ईरान के साथ लड़ाई के मोर्चे पर अमेरिका उलझता नजर आ रहा है।
टीम डायरी
अमेरिका ने अपने इतिहास में शायद कभी अपनी या अपने राष्ट्रपति की ऐसी बेइज्जती नहीं देखी होगी, जैसी ईरान के साथ उलझी हुई लड़ाई के दौरान ईरानी राजनयिक और अधिकारी डोनाल्ड ट्रम्प की कर रहे हैं। अभी ताजातरीन बात है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गली के गुण्डों की तरह ईरानी नेतृत्त्व के लिए गाली-गलौच वाली अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने 48 घण्टे की समय सीमा घोषित की। अमेरिकी समयानुसार मंगलवार रात आठ बजे का समय बताया और कहा, “इससे पहले तक ईरान ने अपने नियंत्रण वाले होर्मुज जलडमरूमध्य का समुद्री रास्ता सभी देशों के लिए नहीं खोला तो उस पर तबाही बरपाई जाएगी। पहले दिन ईरान के सभी विद्युत संयंत्र और पुल एक झटके में तबाह कर दिए जाएँगे।” उनकी धमकी के बाद देखिए ईरान ने क्या प्रतिक्रिया दी..
भारत में ईरानी दूतावास के एक्स हैण्डल पर ट्रम्प को उन्हीं की भाषा में जवाब दिया गया। इसमें लिखा, “गालियाँ देना और बेइज्जती करना, हारे हुए बदतमीज बच्चों का काम है। खुद पर काबू रख बुड्ढे!”
इसी तरह जिम्बाब्वे के ईरानी दूतावास के एक्स हैण्डल पर लिखा गया, “रात आठ बजे का समय अच्छा नहीं है। क्या आप इसे दिन में एक से दाे बजे के बीच कर सकते हैं। या संभव हो तो, रात में एक से दो के बीच? इस जरूरी मसले पर ध्यान देने के लिए आपका धन्यवाद।” इसी मामले में बल्गारिया के ईरानी दूतावास के एक्स हैण्डल पर लिखा गया, “बेसब्र न हो टाइगर, ठंड रख!”
बात यहाँ रुकी नहीं। होर्मुज जलडमरूमध्य का रास्ता खोलने संबंधी ट्रम्प की माँग का भी ईरानी पक्ष द्वारा जमकर मजाक उड़ाया जा रहा है। दक्षिण अफ्रीका में ईरानी दूतावास के एक्स हैण्डल से थोड़े नाटकीय अंदाज में भारत सहित कुछ देशों की काल्पनिक प्रतिक्रिया दिखाई गई। लिखा गया, “ट्रम्प : होर्मुज जलडमरूमध्य का रास्ता खोलो!” भारत : ये बंद है क्या? पाकिस्तान : बंद है? रूस : गजब…! दक्षिण अफ्रीका : …पर ये तो पहले ही खुला है। फ्रांस : ऐसा लगता तो नहीं। चीन : खुला है, हमारे जहाज अभी-अभी निकले हैं।”
गौरतलब है कि ईरान ने अमेरिका, इजराइल, जैसे कुछ देशों के मालवाहक जहाजों के लिए होर्मुज का समुद्री रास्ता पूरी तरह बंद किया हुआ है। जबकि भारत, रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका जैसे विभिन्न देशों के मालवाहक जहाजों को वहाँ से निकलने का सुरक्षित रास्ता लगातार दिया जा रहा है।
यहाँ तक कि बीते कुछ घण्टों से ट्रम्प की ओर से कोई प्रतिक्रिया नही आने पर भी जिम्बाब्वे के ईरानी दूतावास की ओर से खिल्ली उड़ाई गई। उसके एक्स हैण्डल पर एक अन्य पोस्ट में लिखा गया, “ट्रम्प, कुछ बोलिए कृपया, हमारा मन नहीं लग रहा है।” इस तरह से लगातार ईरान ट्रम्प की खिल्ली उड़ा रहा है। उन्हें उकसा रहा है। वहीं, दूसरी तरफ ट्रम्प खुद को ईरान की लड़ाई में उलझा हुआ महसूस कर रहे हैं।
