बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबन्धित, ऑस्ट्रेलिया जैसा काम अन्य देशों में भी हो!

टीम डायरी

ऑस्ट्रेलिया में इसी 10 दिसम्बर से 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग पूरी प्रतिबन्धित हो जाने वाला है। दुनिया की तमाम दिग्गज कम्पनियों (फेसबुक की मालिक कम्पनी मेटा, आदि) ने मजबूरी में ही सही इस कानून की अनुपालना शुरू कर दी है। सूचनाएँ हैं कि उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के उन सभी उपयोगकर्ताओं के खाते हटाने या बाधित करने शुरू कर दिए हैं, जिनकी उम्र 16 वर्ष से कम है। हालाँकि पहले इन कम्पनियों ने इस कानून को मानने में आना-कानी की थी। अपने रसूख के बलबूते इसे बदलवाने की कोशिश भी की। मगर ऑस्ट्रेलिया में उनकी एक भी नहीं चली और अब आखिर उन्हें इस कानून के मुताबिक कदम उठाने पड़ रहे हैं।  

ऑस्ट्रेलिया की आबादी यही कोई 2.7 करोड़ है। इनमें से 10 लाख के आस-पास 16 साल से कम उम्र के बच्चे हैं। इनमें से 96 प्रतिशत बच्चों के किसी न किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर खाते हैं। इससे उनमें कई तरह की मानसिक और शारीरिक समस्याएँ सामने आ रही हैं। बच्चों के अभिभावक इन स्थितियों से स्वाभाविक रूप से परेशान हैं। यद्यपि उन्हें अब राहत मिलने का भरोसा है। इसके बाद ऑस्ट्रेलियाई विशेषज्ञों का दावा है कि जल्द उनके देश की तरह दुनिया के अन्य देश भी ऐसा ही कदम उठाएँगे। पर सवाल है कि क्या ऐसा होगा? जवाब में दावे से कोई भी ‘हाँ’ नहीं कह सकता। लेकिन फिर भी दुनियाभर के अधिकांश माता-पिताओं की अपेक्षा यही होगी कि उनके बच्चों को सोशल मीडिया के मनोवैज्ञानिक प्रदूषण से मुक्त रखा जाए, और सरकारें सख्त कदम उठाएँ। 

ऐसी उम्मीद करने का कारण सभी जगह समान है कि सोशल मीडिया बच्चों तो बच्चों, बड़ों के दिमाग में भी तमाम मनोवैज्ञानिक विकार भर रहा है। जैसे- छोटे-छोटे वीडियो (रील) बनाना, वह भी किसलिए? घर बैठे-बैठे पैसा और नाम कमाने के लिए। इस तरह की रील के लिए लोग हद से भी ज्यादा वाहियात सामग्री तो तैयार कर ही रहे हैं, अपनी जान भी जोखिम डाल रहे हैं, जान दे भी रहे हैं। इतना ही नहीं, जो लोग रील नहीं बनाते वे भी सोशल मीडिया की वजह से  एक विचित्र मनोवैज्ञानिक विकार के शिकार हो रहे हैं। वह विकार है आत्ममुग्धता। मतलब अपने में मुग्ध रहना। अपने वीडियो और तस्वीरें आदि सोशल मीडिया पर डालकर हर समय यह देखना कि कितने लोगों ने उन्हें देखा है या कैसी प्रतिक्रिया दी है। ऐसे ही, कुछ भी सही-गलत लिखना, ज्ञान बाँटना और फिर उस पर खुद को विषय का विशेषज्ञ मान बैठना। ऐसी सभी मनोवैज्ञानिक समस्याओं की एक जड़ है- सोशल मीडिया। 

लिहाजा, यह अपेक्षा हर देश की सरकारों से करनी चाहिए कि वे कम से कम किशोरों के दिमागों से यह मनोवैज्ञानिक प्रदूषण हटाने के लिए जिम्मेदारी भरा कदम उठाएँगी। देखते हैं आगे क्या होता है!  

सोशल मीडिया पर शेयर करें
From Visitor

Share
Published by
From Visitor

Recent Posts

56 साल के ‘युवा’ सत्ता के लिए आग भड़का रहे और 28 साल के देश को नई ऊँचाई दे रहे!

अभी सोमवार, 20 जुलाई को संसद का मॉनसून सत्र शुरू हुआ। इससे कुछ समय पहले… Read More

2 hours ago

वंदेमातरम

जय जय श्री राधे Read More

1 day ago

‘सरल भक्तमाल’- 11..: तर्क कोई कितने भी दे, वैष्णव भक्ति के मूल सम्प्रदाय तो चार ही हैं!

कलि युग में भक्ति मार्ग पाखण्ड से घिरा रहता है, इसलिए भगवान के भजन-पूजन, नाम… Read More

3 days ago

फिल्म ‘थ्री इडियट’ के फुनसुक वाँगड़ू नहीं हैं सोनम वाँगचुक, फिर भी ऐसा प्रचार क्यों?

शिक्षा प्रणाली में मूलभूत सुधार और केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की माँग… Read More

4 days ago

केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मण्डल ने अंग्रेजी को ‘विदेशी भाषा’ कह दिया, तो हाय-तौबा क्यों?

भाषा को लेकर बेवजह की हाय-तौबा मची हुई इन दिनों। वजह वही, पीढ़ियों से भारतीय… Read More

5 days ago

जिन्हें सच्ची खुशी की तलाश, वे आईआईटी प्रवेश परीक्षा में जानबूझकर फेल भी हो जाते हैं!

जिन्दगी अपनी है, चुनाव भी अपने ही होते हैं। ऐसा अक्सर कहा जाता है। लेकिन… Read More

6 days ago