क्या नव-हिन्दुत्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए अस्तित्त्व की चुनौती है?

समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश

सन 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ हिंदुत्व ने नए चरण में प्रवेश किया है। यह अपने पूर्ववर्ती और आरंभिक रूप अलग है, जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरोध से शुरु होकर स्वतंत्र भारत के उत्तर-उपनिवेशवादी मूल्यों वाली सरकारी सत्ता से सुदीर्घ संघर्ष करता आया। राष्रीत य स्वयंसेवक संघ द्वारा उद्घोषित यह हिंदुत्व जो भारतीय संस्कृति और धार्मिक-आध्यात्मिक मूल्य और पहचान का पुश्तपनाह था। आज यकायक सत्ता के पासंग में खड़ा यह कुछ-कुछ किंकर्त्तव्यविमूढ़ भी नजर आता है, इसे हम नव-हिंदुत्व कह सकते हैं। स्पष्ट विचारधारा, नैतिक और चारित्रिक सोच रखने वाले सवा सौ साल पुराने संगठन में जब यह घट रहा है तो इसे समझने के लिए, मुझे लगता है, नव-हिंदुत्व के पुराने हिंदुत्व से पार्थक्य का अवलोकन जरूरी है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने खुद को राजनीति से अलग रखकर सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन के रूप में ही रखा है। लेकिन सत्ता निर्वात में नहीं, एक परंपरा के साथ आती है। और सत्ता के नजदीक आने पर उससे जुड़ी तमाम बातें भी प्रभावित करने लगती है। सत्ता के गलियारों में ताकत और धमक होती है तो अंधेरी दरारें और रिसन भी होती है। सत्ता का प्रबल आकर्षण होता है। मोदी युग आरंभ के साथ इस हिंदुत्व को सत्ता का समर्थन मिला तो उसमें परिवर्तन नजर आने लगे हैं।

सकारात्मक चिह्न देखें तो हम हिंदू समाज में अपने अधिकारों के प्रति एक ललक और ऊर्जा दिखाई देती है। जाति-भाषा और क्षेत्रियता के नाम पर राजनीति करने वाले देश में पहली बार राष्ट्रीय नीति और हितों पर अब बहुसंख्य हिंदू समाज एक साथ सोचता और मतदान करता है। यद्यपि इसके लिए तकनीकी, शिक्षा और मीडिया का विस्तार, वैश्विक घटनाक्रम से जुड़ाव में बढ़ोतरी का भी योगदान है। आज साहित्य, सिनेमा,अदालत से लेकर मीडिया में हिंदुओं के मसलों पर संवेदनात्मक रूख बढ़ा हैं। भारतीय नीति निर्माताओं में अब वृहद भारतीय संस्कृति के परिप्रेक्ष्य से विचार होना शुरू हो गया है। मसलन हमारा विदेश मंत्रालय अब अन्य देशाें में हिंदुओं के अत्याचारों पर टिप्प्णी करने लगा है। यह कोई मामूली बात नहीं।

इसका परिणाम ही है कि भारतीय मानस में राजनीतिक परिदृश्य पर सनातन धर्म काे लेकर खासी गहमागहमी है। मीडिया की बात करें तो यूट्यूब का जायजा लें जो खबरों का सबसे बड़ा स्रोत के रूप में उभरा है। यहां सनातन धर्म को लेकर एक मंथन की प्रक्रिया दिख रही है। ये यूट्यूबर्स अपनी रोजी रोटी के लिए फंडिंग या लोगों के व्यूज और हिट्स पर निर्भर है। यहां आप उत्साही हिंदुत्ववादी को प्रदर्शनात्मक प्रभुत्व (Performative dominance) में अपना हीनभाव उजागर करते पाएंगे। तो राजनीतिक हथकंड़ों से सनातन धर्म के वर्चस्व के सपने बेचने वाले मिल जाएंगे। पॉडकॉस्टर्स, ज्योतिषी और धर्म-अध्यात्म के व्यवसायियों का फलता-फूलता बाजार पाएंगे। और इन सब के बीच में परंपराओं का संवाहन करने वाले कुछ चैनल भी मिल जाएंगे।

