शिवाजी महाराज : शाही तख्त के सामने बीड़ा रखा था, दरबार चित्र की भाँति निस्तब्ध था

बाबा साहब पुरन्दरे द्वारा लिखित और ‘महाराज’ शीर्षक से हिन्दी में प्रकाशित पुस्तक से

कोंकण में शिवाजी राजे ने तहलका मचा दिया था। बीजापुर दरबार में लगातार वही खबरें आ रही थीं। शाही दौलत को जबर्दस्त खतरा पैदा हो गया था। एक-एक थाना. एक-एक किला, बन्दरगाह, भू-भाग, सागर किनारे और समुन्दर की लहरें बागी मराठा हड़प रहे थे। बादशाह अली आदिलशाह उसकी माँ बड़ी बेगम साहिबा और सरदार, जगीरदार दाँतों तले उँगली दबा रहे थे। कभी मुट्ठियाँ भींच रहे थे तो कभी बाल नोंच रहे थे।

पिछले साढ़े तीन सौ साल से जो मराठे बिना चूँ-चपड़ किए सुल्तान की खिदमत कर रहे थे, उन्हीं के खून में मानो उबाल आ गया था। हाँ, उन्हें मालूम हो गया कि वे भेड़-बकरियाँ नहीं, बल्कि शेर हैं। उन्होंने अपना असली रूप देखा तेजस्वी तलवार में। दर्या की उबलती लहरों में और असुरमर्दिनी भवानी की फैली हुई आँखों में। 

लिहाजा, अब अली आदिलशाह ने भी ठान लिया कि भोसलों की यह बगावत कुचल ही डालनी है। बेचैन, बौखलाई बड़ी बेगम ने दरबार की तरफ से शहाजी राजे को फरमान भेजा, “तुम अपने बेटे को काबू में रखो, वरना नतीजा भयानक होगा।” लेकिन शहाजी राजे भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेले थे। उन्होंने साफ जवाब दिया, “बेटा मेरे कहने में नहीं है। हुजूर अपनी तरफ से जो चाहे कर सकते हैं।”

और फिर बादशाह ने मराठों का हो-हल्ला बन्द करने के लिए एक जोरदार मुहिम की योजना बनाई। पर इस मुहिम का सेनापति कौन हो? यह सम्मान किसे दें? यही सब तय करने के लिए बादशाह ने सभी दरबारियों को बुला लिया (सन् 1659 अप्रैल का आरम्भ)। सभी सरदार दरबार में हाजिर हुए। मामला संगीन था। शिवाजी को पराजित करने का बीड़ा आखिर कौन उठाएगा? बात आसान नहीं थी। सह्याद्रि और समुन्दर जैसे कठिन शिवाजी से उलझना था। शाही तख्त के सामने बीड़ा रखा हुआ था। दरबार चित्र की भाँति निस्तब्ध था। तब बड़ी बेगम का क्षुब्ध स्वर दरबार में गूँजा, “शिवा को गिरफ्तार करने के लिए कौन जान की बाजी लगाएगा? बताओ?” दरबार में खामोशी छा गई। 

इतने में एक प्रचंड डील-डौल का, भारी भरकम आदमी जमीन को थर्राता सामने आया। उसने आगे बढ़कर थाली में से बीड़ा उठाकर गर्जना की, “मैं शिवा को गिरफ्तार कर हुजूर के कदमों में पेश करूँगा।” इस गर्जना से दरबार में हलचल मच गई। यह अफजल खान का प्रण था। सो, जीत के बारे मैं किसी को सन्देह ही नहीं था। बड़ी बेगम साहिबा का तना हुआ चेहरा खिल गया। वैसे, शिवाजी जैसे बागी को मारना अफजल खान के बाएँ हाथ का खेल था। फिर भी, ऐहतियात के तौर पर उसने प्रचंड सेना को साथ में ले लिया।

