वो भी क्या दिन थे, ये भी क्या दिन हैं, …क्योंकि वक्त हमेशा बदलता है!

निकेश जैन, इन्दौर मध्य प्रदेश

महज 90 दिन के भीतर 14 लाख सालाना से 28 लाख तक! यह साल 2020 की बात है। वो भी क्या दिन थे!!

उसकी तत्कालीन तनख्वाह 14 लाख रुपए सालाना होती थी। उसके पास तीन कम्पनियों की तरफ से नौकरी के प्रस्ताव पहले से थे। हम चौथे थे। वह नोटिस-अवधि में था, जो 90 दिन की थी। वह अवधि पूरी होने में चार दिन बचे थे, उसके बाद उसे तत्कालीन कम्पनी छोड़कर अगली में अपनी आमद दर्ज करानी थी। 

उसने हमसे 26 लाख रुपए की सालाना तनख्वाह माँगी। हम उसके लिए राजी भी हो गए। हमें लगा कि पाँचवें दिन वह हमारी कम्पनी में आ जाएगा। लेकिन वह नहीं आया। पाँचवें क्या, छठवें, सातवें दिन भी नहीं आया। बाद में मेरी कम्पनी के साथियों ने बताया, जो नए कर्मचारियों की भर्ती वगैरा करते हैं, कि वह व्यक्ति किसी दूसरी जगह चला गया है। उसने हमसे बातचीत होने के बाद किसी अन्य कम्पनी में भी बात की थी। वहाँ उसने 28 लाख रुपए सालाना तनख्वाह माँगी और उसे वह भी मिल गई। लिहाजा, वह उसी कम्पनी के साथ जुड़ गया। यानि महज 90 दिन की नोटिस-अवधि में उस पेशेवर ने अपनी तनख्वाह 14 से 28 लाख रुपए सालाना कर ली। 

क्या वह गलत था? क्या उसने कोई अनैतिक काम किया? या फिर वह बस, मौके का भरपूर फायदा उठा रहा था? और अब आखिर वे दिन किधर गए? 

आज वक्त बदल चुका है। सॉफ्टवेयर उद्योग में अब सूरज की रोशनी पहले जैसी तेज नहीं रही, मद्धम पड़ चुकी है। आज इस उद्योग में काम करने वाला कोई भी पेशेवर महज 60-90 दिनों के भीतर अपनी तनख्वाह इस तरह बढ़वा लेने के बारे में सोच नहीं सकता। क्यों? क्योकि कम्पनियाँ अब किसी कर्मचारी के आने-जाने की ज्यादा चिन्ता नहीं करतीं। जो जा रहा होता है, उसे सहज भाव से जाने देती हैं। बल्कि थोक के भाव में जाने देती हैं। कई मौकों पर तो निकाल और देती हैं। वह भी कोई नोटिस-वोटिस दिए बिना! 

क्या कम्पनियों का यह बर्ताव सही है? क्या ये अनैतिक कार्य है?  दरअसल, इन सवालों का जवाब एक यही है कि यह वास्तव में संतुलन का खेल है। इसमें सही या गलत हर किसी का अपना-अपना है। जो मेरे लिए गलत है, वह किसी ओर के लिए सही हो सकता है। और दिलचस्प बात यह है कि संतुलन की इस मौजूदा कला या विधा का तो शायद क्ववांटम भौतिकी भी समर्थन कर दे!  

लिहाजा, जब वक्त अच्छा हो तो अपनी सुरक्षा दीवार को हर तरह से मजबूत कर लेने में ही समझदारी है। ताकि जब बुरा या विपरीत समय आए, जो कि आना ही है, तो हमें कम से कम नुकसान हो।

क्योंकि वक़्त हमेशा बदलता है! नहीं क्या? 

—- 

निकेश का मूल लेख

14L to 28L in 90 days!
Mid 2020 – वो भी क्या दिन थे!

His current was 14L;
We were his 4th offer.
He was on notice period in his current job with only 4 days left for him to get relieved.
He asked for 26L.. and we gave him.

Hoping that he would join after 5 days

But

He never showed up on the 5th day.

My recruitment team told me later that he negotiated another offer And joined somewhere else at 28L

So 14L to 28L in 90 days!!

Was he wrong?
Unethical?

Or he was just making hay while sun was still shining?

किधर गये वो दिन ?

The sun in software has stopped shining.
It’s hard to get one offer today.

In fact companies are letting go people in bulk!
That too without much notice and severance.

Is that right?
Ethical?

It’s a game of balance….

Right and wrong are very subjective.
What is wrong for me can be right for someone else.

Even quantum physics agrees to that now 😊

Make hay while the sun shines;
But make sure to save for rainy days…

क्योंकि वक़्त हमेशा बदलता है !

Thoughts? 

—— 

(निकेश जैन, कॉरपोरेट प्रशिक्षण के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी- एड्यूरिगो टेक्नोलॉजी के सह-संस्थापक हैं। उनकी अनुमति से उनका यह लेख अपेक्षित संशोधनों और भाषायी बदलावों के साथ #अपनीडिजिटलडायरी पर लिया गया है। मूल रूप से अंग्रेजी में उन्होंने इसे लिंक्डइन पर लिखा है।)

——

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