सरल भक्तमाल’-1…. आखिर इसकी जरूरत क्यों?

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

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श्रृंखला की पहली कड़ी में हम बात करेंगे कि आखिर ‘सरल भक्तमाल’ प्रयास की जरूरत क्यों महसूस हुई? क्योंकि ‘भक्तमाल’ कोई ऐसा ग्रंथ तो है नहीं, जो बहुत कठिन भाषा में लिखा गया हो। ऐसा ग्रंथ भी नहीं है, जो आसानी से उपलब्ध न हो। गीता प्रेस की पुस्तक के अलावा भी ‘भक्तमाल’ के कई संस्करण, टीकाएँ आदि सहज उपलब्ध हैं। जिन्हें रुचि है, वे इन पुस्तकों का अध्ययन कर रहे हैं। गीता प्रेस का ‘गीता सेवा’ एप भी है। मोबाइल पर आने वाले सिर्फ एक ओटीपी के माध्यम से उसमें लॉगइन कर के ‘भक्तमाल’ और ऐसे अन्य ग्रंथों को पढ़ा जा सकता है। कुछ लोग ऐसे माध्यमों से भी अध्ययन-लाभ ले रहे हैं। इसके अलावा भगवद् कथावाचक आचार्य भी अपने लगभग सभी कार्यक्रमों में किसी न किसी रूप से ‘भक्तमाल’ की कहानियों, प्रसंगों का उल्लेख करते ही हैं। हजारों-लाखों लोगों को इसका लाभ मिलता है। वह भी पूरी तरह नि:शुल्क।

तो फिर आखिर खाली जगह कहाँ छूटती है? इसका उत्तर यह है कि इतने सारे प्रयासों के बावजूद नई उम्र के युवाओं का, किशोरों का एक बड़ा वर्ग ‘भक्तमाल’ जैसे ऊँचे दर्जे के ग्रंथ के रस से, भाव से अछूता है। इस संबंध में एक सच्ची घटना सुनाता हूँ। एक बालक है, जिसकी उम्र 17-18 साल की है। क्रिकेट के खेल में अपना भविष्य बनाना चाहता है। लेकिन तमाम संघर्ष और बढ़िया प्रदर्शन के बाद भी अब तक उसका चयन नहीं हुआ है। वह और अच्छा प्रदर्शन करने और चयनित होने का दबाव लगातार महसूस कर रहा है। तब उसके पिताजी उसे सलाह देते हैं कि श्रीमद् भगवद् गीता में ऐसे मानसिक दबाव से दूर रहने के रास्ते बताए हैं। छोटी सी पुस्तक है। संस्कृत के साथ हिन्दी अर्थ भी उसमें दिए गए हैं। घण्टे-डेढ़ घण्टे में पूरी पढ़ी जा सकती है। चाहो तो उसे पढ़ सकते हो। जीवन के तमाम प्रश्नों के उत्तर उसमें सहज उपलब्ध हो जाएँगे।

पिता की बात मानकर वह बालक श्रीमद् भगवद् गीता के शुरुआती दो-तीन अध्याय पढ़ता भी है। लेकिन आगे वह नहीं पढ़ पाता। कारण जानते हैं उसने क्या बताया? इसकी हिन्दी बीच-बीच में समझ में नहीं आती! जबकि यही बालक अमेरिकी लेखक जो डिस्पेंजा की मोटी सी किताब ‘ब्रेकिंग द हैबिट ऑफ बीइंग योरसेल्फ’ पूरी पढ़ लेता है। पता है क्यों? क्योंकि एक तो उसकी पढ़ाई-लिखाई का माध्यम अंग्रेजी है। हालाँकि, वह हिन्दी भाषी क्षेत्र और परिवार से ताल्लुक रखता है। फिर भी चूँकि चलन है, तो तमाम अन्य परिवारों के बच्चों की तरह वह भी अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ाई करता है। और दूसरी बात- जो डिस्पेंजा दुनियाभर में अपनी किताबों के लिए मशहूर ही इसलिए हैं कि वह बहुत सहज-सरल भाषा में पाठकों को अपनी बात समझाते हैं। 

