शिवाजी ‘महाराज’ : राज्याभिषिक्त हों, सिंहानस्थ हों शिवबा

बाबा साहब पुरन्दरे द्वारा लिखित और ‘महाराज’ शीर्षक से हिन्दी में प्रकाशित पुस्तक से

महाराज का सबसे चहेता और महत्त्वपूर्ण किला पन्हालगढ़ अभी स्वराज में वापिस नहीं आया था। महाराज को पन्हाला वापस लेने की तीव्र इच्छा थी। एक दिन रायगढ़ पर महाराज ने अन्नाजी दत्तो सुरनिस को पन्हाला की मुहिम पर जाने को कहा। अन्नाजी राजगढ़ (दिनांक 6 जनवरी 1673) से चले। बाद में महाराज ने कोंडाजी फर्जन्द को भी अन्नाजी की मदद के लिए भेजा। इन लोगों ने खुफिया तौर से जासूस की। पन्हाला की सारी जानकारी इकट्ठा की। फिर कोंडाजी सिर्फ 60 जवानों के साथ किले की कगार पर चढ़ गए। उन्होंने आदिलशाही फौज पर उस काली आधी रात में जोरदार हमला किया। किलेदार मारा गया। गढ़ फतह हुआ। जीत की खबर महाराज तक पहुँच गई। वह बेहद खुश हुए।

पन्हाला को देखने आए महाराज (दिनांक 16 मार्च के करीब)। दत्ताजी पन्त ने महाराज पर सोने के फूल बरसाए। महाराज ने गढ़ का मुआयना किया। उन्हें यकीन था कि बीजापुर से कोई न कोई सरदार यकीनन पन्हाला आएगा। सो, “आने वाले सरदार को बीच राह में रोक लो अथवा कैद करो”, ऐसा आदेश देकर महाराज ने इसके लिए सरसेनापति प्रतापराव गूजर को भेजा। प्रतापराव कोल्हापुर प्रान्त की पूर्व डोन नदी के समीप उंबरानी गाँव के पास ही एक जगह ताक में बैठ गए। बीजापुर दरबार ने अब्दुल करीम बहलाेल खान पठान नाम के शूर सेनानी को पहली मुहिम पर भेजा। प्रतापराव ने अचानक इस पठान को घेर लिया। झड़पें शुरू हुईं। पठान की फौज को पानी कम पड़ने लगा।

मराठों के शिकंजे में बहलोल खान बुरी तरह फँस गया। लगातार हारने लगा। आखिर उसने जान की बाजी लगाई। फिर भी हार ही हाथ आई (दिनांक 15 अप्रैल 1673)। पानी के लिए उसके लोग छटपटाने लगे। हारकर वह शरण आया। प्रतापराव ने उस पर रहम किया। खारिज की रकम लेकर उसे छोड़ दिया। यह खबर सुन महाराज आगबबूला हुए। बौखला कर उन्होंने खत लिख भेजा, “शत्रु को कैद क्यों नहीं किया आपने? अब वह फिर से स्वराज्य पर हमला करेगा। जब तक उसका खात्मा नहीं करते, तब तक आप रायगढ़ आकर हमें मुँह न दिखाएँ।” बहलोल खान को जीतने की खुशी में प्रतापराव मस्त थे। उन्हें लगा था कि महाराज भी शाबाशी देंगे। म्रगर महाराज का पत्र पढ़कर उनकी सारी खुशी गायब हो गई। महाराज की क्रोधित मूर्ति उन्हें याद आ गई। उनको अपनी भूल का हुआ। लेकिन अब क्या हो सकता था? धनुष से छूटा बाण और खिसका हुआ बैरी भी कभी वापिस आता है भला?

