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श्री राम मंदिर के चढ़ावे से करीब ‘200 करोड़’ का ‘गबन’, धर्म की आड़ में ऐसा अधर्म, लानत है!

टीम डायरी

अयोध्या के श्री राम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण को पूरा हुए अभी सालभर भी नहीं हुआ। बीते साल नवम्बर के महीने में मंदिर के शिखर पर धर्म-ध्वजा स्थापित की गई थी। उसके साथ ही मंदिर निर्माण कार्य की पूर्णाहुति भी हुई। लेकिन धर्म-ध्वजा स्थापित होने के महज सात महीने के भीतर श्री राममंदिर में अधर्म का बोलबाला होने का खुलासा हो गया। लगातार सूचनाएँ आ रहीं हैं कि मंदिर के सेवकों ने श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई गई रकम में खुलेआम गबन किया। वह भी हजार या लाख में नहीं, बल्कि करोड़ों रुपयों में।   

बताया जाता है कि श्रीराम मंदिर के कोष से करीब 200 करोड़ रुपए की चोरी या कहें कि ‘गबन’ हुआ है। इन दोनों शब्दों में फर्क इतना है कि चोरी में उस स्थान के लोग शामिल नहीं होते, जहाँ वह होती है। जबकि ‘गबन’ उसी स्थान के लोगों द्वारा किया जाता है। वे उसमें शामिल होते हैं। तो सूचनाओं की मानें तो श्री राम मंदिर के 50 कर्मचारी चढ़ावे की रकम में किए गए ‘गबन’ में शामिल हैं। इन सभी की सम्पत्ति में तीन-चार साल के भीतर बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई है। जबकि इन्हें मिलने वाला वेतन इतना नहीं है।     

मसलन पुलिस ने पाँच संदिग्धों को पकड़ा है। उनके पास से दो करोड़ रुपए नगद, एक कार और तीन आईफोन बरामद किए गए। उत्तर प्रदेश सरकार ने जाँच के लिए विशेष दल बना दिया है। उसने सोमवार, 15 जून से जाँच भी शुरू कर दी है। बताते है कि चढ़ावे में ‘गबन’ के इस मामले ने उस वक्त जोर पकड़ा जब 2025 में प्रयागराज महाकुम्भ का आयोजन हुआ। तब बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्री राम मंदिर के दर्शन के लिए भी पहुँचे थे। उसी समय वहाँ से हर रोज 10-15 लाख रुपए का चढ़ावा गायब किया जाने लगा। वहाँ के पूर्व लेखापाल ने इसकी शिकायत की तो उन्हें नौकरी से हटा दिया। आरोप है कि मंदिर के कैमरों का पिछले सात-आठ महीनों का रिकॉर्ड हटा दिया गया। इससे आशंका है कि ‘गबन’ में शीर्ष पदों पर बैठे लोग भी शामिल हैं। 

विशेष जाँच दल को 15 दिन में अपनी रपट देने का निर्देश दिया गया है। वह 15 दिन नहीं तो महीने-दो महीने में जाँच की रपट दे भी देगी। लेकिन इसके बाद क्या छोटे-बड़े सभी दोषियों को उचित दण्ड मिलेगा? या सिर्फ छोटे स्तर के कर्मचारियों की बलि चढ़ाकर ‘बड़ों’ को बचा लिया जाएगा? कुछ कहा नहीं जा सकता। बहुत उम्मीद भी नहीं की जा सकती। क्योंकि धर्म की आड़ में ‘अधर्म’ का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले तिरुपति बालाजी मंदिर, उज्जैन के महाकाल मंदिर आदि से भी ऐसे भ्रष्टाचार की सूचनाएँ सामने आ चुकी हैं। मगर आज तक उनमें से किसी भी जगह से यह पता नहीं चला कि किसी ‘बड़े’ जिम्मेदार को दोषी ठहराया गया हो, या सजा दी गई हो। इसीलिए ऊपर लिखा है, लानत है ऐसे लोगों पर, ऐसी व्यवस्था पर!

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Neelesh Dwivedi

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