पहाड़ो से नीचे आकर मैदानों में तबाही ला रही आपदा प्राकृतिक नहीं, मानव निर्मित है!

पवन जैन ‘घुवारा’ टीकमगढ़, मध्य प्रदेश

अचानक कहीं बादल फटे और पहाड़ाें से बाढ़ की सूरत में पानी ओर मिट्‌टी ने नीचे आकर बस्तियों की बस्तियाँ, गाँव के गाँव तबाह कर दिए। बड़े-बड़े पुल बह गए। सड़कें बह गईं। जान-माल का बेतहाशा नुकसान हुआ। ऐसे समाचार कुछ समय तक पहले अमूमन उत्तराखण्ड से आते थे। फिर हिमाचल से भी आने लगे। अब जम्मू-कश्मीर, पंजाब का भी नाम इनमें जुड़ गया है। इस बार इन राज्यों में आई बाढ़ की तस्वीरें, वीडियो आदि विचलित कर देने वाले हैं। घर, मकान, बस्ती, गाँव के ढहने और मलबे में तब्दील हो जाने के साथ-साथ बड़ी संख्या में पशुओं और यहाँ तक कि कटे हुए या शायद अवैध रूप से काटे गए पेड़ों तक को बाढ़ में बहते देखा गया। 

पेड़ों के बहने के मामले में तो गुरुवार को देश के शीर्ष न्यायालय ने तक टिप्पणी कर दी है। एक सम्बन्धित मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा है, “यह बहुत गम्भीर मामला है। पेड़ों के लट्‌ठे बड़ी तादाद में बाढ़ के पानी में बहते देखे गए हैं। अगर यही हाल रहा तो जंगलों का नाम-ओ-निशान मिट जाएगा। पंजाब में तो गाँव के गाँव बाढ़ में समा गए हैं। विकास जरूरी है, मगर पर्यावरण और जिन्दगियों की कीमत पर नहीं” देश के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खण्डपीठ ने इसके अलावा भी सख्त टिप्पणियाँ की हैं।

इस सम्बन्ध में गौर करने लायक है कि पिछले कुछ वर्षों में मानसून का तौर-तरीका भी काफी बदल गया है। पहले जहाँ बरसात धीरे-धीरे और लंबे समय तक होती थी, अब अचानक भारी वर्षा कम समय में हो जाती है। इससे नदियों और नालों में पानी का दबाव तेजी से बढ़ता है। भारी बाढ़ जैसी स्थिति बन जाती है। जलवायु वैज्ञानिक मानते हैं कि धरती का तापमान बढ़ाने वाली जहरीली गैसों के बढ़ने से हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। परिणामस्वरूप बरसात के मौसम में नदियों का जलस्तर अनियंत्रित ढंग से बढ़ जाता है।

तो प्रश्न उठता है कि इसका जिम्मेदार कौन है? स्वाभाविक रूप से हम इंसान ही। इन विनाशकारी स्थितियों को आमंत्रित करने में सबसे बड़ी भूमिका इंसानी हस्तक्षेप की है। नदियों के किनारों और तलहटी में अंधाधुंध निर्माण कार्य हो रहे हैं। गाँव और शहर नालों व पुरानी जलधाराओं पर बस गए हैं। रेत का अत्यधिक खनन नदियों की गहराई और धारा बदल दे रहा है। इस सबसे जब पानी का रास्ता रुकता है, तो वह आस-पास की बस्तियों में घुसता है। वनों की बेतहाशा कटाई और हरित क्षेत्र के सिकुड़ने से भी प्राकृतिक संतुलन बिगड़ा है। नदियों के किनारे पेड़ों की जड़ें पानी को रोकती और मिट्टी को बाँधती थीं। लेकिन जंगलों के तेजी कटते जाने के कारण मिट्टी की जलधारण क्षमता भी कम हुई और प्राकृतिक जलसंचयन का तंत्र टूटकर बिखर गया है।

मतलब स्पष्ट हे कि विनाशकारी बाढ़ का संकट प्राकृतिक कारणों से कम मानवीय कारणों से अधिक है। यह हमारी विकास नीतियों की असन्तुलित दिशा का परिणाम है। जैसा कि देश की शीर्ष अदालत की टिप्पणी से भी स्पष्ट है। इन स्थितियों का संकेत स्पष्ट है कि यदि हमने अब भी सबक नहीं लिया तो आने वाले वर्षों में बाढ़ और भयावह होने वाली है। प्रकृति हमें चेतावनी दे रही है कि उससे छेड़-छाड़ मत करो, वरना बहुत महँगा पड़ेगा। महँगा पड़ रहा है, क्योंकि विनाशकारी बाढ़ केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, सामाजिक-आर्थिक संकट भी है। इससे तमाम लोग मारे जाते हैं। लाखों बेघर हो जाते हैं। विकास की बड़ी-बड़ी निशानियाँ पत्तों की तरह पानी में बह जाती हैं। हजारों एकड़ में फसलें बर्बाद हो जाती हैं। किसान कर्ज में डूब जाते हैं। लोग पलायन को मजबूर होते हैं। इससे अन्य स्थलों पर बोझ बढ़ता है। बीमारियों और मानसिक आघात का प्रकोप अलग। कुल मिलाकर वर्षों की ‘कथित’ विकास की गतिविधियों से जितना लाभ नहीं होता, उससे ज्यादा नुकसान एक बार की भीषण बाढ़ से हो जाता है।

तो फिर करना क्या चाहिए? राज्य और केन्द्र सरकारों को मिलकर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए दीर्घकालिक योजना बनानी चालिए। स्थानीय लोगों को बाढ़ से बचाव और प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए। और विकास की हर योजना के प्रत्येक चरण में यह याद रखना चाहिए कि प्रकृति से लड़ाई नहीं, बल्कि उसके साथ तालमेल ही स्थायी समाधान है। 

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(पवन जैन मूल रूप से बुन्देलखण्ड के टीकमगढ़ जिले के सक्रिय सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। जनसामान्य से जुड़े मसलों पर वह लगातार आवाज बुलन्द करते हैं। उनकी पत्नी प्रियंका भी उन्हीं की तरह सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय रहती हैं। लेख के रूप में वे अपने विचार #अपनीडिजिटलडायरी को व्हाट्स एप के जरिए भेजते हैं।) 

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