अलबत्ता, यह कहानी किसी एक बच्चे, किशोर, युवा या परिवार तक सीमित नहीं है। ऐसे मामले देश के करीब-करीब हर घर में मिल सकते हैं। इसीलिए हम सिर्फ इतना कर रहे हैं कि सरल, सहज भाषा में ग्रंथ के प्रसंगों को प्रस्तुत कर दिया जाए। इतना सरल कि किसी को संस्कृतनिष्ठ हिन्दी, ब्रज या अवधी भाषा के शब्दों का अर्थ समझने के लिए शब्दकोष न उठाना पड़े। और इतना सहज कि समुद्र की गहराई में गोता लगाए बिना सुनने वालों के मन में ग्रंथ-सार के मोती पहुँच जाएँ। इस प्रयास में हम यह भी पूरी कोशिश करेंगे कि अधिकतम पाँच मिनट की कहानियों की पूरी कड़ी में सुनने वालों का मन लगा रहे। उनका ध्यान न भटके। और वे कहानियाँ सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी उतनी ही प्रभावशाली हों, जितनी सत्संगों में होती हैं।

यहाँ ध्यान रखने की बात एक और है कि हमारा प्रयास पूरी तरह भक्तमाल के प्रसंगों पर केन्द्रित है। इसलिए इसमें कुछ और नहीं बस, भक्तों के चरित्र को कहना-सुनना ही मुख्य विषय रहने वाला है। हम उस ‘अमृत’ को एक नए पात्र में परोस भर रहे हैं। और उद्देश्य सिर्फ इतना है कि वह ‘अमृत’ अधिक से अधिक लोगों के गले के नीचे उतरे। उनके चिंतन में आए। उनकी सोच, उनके जीवन के उद्देश्य, उनके कर्मों को शुद्ध करे।

सभी को एक दिन पहले ही मनाए गए श्री हनुमान जी के जन्मदिवस की बधाई, मंगल कामनाएँ। और हाँ, भक्त-शिरोमणि हनुमान जी के जन्मदिवस से याद आया, ‘भक्तमाल’ ग्रंथ को जिन महात्मा श्री नाभा जी ने सबसे पहली बार लिखा था, उनका जन्म हनुमानवंश में हुआ था, ऐसा बताते हैं। बाल ब्रह्मचारी हनुमान जी का वंश? चकरा गए न? अगली दो-तीन कड़ियों के भीतर श्री नाभा जी का प्रसंग आने वाला है, उसमें इस रहस्य को खोलेंगे। यही नहीं, आगे भी ऐसे कई रोचक प्रसंग आने वाले हैं। इसीलिए कहते हैं, हमारे इस प्रयास के साथ बने रहिए, लगातार।

आज के लिए बस इतना ही, मिलते हैं श्रृंखला की अगली कड़ी के साथ, बहुत जल्द।

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नोट : यह श्रृंखला गीता प्रेस की आधिकारिक पुस्तक ‘श्री भक्तमाल’ में उल्लिखित कथा-प्रसंगों पर आधारित है। इसके प्रकाशन-प्रसारण के पीछे हमारा उद्देश्य सिर्फ इतना है कि गीता प्रेस के ऐसे उच्च स्तर के ऐतिहासिक, पौराणिक महत्त्व के ग्रंथ के प्रचार-प्रसार में #अपनीडिजिटलडायरी की ओर से थोड़ा योगदान हो सके। साथ ही #डायरी से जुड़े पाठकों को इसका लाभ हो। बहुत जल्द हम इसी श्रृंखला को #अपनीडिजिटलडायरी के यूट्यूब चैनल पर भी शुरू करने का इरादा रखते हैं।)

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Neelesh Dwivedi

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