गायों की रक्षा-सुरक्षा के लिए क्या हम 27 अप्रैल को तहसील कार्यालय तक भी नहीं जा सकते?

समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश

कोई चाहे या न चाहे, माने या न माने, भारत का भाग्य गौमाता से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। धर्म-मार्ग से फिसलते जनमानस को उसके कर्तव्य का बोध कराने के लिए हर बार गौमाता ही आती है। भगवान के हर अवतार से पहले हम धर्म के ह्रास से पीड़ित पृथ्वी को गौ रूप धरकर ही भगवान विष्णु से दु:ख हरने का आख्यान सुनते हैं।

अर्वाचीन इतिहास देखें तो मुगलिया और ब्रितानी सल्तनत काल में या स्वातंत्र्योत्तर काल में समय-समय पर गौमाता की हुँकार ने सनातनी समाज को जगाया है। विक्रम संवत् 2023 (1966 ईस्वी) को भारत गौरक्षा के लिए जागा था। यद्यपि तब साधु-संतों और आस्तिक जनों पर बेइंतेहाई हिंसा की गई। जबकि कमजर्फ लोगों को भोग-मनोरंजन की सामग्री से सुला दिया गया। यद्यपि अब 60 साल बाद विक्रम संवत्-2083, 2026 ईस्वी में फिर गौमाता ने हुँकार भरी है। इस बार यह हुँकार दबाई नहीं जा सकेगी। इसकी गूँज दूर तक सुनाई देगी।

वैशाख शुक्ल मोहिनी एकादशी दिनांक 27 अप्रैल को संत और आस्तिक समाज के नेतृत्व में बड़ी संख्या में सनातनी अपने-अपने तहसील कार्यालय पहुँचकर गौ माता की सेवा, सुरक्षा और सम्मान के लिए प्रार्थना पत्र देने का संकल्प लेंगे। हाँ, सनातन का दंभ भरने वाले विचारक, मीडिया, हिन्दुत्व की राजनीति करने वाले संगठन और राजनीतिक दलों को अभी इसकी कोई हवा तक नहीं है। यह अच्छा ही है। क्योंकि भले ज्यादा शोर-शराबा न हो, प्रभाव कम दिखे, लेकिन इसमें शामिल होने वाले लोगों की नीयत और प्रतिबद्धता असंदिग्ध होगी।

आज की राजनीति के चरित्र और गुणों की बात करें तो इसके रंगमंच के बारे में वरिष्ठ हिन्दू राष्ट्रवादी लेखक श्री सीताराम गोयल जी का सिर्फ एक वक्तव्य ही पर्याप्त है। उन्होंने कोई 40 साल से अधिक समय पूर्व कहा था, “समय के साथ, कांग्रेस मुस्लिम लीग बन जाएगी और भाजपा अगली कांग्रेस बन जाएगी।”

खैर, किसी दूसरे पर दोषारोपण करना यहाँ हमारा हेतु नहीं है। आबादी के एक बड़े तबके का प्राकृतिक गौ आधारित जीवन से सरोकार नहीं रह गया है। दुर्भाग्य से हमारा यह वर्ग आज हर प्रकार से प्रभावशाली है। आधुनिक अर्थव्यवस्था का आधार अब मिट्‌टी, खेती, जंगल, नदी, पर्वत, जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों के साथ सहअस्तित्व का न रहकर उनके दोहन-शोषण से सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि वाला बन गया है। इसीलिए हम देख रहे हैं कि संसाधनों की लूट-खसोट और दबंगाई की हवस ने युद्ध को कितना आसान और सहज बना दिया है। युद्ध और प्राकृतिक आपदाओं के साथ विनाश तय है। इस अंधाधुंध विकास के साथ सर्वनाश से कोई बच नहीं सकता।

फिर भी कोशिश तो करनी होगी। विकास और सुरक्षा के अपने संकीर्ण आभासी दायरे छोड़ने होंगे। गौ सेवा-सुरक्षा और संवर्धन के लिए 27 अप्रैल को बाहर निकलना होगा। क्या हम गायों की रक्षा-सुरक्षा के लिए तहसील कार्यालय तक भी नहीं जा सकते? अगर हाँ, ताे उठिए, जागिए और आगे बढ़कर इस अभियान में साथ दीजिए। यह समझकर हम ऐसा प्रयास आत्मरक्षा के लिए कर रहे हैं। अपने भविष्य की सुरक्षा के लिए कर रहे हैं।  

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