प्रतीकात्मक तस्वीर
ज़ीनत ज़ैदी, शाहदरा, दिल्ली
हम उस भारत के नागरिक हैं, जहाँ की धरती को जन्मभूमि नहीं, बल्कि मातृभूमि समझा जाता है। हम अपने देश को ठीक उसी तरह इज्जत देते हैं, जैसे अपने माता-पिता को। हमारे देश की संस्कृति में माता-पिता को किसी खास दिन या मौके पर नहीं, बल्कि हर दिन पूजा जाता है। बच्चे उनके कदमों में स्वर्ग देखते हैं।
और हमारे इसी देश का एक पहलू ये है कि यहाँ लोग अब अपने बच्चों की मार्कशीट को विजिटिंग कार्ड की तरह प्रयोग कर रहे हैं, करना चाहते हैं। यानी बच्चों को उनकी परीक्षाओं में मिले नंबरों को शेखी बघारते हुए सबको दिखाना चाहते हैं। और उन्हें इस बात का अंदाज़ा तक नहीं है कि उनकी यह इच्छा उनके बच्चों के लिए कैसी जानलेवा साबित हो रही है। राजस्थान के कोटा में पढ़ाई के दबाव में बच्चों की आत्महत्याओं के मामले, बोर्ड परीक्षाओं में अधिक से अधिक नंबर लाने का दबाव न झेल पाने वाले बच्चों की ख़ुदकुशी के मामले, ऐसे ही उदाहरण हैं।
एक बच्चा बड़े होकर कैसा इंसान बनता है, ये सिर्फ उसके ऊपर निर्भर नहीं होता। उसकी शिक्षा ,समूह, संचार और सबसे ज़रूरी परवरिश पर भी यह निर्भर करता है। लोग अक्सर अपने बच्चों को हर ऐश-ओ-आराम मुहैया कराने के लिए सारी उमर लगा देते हैं। और फिर इसके बदले में यह उम्मीद पालते हैं कि उनका बच्चा बड़े होकर उनके सपने पूरे करे। उनकी इच्छाओं के मुताबिक अपने भविष्य की दशा और दिशा तय करे।
बच्चों का फ़र्ज़ होता है अलबत्ता कि वे अपने माता-पिता की सेवा करें। उनका साथ दें। उनकी अपेक्षाएँ भी पूरी करें। लेकिन इस सबके बीच उनके अपने सपने भी होते हैं। उनकी अपनी अपेक्षाएँ होती हैं। उनका ख़्याल भी तो रखा जाना चाहिए? वह कौन रखेगा? माता-पिता ही न? बस, यही समझने की ज़रूरत है।
उम्मीद लगाने में बुराई नहीं। अपेक्षाएँ भी की जा सकती हैं। आख़िर हम इंसान ही तो हैं। लेकिन अपनी उम्मीदें, अपेक्षाएँ जबरन बच्चों पर थोपना ग़लत है। उन्हें पूरी उम्र इसका दबाव झेलने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से उनकी ज़िन्दगी या तो उन पर बोझ बन जाती है या फिर उन्हीं के हाथों से उनके जीवन की डोर छूट जाती है। सोचिए, ऐसा होने पर क्या हम ख़ुद को माफ़ कर पाते हैं? कर पाएँगे? यक़ीनन नहीं।
इसलिए बेहतर है कि बच्चों को भी थोड़ी गुंजाइश दी जाए। उन्हें थोड़ा खुलकर सोचने दिया जाए। उन्हें उनके भविष्य का रास्ता हम दिखाएँ। उन्हें अच्छा-बुरा समझाएँ। सही-ग़लत बताएँ। और फिर विकल्प चुनने का हक उन्हें ही दिया जाए। ताकि उन्हें ऐसा न महसूस हो कि वे किसी मजबूरी में उस चुने हुए रास्ते पर चल रहे हैं। वे अपने चुने हुए विकल्प, अपनाए हुए रास्ते के साथ न्याय कर सकें। और ख़ुशहाल ज़िन्दगी जी सकें।
आख़िर हर माता-पिता अपने बच्चों के लिए आख़िरी तौर पर इतना ही तो चाहते हैँ। इसलिए सोचिए ज़रूर इस पर!
जय हिन्द।
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(ज़ीनत #अपनीडिजिटलडायरी के सजग पाठक और नियमित लेखकों में से हैं। दिल्ली के आरपीवीवी, सूरजमलविहार स्कूल में 11वीं कक्षा में पढ़ती हैं। लेकिन इतनी कम उम्र में भी अपने लेखों के जरिए गम्भीर मसले उठाती हैं। वे अपने आर्टिकल सीधे #अपनीडिजिटलडायरी के ‘अपनी डायरी लिखिए’ सेक्शन या वॉट्स एप के जरिए भेजती हैं।)
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