ईरान के साथ संघर्ष को कुछ दिनों-हफ्तों में खत्म कर देने का दावा करने वाले ट्रम्प बीते एक महीने में भी लड़ाई को किसी निर्णायक मोड़ पर नहीं पहुँचा सके हैं। उल्टा हो ये रहा है कि अमेरिका के ही लाखों लोगों ने ‘नो किंग्स’ जैसे अभियान के जरिए उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ये लोग लगातार रैलियाँ कर रहे हैं। ट्रम्प के निर्णयों का विरोध कर रहे हैं। ट्रम्प को अपने शीर्ष सैन्य अफसरों पर कार्रवाई करनी पड़ी है। रक्षा सचिव पर भी उन्होंने अनिर्णीत ईरानी जंग के बाबत अँगुली उठाई है। एकतरफा युद्धविराम, गाली-गलौच, धमकी, हमला करें या न करें, करें तो कब-कितना करें, ऐसे तमाम अनिर्णय की स्थिति उनकी कार्यशैली में साफ झलक रही है।
इस लड़ाई में ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली जैसे अमेरिका के मित्र कहलाने वाले देश भी लगातार दूरी बनाए हुए हैं। वहीं, ईरान लगातार खाड़ी में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को तबाह कर रहा है। वह अपने देश में होने वाले हर नुकसान का गिन-गिन कर बदला ले रहा है। अमेरिका को अब तक अरबों डॉलर का नुकसान हो चुका है। इस लड़ाई की वजह से दुनिया में तेल, गैस का संकट खड़ा हो गया है। सैकड़ों मालवाहक जहाज कहीं-कहीं अटके हैं। वे अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पा रहे हैं। इससे पूरे विश्व में महँगाई बढ़ने और आर्थिक मंदी की स्थिति बननी तय मानी जा रही है। और यह किसकी वजह से? अमेरिकी नागरिकों के एक ‘गलत चुनाव’ के कारण!
दरअसल, डोनाल्ड ट्रम्प ने पहले कार्यकाल की समाप्ति के बाद चुनावी हार के बावजूद इस्तीफा देने से जब मना किया था और संसद में अपने समर्थकों से बवाल कराया था, तभी अमेरिकी मतदाताओं को समझ लेना चाहिए था। इस बात को ध्यान में रखना चाहिए था कि अगर ट्रम्प को आगे दूसरा कार्यकाल मिला, तो वह अमेरिका के लिए घातक सिद्ध होंगे। अमेरिकी माथे पर किसी न किसी रूप में कलंक लगवाकर ही मानेंगे। लेकिन अमेरिकी मतदाताओं ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने भावनाओं में बहकर ट्रम्प को दूसरा कार्यकाल दिया और अब उसका नतीजा सामने है। बल्कि यह कहना चाहिए कि अभी तो ट्रम्प की सनक के और भी गंभीर नतीजे सामने आ सकते हैं!
वास्तव में इन्हीं सब घटनाक्रमों से भारतीय मतदाताओं काे सबक लेना चाहिए। लोकतंत्र में भावनात्मक लहर के आधार पर जनप्रतिनिधियों का, शासन करने के लिए नेताओं का चुनाव नहीं किया जाना चाहिए। बुद्धि और विवेक का उपयोग कर के चुनाव करना चाहिए। देश-प्रदेश के लिए चुनाव करते वक्त ध्यान रखना चाहिए कि अगर अच्छे लोगों के बीच से चुनना है तो जो ज्यादा बेहतर है, उसे चुनें। वहीं अगर बुरे लोगों के बीच से ही चुनाव करना है, तो जो कम बुरा है उसे चुनें। जो देश, प्रदेश, समाज के लिए घातक हो, उससे दूर रहें। उसे दूर रखें।
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