सब चाहते हैं कि महिलाओं को संसद में आरक्षण मिले, फिर ‘प्रयास’ का विरोध क्यों?

टीम डायरी

भारतीय राजनीति का यकीनन यह सबसे बड़ा विरोधाभास है। देश का हर राजनैतिक दल घोषित तौर पर यही कहता रहा है कि संसद के दोनों सदनों और राज्यों की विधानसभाओं में महिला सदस्यों के लिए 33 प्रतिशत जगहें आरक्षित होनी चाहिए। इसके बावजूद अब तक इस मुद्दे पर कोई ठोस प्रगति हुई नहीं है। हर बार ‘दिखावे के प्रयास’ होते हैं, फिर ‘दूसरी तरफ’ से उनका विरोध होता है और मामला ठण्डे बस्ते में चला जाता है। केन्द्र की सत्ता में चाहे कांग्रेस व उसके नेतृत्त्व वाले गणबंधन की सरकार रही हो, या फिर भारतीय जनता पार्टी और उसकी अगुवाई वाले गठजोड़ की। महिला आरक्षण के मामले में हर सरकार के कार्यकाल में कहानी एक जैसी रही है। 

उदाहरण ताजा ही ले सकते हैं। केन्द्र सरकार ने अभी दो अप्रैल काे समाप्त होने वाले संसद के बजट सत्र की समय-सीमा को ‘कुछ दिन’ बढ़ाने का निर्णय किया है। लेकिन इन ‘बढ़े हुए दिनों¹ की बैठकें जारी सत्र की निरंतरता में नहीं, बल्कि बीच में कुछ दिनों के अवकाश के बाद 16 से 18 अप्रैल के बीच होंगी। और इन बैठकों में होगा क्या? इनमें दोनों सदनों के सदस्य चर्चा करेंगे कि सितंबर-2023 में संसद से पारित हो चुके ‘महिला आरक्षण विधेयक’ को, जो अब कानून भी बन चुका है, कब से और कैसे लागू किया जाए। इस बाबत केन्द्र के संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने पुष्टि की है। लेकिन विपक्षी नेताओं की आवाजें इस ‘प्रयास’ के विरोध में सुनाई दे रही हैं। 

विपक्ष के नेताओं का आरोप है कि पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम जैसे राज्यों में विधानसभा चुनावों को देखते हुए केन्द्र सरकार ने जानबूझकर इन तारीखों पर संसद की विशेष बैठकें प्रस्तावित की हैं। ताकि इन राज्यों की महिला मतदाताओं को प्रभावित किया जा सके। तमिलनाडु में 23 अप्रैल को मतदान है, जबकि पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को दो चरण में। इसके बीच में संसद की विशेष बैठकें सरकार की ‘शातिराना चाल’ है। कारण कि इन बैठकों में एक तो चुनावी राज्यों के लगभग 67 से अधिक सांसदों को आने में दिक्कत होने वाली है। दूसरा- बहस के दौरान विपक्षी सांसदों के विचारों को चुनाव प्रचार में तोड़-मरोड़कर पेश किया जा सकता है। 

यही नहीं, महिला आरक्षण लागू होने के बाद में लोकसभा की सदस्य संख्या 543 से 816 तक पहुँचने की संभावना है। विपक्ष को आशंका है कि ‘विशेष बैठकों’ के दौरान सरकार इस संबंध में भी विधेयक पारित कराने की कोशिश कर सकती है। इसलिए इसका भी इस आधार पर विरोध किया जाने लगा है कि संसद की सदस्य संख्या बढ़ने से खास तौर पर दक्षिण के राज्यों का असर कम हो जाएगा। इस तरह की और भी दलीलें हैं। अलबत्ता, दिलचस्प यह भी कि विपक्ष के यही सदस्य 2023 में इस बात का विरोध कर रहे थे कि सरकार जानबूझकर महिला आरक्षण को लागू करने का मामला 2029 तक टाल रही है। इसे लागू करने की उसकी मंशा नहीं है। 

असल में महिला आरक्षण अधिनियम- 2023 को लागू करने से पहले जनगणना और लोकसभा क्षेत्रों के परिसीमन की प्रक्रिया पूरी की जानी है। जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाए जाने का प्रस्ताव है। फिर उस संख्या का 33 प्रतिशत हिस्सा महिलाओं के लिए आरक्षित किया जाना है। सामान्य गति से यह प्रक्रिया पूरी होने में 2029 तक का समय लग सकता है। लेकिन चूँकि जनगणना के आँकड़े 2027 तक आ जाएँगे और परिसीमन प्रक्रिया भी तेजी से चल रही है। ऐसे में, बहुत संभव है कि सरकार महिला आरक्षण अधिनियम-2023 को लागू करने की प्रक्रिया तेज करना चाहती हो। अगर ऐसा है तो इसका स्वागत होना चाहिए। और ऐसा नहीं भी है, तो संसद की विशेष बैठक में सरकार की नीयत को उजागर करने का मौका है। विपक्ष इस मौके को, चाहे तो अपने पक्ष में अच्छे से भुना सकता है। लेकिन नहीं, उसे तो शायद विरोध के लिए विरोध करना है। 

दरअसल, महज विरोध के लिए विरोध करने की इस मानसिकता के कारण ही महिला आरक्षण जैसा महत्त्वपूर्ण कानून अब तक लागू नहीं हो पाया है। इससे पहले चार बार इस कानून को संसद में लाया गया। वर्ष 1996, 1998, 1999 और 2008, लेकिन हर बार यह ऐसे समय पेश किया गया या किया जा सका कि लागू होने तक की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही लोकसभा का कार्यकाल खत्म हो गया। और कानून बनने से पहले ही विधेयक अपने आप समाप्त हो गया। जैसे-तैसे अब जाकर कहीं इस प्रक्रिया ने गति पकड़ी है, तो विपक्ष फिर इसमें रोड़े-अड़ंगे डालने की कोशिश में है। क्या उचित रवैया कहा जाना चाहिए इसे? खासकर महिलाओं को सोचना चाहिए इस पर। 

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Neelesh Dwivedi

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