प्रतापराव ने हाथ आए शत्रु को छोड़ दिया। महराज को अफसोस हुआ। गुस्सा आया। उनका गुस्सा मुनासिब भी था। सेनापति को करना चाहिए सिर्फ युद्ध। सन्धि, करार अथवा राजनीतिक फैसले करता है राजमंडल। उससे बिना पूछे सेनापति को कोई भी राजनीतिक कदम नहीं उठाना चाहिए। राव गलती समझ गए थे और उधर महाराज की भविष्यवाणी भी सच साबित हुई। सचमुच ही बहलोल खान तिकोटे में स्वराज्य पर धावा बोलने की तैयारी कर रहा था। प्रतापराव स्वराज्य के चाँदगढ़ परगने की सीमा पर निगरानी रख रहे थे। वह अपने से ही नाराज थे।

इस समय महाराज रायगढ़ पर थे। रायगढ़ में काशीक्षेत्रस्थ एक महापंडित खास तौर से महाराज के दर्शन को पधारे हुए थे। वह थे वेद-वेदान्त के ज्ञानी गागाभट्ट। उनकी और महाराज की बहुत पुरानी 10 साल पहले की जान-पहचान थी। तभी वह महाराज से मिल चुके थे (सन् 1664 में)। मूल पैठण का यह भट्ट-कुल, स्थायी रूप से काशी में रह रहा था। विश्वामित्र गोत्र के देशस्थ ऋग्वेदी, मराठी ब्राह्मण थे वह। इस समय औरंगजेब ने काशी विश्वेसर का मन्दिर तहस-नहस कर डाला था। पूरी जिन्दगी में गागाभट्ट ने सुल्तानी उत्पात ही देखा था। सारा देश सुल्तानी हुकूमत के जुल्मों तले रौंदा जा रहा था। ऐसे में इस शूर, दयालु, लोकसेवक, न्यायी, उदार, नीतिमान, धर्मराज शिवाजी ने हिन्दवी स्वराज्य का निर्माण किया था। रायगढ़ का रामराज्य देख भट्ट के मन को सुकून मिल रहा था।

तब उस ज्ञानसूर्य गागाभट्‌ट के हृदय में महाराज के प्रति असीम प्यार उमड़ आया। मुलाकात में वह राजा से बोले, “महाराज आपने इतना समृद्ध, समर्थ कल्याणकारी राज्य निर्माण किया है। लेकिन इस राज्य का सिंहासन नहीं है। इस महान संस्कार के लिए आपको सिंहासन, छत्र, चँवर आदि सार्वभौम चिह्नों को स्वीकार कर राज्याभिषेक करा लेना चाहिए।” राज्याभिषेक? महाराज का राज्याभिषेक? हमारा राजा छत्रपति, सिंहासनस्थ महाराजाधिराज होगा? कितनी खुशी की बात! लेकिन स्वयं महाराज शान्त ही थे। हालाँकि महाराज को गागाभट्ट का कहना जँच रहा था क्योंकि यह संस्कार-समारम्भ होना आवश्यक था। बिना उसके अपने ही राजा के, स्वराज्य के सार्वभौमत्व की महत्ता दुनिया को मालूम नहीं होगी। मगर फिर भी उन्होंने इस बात के लिए एकदम से हामी नहीं भरी।

महाराज ने स्वराज्य के सभी प्रतिष्ठित लोगों को बुलाकर यह विचार उनके सामने रखा। सभी ने खुशी-खुशी अपनी सहमति प्रकट की। तब जाकर महाराज ने गागाभट्ट को राज्याभिषेक के लिए हाँ कहा। महाराज के राज्याभिषेक की खबर हवाओं ने सह्याद्रि की चोटियों को सुनाई। वे अभिमान से तन कर खड़ी हो गई। देश के आँचल में बसे लोग-बाग खुशी से झूम उठे और माँ जिजाऊ साहब की खुशी के तो क्या कहने? गागाभट्ट की इस शुभ आज्ञा से उनके थके हुए गात्रों में नवचेतना का संचार हुआ। शिवबा के राज्याभिषेक से उनके कठिन व्रत का उद्यापन होने वाला था।

