प्रतीकात्मक तस्वीर
ऋषु मिश्रा, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
कल मेरी एक सहेली या छोटी बहन भी कह सकते हैं, रात को फोन करके कहती है – “मैम, मैंने अपना Facebook account deactivate कर दिया है l आप मेरे लिए परेशान मत होना l” उसे यक़ीन था मुझ पर कि मैं उसके लिए परेशान हो जाऊँगी l ज़्यादा बातचीत नहीं है मेरी उससे, सिर्फ़ दो-चार बार का मिलना है। दोनों का प्रोफेशन समान हैl मैंने पूछा उससे कि क्या वाकई में Facebook ही मानसिक अशान्ति का कारण है? उसने कुछ नहीं कहा l मैंने उसे अंदाज़ से ही सही उत्तर बता दिया l ऐसा लगा शायद उसकी आँखों में आँसू थे l
मैंने कहा, “किसी भावना के लिए स्वयं को दोष मत दो l Facebook और whatsapp हमें परेशान नहीं करते, हमें सोशल मीडिया के व्यक्ति और content परेशान करते हैं l सबसे ज्यादा परेशान भावनाएँ करतीं हैं l भावनाओं के लिए भी स्वयं को दोष मत दो l उन्हें नियंत्रण में रखने से अच्छा है, उनके साथ सहज रहो। खुश रहो l सबसे बड़ी बात स्वयं को सकारात्मक कार्यों में लगा दो l”
अब वह खुश थी, मैं उससे कहीं ज्यादा l किसी को judge किए बिना सिर्फ़ 10 मिनट की बातचीत उसे मानसिक वेदना से बचा सकती है l मैं कल से प्रसन्न हूँ क्योंकि मैंने एक चिकित्सक की भूमिका निभाई थी, जहाँ न तो कोई प्रिस्क्रिप्शन था और न ही कोई फीस …सिर्फ़ विश्वास और समानुभूति (empathy) थी.🌻❤️
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(ऋषु मिश्रा जी उत्तर प्रदेश में प्रयागराज के एक शासकीय विद्यालय में शिक्षिका हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की सबसे पुरानी और सुधी पाठकों में से एक। वे निरन्तर डायरी के साथ हैं, उसका सम्बल बनकर। वे लगातार फेसबुक पर अपने स्कूल के अनुभवों के बारे में ऐसी पोस्ट लिखती रहती हैं। उनकी सहमति लेकर वहीं से #डायरी के लिए उनका यह लेख लिया गया है। ताकि सरकारी स्कूलों में पढ़ने-पढ़ाने वालों का एक धवल पहलू भी सामने आ सके।)
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ऋषु जी के पिछले लेख
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