दत्तात्रेय के 24 गुरुओं का किस्सा बताता है- सिखाने से ज्यादा सीखना महत्त्वपूर्ण!

टीम डायरी

आज, चार-पाँच दिसम्बर 2025 की दरम्यानी रात को अगहन मास की पूर्णिमा है। पौराणिक साहित्य में महर्षि अत्रि और उनकी पत्नी सती अनसूया के पुत्र दत्तात्रेय के जन्म की तिथि भी यही बताई गई है। दत्तात्रेय जी को त्रिदेव (ब्रह्मा जी, विष्णु जी और शिव जी) का संयुक्त अवतार कहते हैं। इसीलिए चित्रों में उनके तीन मुँह और छह भुजाएँ दिखाई गई हैं। यद्यपि उन जैसे महापुरुषों का पूरा जीवन चरित्र ही अनुकरणीय होता है, लेकिन दत्तात्रेय जी के 24 गुरुओं से जुड़ा प्रसंग पूरी तरह भिन्न है। वह प्रसंग इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति के लिए वास्तव में यह मायने नहीं रखता कि उसे कितना सिखाया गया। बल्कि यह अधिक महत्त्व रखता है कि उसने खुद कितना सीखा है। दत्तात्रेय जी ने अपने जीवन में जिन 24 गुरुओं से शिक्षा ग्रहण की, उनमें से किसी ने भी उन्हें बैठकर विधिवत शिक्षा नहीं दी। बल्कि उन्होंने ‘अपने इन गुरुओं’ के आचरण से खुद ही देख-समझकर शिक्षा ली।

जैसे- उन्होंने पृथ्वी (1) से सहनशीलता सीखी। साथ में यह भी कि लोग भले आप पर पैर रखें, चोट पहुँचाएँ, मगर आप उन्हें बदले में सिर्फ प्रेम दें, उनका पोषण करें। वायु (2) से उन्होंने निर्मलता में रमण करना सीखा। वह भी सुगन्ध, दुर्गन्ध में भेद किए बिना। हवा में सुगन्ध, दुर्गन्ध दोनों का मिश्रण होता है। लेकिन थोड़ी ही दूर में वह अपने मूल निर्मल स्वरूप में बहने लगती है। आकाश (3) से निरपेक्ष रहना सीखा। अलग-अलग समय में आकाश में भिन्न-भिन्न रंग दिखते हैं। मगर कोई रंग आकाश पर चढ़ता नहीं। वह अपना वास्तविक रंगहीन रूप कायम रखता है। दत्तात्रेय जी ने जल (4) से पवित्रता, विनम्रता का भाव सीखा। जल हर तरह की शुद्धियों, अशुद्धियों को पीछे छोड़ते हुए, अपनी पवित्रता कायम रखकर हमेशा नीचे की ओर बहता है। अग्नि (5) से उन्होंने विभिन्न परिस्थिति में ढल जाना सीखा। आग का अपना आकार नहीं होता, वह हर आकार में ढल जाती है।

सूर्य (6) से सीखा कि आत्मा एक है, मगर वह कई रूपों में हमें दिखाई देती है। सूर्य अलग-अलग माध्यमों से भिन्न दिखाई देता है। चन्द्रमा (7) से सीखा कि बाहरी आकार की घट-बढ़ से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। कबूतर (8) से सीखा कि किसी से बहुत ज्यादा स्नेह करने पर व्यक्ति बन्धन में बँध जाता है। इसलिए इससे बचना चाहिए। अजगर (9) से सीखा कि ईश्वर ने सबके भरण-पोषण का प्रबन्ध पहले ही कर रखा है। इसलिए प्रभु की कृपा से जो मिले, उतने में ही सन्तुष्ट रहें। हाथी (10) से सीखा कि आसक्ति में बँधने का सबसे बड़ा माध्यम स्त्री है। हिरण (11) से सीखा कि अपने आनन्द के चरम में भी असावधान नहीं होना है। हमेशा सचेत रहना है। सर्प (12) से सीखा कि कभी एक स्थान पर टिक कर नहीं रहना चाहिए। यह भी बन्धन का कारण होता है। मकड़ी (13) से समझा कि पूरी सृष्टि का मायाजाल रचने और फिर उसे समेट लेने वाले एक ईश्वर ही हैं। भृंगी कीड़े (14) से सीखा कि जैसी सोच में लगाएँगे, वह वैसा ही हो जाएगा। भँवरे (15) से सीखा कि जहाँ भी सार्थक बात सीखने मिले, सीख लेना चाहिए। ठीक वैसे ही जिस तरह भँवरा अलग-अलग फूलों से पराग ले लेता है। पतंगे (16) से सीखा कि रूप-रंग का आकर्षण मृत्यु का कारण बनता है। मधुमक्खी (17) से सीखा कि जरूरत से ज्यादा संग्रह नहीं करना चाहिए। 

समुद्र (18) से उतार-चढ़ाव के बावजूद धीर, गम्भीर, गतिशील बने रहना सीखा। मछली (19) से सीखा कि जीभ की तुष्टि का लोभ भी मृत्यु का कारण बनता है। कुरर पक्षी (20) से सीखा कि जिसे हम अपना समझ रहे हैं, वह हमारा नहीं है। पहले किसी और का था और कल किसी अन्य का होगा। तीर बनाने वाला (21) से सीखा कि ध्यान केन्द्रित करने की अवस्था इतनी शीर्ष भी हो सकती है कि अपना काम करते समय राजा की सवारी भी पास से निकल जाए तो पता न चले। एक दुधमुँहे बच्चे (22) से हमेशा इच्छाओं, अपेक्षाओं से मुक्त, चिन्ताओं से मुक्त और प्रसन्न रहना सीखा। कुमारी कन्या (23) से सीखा कि अपने उद्देश्य की तरफ अकेले बढ़ना श्रेयस्कर है। बहुत लोगों के संग से ध्यान भंग होने, उद्देश्य से भटकने, काम बाधित होने की सम्भावना रहती है। और पिंगला (24) नामक वेश्या से सीखा कि वास्तविक सुख धन, वैभव, कामेच्छाओं में नहीं है, बल्कि भगवद् भजन में है।

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