सांकेतिक तस्वीर (साभार)
टीम डायरी
यह सवाल इन दिनों बड़े जोर-शोर से उठाया जा रहा है कि क्या नवजात बच्चे की देखभाल के लिए माँ की तरह पिता को भी अवकाश मिलना चाहिए? क्या इस तरह के अवकाश को देश में कानूनी अधिकार बनाया जाना चाहिए? राज्य सभा के सदस्य राघव चड्ढा ने इस विषय को संसद में विचार के लिए रखा है।
राघव के मुताबिक, “जब कोई बच्चा पैदा होता है तो माता-पिता दोनों को बधाइयाँ मिलती हैं। लेकिन बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी पूरी तरह माँ के ऊपर आ जाती है। क्या यह सही और संतुलित व्यवस्था है? पिता के सामने ऐसे अवसरों पर अक्सर दो ही विकल्प होते हैं। पहला- या तो वह अपनी नौकरी कर ले। और दूसरा- वह बच्चे की देखभाल कर ले। उसे इन दोनों में से ही चुनाव करना होता है। ऐसा नहीं होना चाहिए। ऐसे ही बच्चे को जन्म देने और उसके बाद उसकी देखभाल के लिए माँ को भी अकेला नहीं छोड़ा जाना चाहिए। यह उसके जीवन का सबसे अहम पड़ाव होता है। इसमें उसे जीवनसाथी के सहयोग की जरूरत होती है। उसके भावनात्मक संबल की आवश्यकता होती है। नवजात बच्चे की देखभाल साझा जिम्मेदारी है। हमारे कानून में यह बात स्पष्ट होनी चाहिए।”
राघव की इस बात को मीडिया और सोशल-मीडिया में आम लोगों का खूब समर्थन मिल रहा है। अलबत्ता, उनका क्या जो सप्ताह के छह दिन 12-12 घण्टे (करीब 72 घण्टे) काम करने की लोगों से अपील किया करते हैं? जैसे कि देश की बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी इन्फोसिस के मुखिया नारायण मूर्ति? और उनका भी क्या जो सप्ताह में रविवार का अवकाश भी न लेने के पक्ष में दलीलें देते हैं, कर्मचारियों से ऐसी अपेक्षा करते हैं? जैसे- लार्सन एण्ड टुब्रो कम्पनी के मालिक एसएन सुब्रह्मण्यन? और ये ताे सिर्फ दो बड़े नाम हैं। इस तरह के विचार के समर्थक तमाम हैं कि पेशेवर लोगों को छुटि्टयाँ नहीं लेनी चाहिए या जितनी कम हो सकें, उतनी लेनी चाहिए! तो क्या इस वर्ग के लोग राघव के प्रस्ताव का समर्थन करेंगे? क्या ये लोग उनके द्वारा उठाए मुद्दे की गंभीरता को समझ सकेंगे?
मसला बेहद दिलचस्प है और उतना ही संवेदनशील भी। इस पर बात तो होनी ही चाहिए।
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