बारिश के मौसम में घड़ियालों से भरी चम्बल नदी को पार कर के कुछ इस तरह स्कूल जाती हैं मन्दसौर की बच्चियाँ।
राजेश शर्मा, मन्दसौर, मध्य प्रदेश
हर साल की तरह इस बार भी पाँच सितम्बर को ‘शिक्षक दिवस’ मना लिया गया। बधाईयाँ दीं और ली गईं। लेकिन शिक्षा और शिक्षित होने की इच्छा रखने वाले विद्यार्थियों की जिम्मेदारी कोई आगे बढ़कर गम्भीरता से ले रहा है, लेना चाहता है या नहीं, यह बड़ा महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। बुरी तरह झिंझोड़कर इस प्रश्न को बार-बार खड़ा कर देने वाली घटनाएँ अक्सर देश के किसी न किसी कोने से सामने आती हैं। इस बार ‘शिक्षक दिवस’ के आस-पास मध्य प्रदेश के मन्दसौर से एक मामला प्रकाश में आया है।
मसला यूँ है कि मन्दसौर और उसके नजदीकी नीमच जिले की सरहद से लगकर चम्बल नदी बहा करती है। यह नदी का ‘घड़ियालों का बसेरा’ भी कही जाती है। इसकी चौड़ाई कहीं-कहीं तो तीन किलोमीटर से भी अधिक होती है। इसी के एक किनारे पर गाँव है- छोटी आंतरी, जबकि दूसरे किनारे पर है- बड़ी आंतरी, जिसमें शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय भी स्थित है। इन दोनों गाँवों के बीच आने-जाने का अगर कोई साधन है तो बस, कुछ पुरानी सी नौकाएँ। इनमें सुरक्षा इंतिजाम तो शून्य हैं ही, कई बार नदी की बीच धार में नाव का डीजल तक खत्म हो जाता है। तब चप्पू चलाकर नौका आगे ले जानी पड़ती है।और इन्हीं नौकाओं से छोटी आंतरी के स्कूली बच्चे, खासकर बच्चियाँ, रोज स्कूल जाया करती हैं। है न चिन्ता की बात?
मगर रुकिए, कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई है। आगे इसका चर्मोत्कर्ष या कहें कि क्लाईमैक्स बाकी है अभी। तो सुनिए। बड़ी आंतरी के सरकारी स्कूल के शिक्षकों को इस बात का अंदाजा पूरा है कि विद्यालय आने के लिए बच्चियाँ बड़ा जोखिम उठाकर नदी पार करती हैं। इतना कि विशेष रूप से बरसात के मौसम में उनका जीवन तक संकट में आ सकता है। लिहाजा, बच्चों के साथ, भगवान न करे, अगर कोई हादसा हो जाए, तो उसकी जिम्मेदारी शिक्षकों पर न पड़े, इसका पूरा बंदोबस्त स्कूल वालों ने कर लिया है। उन्होंने 50 रुपए के स्टाम्प पेपर पर अभिभावकों से लिखवा लिया है कि अगर स्कूल आने-आने के दौरान बच्चे किसी हादसे का शिकार हो जाते हैं, तो इसकी जिम्मेदारी विद्यालय प्रबन्धन की नहीं होगी!!
अलबत्ता कहानी का पूर्ण-विराम यहाँ भी नहीं है। यह तो अर्ध-विराम ही है। पूर्ण-विराम तो इस ‘रोचक-सोचक’ पहलू के साथ लगता है कि यह इलाका, जहाँ इतना कुछ कारनामा हो रहा है, कोई सामान्य नहीं है। मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा के चुनाव क्षेत्र के तहत आने वाला इलाका है यह। देवड़ा खुद नीमच जिले को रहने वाले हैं और वह मल्हारगढ़ विधानसभा क्षेत्र से चुने गए हैं। इसी विधानसभा में ये गाँव भी आते हैं, जिनकी कहानी ऊपर बताई गई है। तो अब बताइए, इन हालात में भी ‘शिक्षक दिवस’ की बधाई का लेन-देन करेंगे क्या? अगर जवाब ‘हाँ’ है, तो हम भी दे देते हैं, बधाई…शिक्षक दिवस की!! हालाँकि, जब तक देश में शिक्षा जगत के हालात पूरी तरह बेहतर नहीं होते, इस तरह की बधाईयों का मतलब है नहीं।
———–
(नोट : राजेश शर्मा पेशे से पत्रकार हैं, उनका यह लेख व्हाट्स के जरिए #अपनीडिजिटलडायरी तक पहुँचा है।)
मैं बेंगलुरू में जहाँ रहता हूँ, वहाँ अपने घर के सामने रोज इस तरह का… Read More
लिंक्डइन के जरिए नौकरी का जाल बिछाकर, रोजगार की तलाश कर रहे लोगों को काम… Read More
देश की एक जानी-मानी ‘पत्रकार’ ने ऑनलाइन पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए कह दिया कि… Read More
अभी एक-दो दिन से मीडिया-सोशल मीडिया में यह बहस चल रही है कि हम भारतीयों… Read More
एक नया अध्ययन हुआ है। इसमें भारत और उसके आस-पास के देशों में लगातार बढ़ती… Read More
खुशी पाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। ज्यादातर लोग अमूमन बड़ी से बड़ी नौकरी… Read More