इस सतही शोर-शराबे के नीचे सनातन परंपरा के समक्ष चुनौती बरकरार है। वे बढ़ रही हैं। चुनौती प्रमाणिक समग्र धार्मिक नैतिक मूल्य अाधारित दर्शन को स्थापित करने की है। आधुनिकता और प्रगति की चकाचौंध के बीच में सम्यक और समग्र विकास के प्रतिमान लाने की है। शासन व्यवस्था की अपनी परिपाटी होती है, गति और व्यवस्था होती है। न्यायपालिका की तरह ही अफसरशाही भी औपनिवेशिक चश्मे पहने हुए है। उद्योगपति, व्यवसायी, राजनीतिज्ञ और उनके दल विनाशकारी विकास में अपना उद्धार देखते हैं।

इन सबके मद्देनजर भारत के भविष्य के लिए नव-हिंदुत्व का गंभीर और प्रामाणिक अध्ययन अपरिहार्य ही है। एक उदाहरण से समझें – सनातन धर्म के श्रद्धा के केंद्र मठ मंदिरों पर भारी खर्च किया जा रहा है। रोजाना ऐसे स्थानों पर लाखों करोड़ों का हजूम जमा होता है। उसकी एक अर्थव्यवस्था विकसित हो गई है। इस व्यवसायिकरण पर राज्यों की सरकारें अपनी पीठ थपथपाती हैं। वहीं इस परंपरा के अध्ययन, अध्यापन, विज्ञान, शिल्प, छंद, आगम, वेद-शास्त्र और विद्याओं का संरक्षण पारंपरिक साधनहीन ब्राह्मणों के भरोसे छोड़ दिया गया है। गौहत्या निषेध, पर्यावरण सुरक्षा, जैव सुरक्षा-संवर्धन, ग्राम विकास जैसे कई मूलभूत विचारों को संघ सरकार के एजेंडे में शामिल करवाने में नाकामयाब दिख रहा है। परंपरा के मूल ग्रंथों का अध्ययन अध्यापन करने वाले वर्ग का औपनिवेशिक तिरस्कार आज भी पूर्ववत जा

री है। नई शिक्षा नीति के नाम पर जो सुधार की कल्पना की गई उसकी तामील करने वाली फौज नकली, मौकापरस्त और अधकचरे ज्ञान वाली है। प्राथमिक शोध में अपने काे खपा देने वाले विद्वान का कोई मूल्य नहीं। हां ब्रह्मास्त्र को न्यूक्लियर मिसाइल या महामुनि नारद को दुनिया का प्रथम पत्रकार घोषित कर आगे बढ़ जाने वाले लोगों की कतार है। कोई आश्चर्य नहीं देश भर के राज्यों में शराब नीति, खनन, वनों का दोहन, अाधुनिक प्रदूषणकारी विकास मॉडल के विस्तार को लेकर सरकार जिस त्वरा से काम कर रहीं है वह साफ तौर पर संघ के विचारधारा से विपरीत ही दिखता है। अब यहां शिकार और शिकारी के दाेनों के साथ दौड़ने की सुविधा नहीं है।

कहने की आवश्यकता नहीं नव-हिंदुत्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए भी अस्तित्व की चुनौती है। यदि सत्ता से नजदीकी उसे अपने मूल लक्ष्य और चरित्र पर समझौता करवाती है तो यह उसके लिए आत्मघाती होगा। ऐसे में जबकि संघ को राजनीतिक बल हासिल हो चुका है, उसे हर स्तर पर आध्यात्मिक दृष्टि संपन्न होने और धर्म-नीति और शास्त्र के लिए परंपरा के प्रामाणिक स्थानों से तुरंत जुड़ना बेहद अहम है। संगठन में भी ऐसी दृष्टि और चरित्र रखने वाले लोगों को जिम्मेदार पदों पर बढ़ाना जरूरी है। भारत के सांस्कृतिक विरासत को पुष्ट करने के लिए धार्मिक मूल्यपरक पुनर्जागरण का यही राजमार्ग है।

(नोट : समीर #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सुधी-सदस्यों में से एक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं। सनातन धर्म, संस्कृति, परम्परा तथा वैश्विक मसलों पर अक्सर श्रृंखलाबद्ध लेख भी लिखते हैं।) 

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समीर के पिछले 10 लेख 

21 – धुरंधर : तमाम अस्वीकरण के बावजूद साफगोई से अपनी बात कहने वाली फिल्म!
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(दूसरा भाग)
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(पहला भाग)

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