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(नोट : यह श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी पर डायरी के विशिष्ट सरोकारों के तहत प्रकाशित की जा रही है। छत्रपति शिवाजी के जीवन पर ‘जाणता राजा’ जैसा मशहूर नाटक लिखने और निर्देशित करने वाले महाराष्ट्र के विख्यात नाटककार, इतिहासकार बाबा साहब पुरन्दरे ने एक किताब भी लिखी है। हिन्दी में ‘महाराज’ के नाम से प्रकाशित इस क़िताब में छत्रपति शिवाजी के जीवन-चरित्र को उकेरतीं छोटी-छोटी कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ उसी पुस्तक से ली गईं हैं। इन्हें श्रृंखला के रूप में प्रकाशित करने का उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि पुरन्दरे जी ने जीवनभर शिवाजी महाराज के जीवन-चरित्र को सामने लाने का जो अथक प्रयास किया, उसकी कुछ जानकारी #अपनीडिजिटलडायरी के पाठकों तक भी पहुँचे। इस सामग्री पर #अपनीडिजिटलडायरी किसी तरह के कॉपीराइट का दावा नहीं करती। इससे सम्बन्धित सभी अधिकार बाबा साहब पुरन्दरे और उनके द्वारा प्राधिकृत लोगों के पास सुरक्षित हैं।) 
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शिवाजी ‘महाराज’ श्रृंखला की पिछली 20 कड़ियाँ 
45- शिवाजी ‘महाराज’ : शिव-समर्थ भेंट हो गई, दो शिव-सागर एकरूप हुए
44- शिवाजी ‘महाराज’ : दुःख से अकुलाकर महाराज बोले, ‘गढ़ आया, सिंह चला गया’
43- शिवाजी ‘महाराज’ : राजगढ़ में बैठे महाराज उछल पड़े, “मेरे सिंहों ने कोंढाणा जीत लिया”
42- शिवाजी ‘महाराज’ : तान्हाजीराव मालुसरे बोल उठे, “महाराज, कोंढाणा किले को में जीत लूँगा”
41- शिवाजी ‘महाराज’ : औरंगजेब की जुल्म-जबर्दस्ती खबरें आ रही थीं, महाराज बैचैन थे
40- शिवाजी ‘महाराज’ : जंजीरा का ‘अजेय’ किला मुस्लिम शासकों के कब्जे में कैसे आया?
39- शिवाजी ‘महाराज’ : चकमा शिवाजी राजे ने दिया और उसका बदला बादशाह नेताजी से लिया
38- शिवाजी ‘महाराज’ : कड़े पहरों को लाँघकर महाराज बाहर निकले, शेर मुक्त हो गया
37- शिवाजी ‘महाराज’ : “आप मेरी गर्दन काट दें, पर मैं बादशाह के सामने अब नहीं आऊँगा”
36- शिवाजी ‘महाराज’ : शिवाजी की दहाड़ से जब औरंगजेब का दरबार दहल गया!
35- शिवाजी ‘महाराज’ : मराठे थके नहीं थे, तो फिर शिवाजी ने पुरन्दर की सन्धि क्यों की?
34- शिवाजी ‘महाराज’ : मरते दम तक लड़े मुरार बाजी और जाते-जाते मिसाल कायम कर गए
33- शिवाजी ‘महाराज’ : जब ‘शक्तिशाली’ पुरन्दरगढ़ पर चढ़ आए ‘अजेय’ मिर्जा राजा
32- शिवाजी ‘महाराज’ : सिन्धुदुर्ग यानी आदिलशाही और फिरंगियों को शिवाजी की सीधी चुनौती
31- शिवाजी महाराज : जब शिवाजी ने अपनी आऊसाहब को स्वर्ण से तौल दिया
30-शिवाजी महाराज : “माँसाहब, मत जाइए। आप मेरी खातिर यह निश्चय छोड़ दीजिए”
29- शिवाजी महाराज : आखिर क्यों शिवाजी की सेना ने तीन दिन तक सूरत में लूट मचाई?
28- शिवाजी महाराज : जब शाइस्ता खान की उँगलियाँ कटीं, पर जान बची और लाखों पाए
27- शिवाजी महाराज : “उखाड़ दो टाल इनके और बन्द करो इन्हें किले में!”
26- शिवाजी महाराज : कौन था जो ‘सिर सलामत तो पगड़ी पचास’ कहते हुए भागा था?

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Neelesh Dwivedi

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