने पति से माँग की है कि वह शिखा कटवा लें। धोती-कुर्ते की जगह अन्य लोगों की तरह कमीज-पतलून पहनें और पुरोहिताई का काम छोड़ दें। तभी वह उनके साथ रहेंगी। नहीं तो तलाक लेकर अलग।
पुरोहित जी अब तक पत्नी की ऐसी कोई भी माँग मानने को तैयार नहीं हैं। पत्नी भी अपनी जिद पर अड़ी हैं। परिवार अदालत के लोग उन्हें, खासकर पत्नी को, समझाने की कोशिश कर रहे हैं। मगर अब तक बात बनी नहीं है। इससे पूरी आशंका है कि इन दोनों का तलाक हो जाएगा।
मगर ठहरिए, कहानी में एक और महत्त्वपूर्ण पहलू है। यह कि पुरोहित जी की पत्नी सिर्फ अपनी मेहनत से सब-इंस्पेक्टर नहीं बनी हैं। उन्हें यह पद और प्रतिष्ठा दिलाने में पुरोहित जी की प्रेरणा, प्रोत्साहन और पुरोहिताई का बड़ा योगदान रहा है। पुरोहिताई से मिले धन से ही उन्होंने पत्नी की पढ़ाई-लिखाई, आदि का पूरा खर्च उठाया है। दिलचस्प बात है कि इस दौरान उनकी पत्नी को कभी न तो पुरोहित जी के साथ रहने-दिखने, उठने-बैठने में कोई शर्म आई और न ही पुरोहिताई से मिले पैसों का उपयोग करने में संकोच हुआ!
अलबत्ता, अब उन्हें पुरोहित जी और उनकी पुरोहिताई से छुटकारा चाहती हैं। मानो कि यह उनकी वर्दी पर कोई दाग हो!! बस, यही ‘सरोकार’ का पहलू है। हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर कहाँ जा रहे हैं हम और कहाँ पहुँच चुके हैं? कि हमें अपनी संस्कृति, अपनी परम्परा, अपनी भाषा, अपना पंथ, अपना सम्प्रदाय, सब निम्न स्तर के लगने लगे हैं? आखिर ये कैसी शिक्षा मिल रही है हमें? जो हमें हमारी जड़ों से दूर कर रही है? हमसे हमारी जमीन छीन रही है? और हम, हमारी व्यवस्था, हमारी शासन प्रणाली, हमारा शासक वर्ग, सब मूकदर्शक बना बैठा है?
सोचिए, समझिए और अपनी तरफ से जो हो सके, कीजिए। नहीं तो फिर बहुत देर हो चुकी होगी।
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