बला की ताकत, असीम शौर्य और अमानुष क्रौर्य। इनका मेला था इस लौह-पुरुष में। अफजल खान वहशी था। पर जंगली नहीं था। बड़े-बड़े कारनामे उसके नाम पर दर्ज थे। आदिलशाही तख्त का वफादार नौकर था वह। बादशाह की सैनिकी चाकरी वह जी-जान से करता था। उसकी तलवार से सारा दक्खन और लंका आतंकित थी। कूटनीति में लोगों के दिल दहलाने वाले औरंगजेब तक को बीदर, कल्याण की मुहिम में अफजल खान ने सैनिकी करामात से भयचकित किया था। वह तो औरंगजेब की किस्मत अच्छी थी, सो वह उसमें से बच निकला। वरना वह अफजल खान के हाथों या तो मारा जाता या गिरफ्तार हो जाता (सन् 1657 अक्टूबर के अन्त में)।

अफजल खान एक गरीब रसोई बनाने वाली की कोख से जना था। लेकिन अपनी ताकत और चतुरता के बल पर उसका रुतबा बुलन्द हुआ। वह अनुशासन का पाबन्द था। कारोबार में वह अत्यधिक सतर्क रहता था। सूबेदार की हैसियत से वह किसी पर भी अन्याय नहीं करता था। रिआया से उसे ममत्व था। इस्लाम का कट्टर अभिमानी अफजल खान अपने आपको धर्म का सेवक, काफिरों का नाश करने वाला और मूर्तिध्वंसक कहलाता था। लेकिन अपनी मजहबी वृत्ति का परिचय ज्यादातर आक्रमण के समय ही देता था। अमन के समय उसने किसी पर अत्याचार किया हो, ऐसा दिखाई नहीं देता। उल्टे हिन्दू देवस्थानों की आमदनी का जरिया उसने पहले की ही तरह जारी रखा था।

हालाँकि स्वभाव से यह अत्यन्त क्रूर था। एक बार एक आदमी बिना इजाजत के गैरहाजिर रहा। उसे खान ने पत्र भेजा कि बीबी-बच्चों समेत तुम्हारी गर्दन काट दूँगा। उन सभी गर्दनों की कोल्हू में डालकर उन्हें कुचल डालूँगा (दिनांक 15 जुलाई, 1654)। शिवाजी राजे के बड़े भाई सम्भाजी तथा सरसेनापति मुल्ला मुहम्मद की मौत का जिम्मेदर वही था। खान को शहाजी राजे से बेहद ईर्ष्या थी। गिरफ्तारी के बाद शहाजी राजे को जिंजी से बीजापुर अफजल खान ही लाया था। अब अफजल खान सपने देख रहा था शिवाजी राजे और हिन्दवी स्वराज्य को पूर्णतः नष्ट करने के।

अफजल खान की निष्ठा थी, अली आदिलशाह और बड़ी वेगम साहिबा के कदमों में। हिन्दुओं की पवित्र मूर्तियाँ तोड़ने-फोड़ने में। उनका स्वाभिमान पाँवों तले रौंदने में। शिवाजी राजे उसके मालिक की सत्ता को ही ललकार रहे थे। हिन्दुओं के स्वाभिमान को उकसा रहे थे। उनके लिए स्वराज्य का निर्माण कर रहे थे। दोनों की धारणाओं में ही बुनियादी फर्क था। ऐसे में अफजल खान के हाथ शिवाजी राजे का और स्वराज्य का गला घोंटने को कसमसा रहे हों, तो वह बिल्कुल स्वाभाविक था। 
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(नोट : यह श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी पर डायरी के विशिष्ट सरोकारों के तहत प्रकाशित की जा रही है। छत्रपति शिवाजी के जीवन पर ‘जाणता राजा’ जैसा मशहूर नाटक लिखने और निर्देशित करने वाले महाराष्ट्र के विख्यात नाटककार, इतिहासकार बाबा साहब पुरन्दरे ने एक किताब भी लिखी है। हिन्दी में ‘महाराज’ के नाम से प्रकाशित इस क़िताब में छत्रपति शिवाजी के जीवन-चरित्र को उकेरतीं छोटी-छोटी कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ उसी पुस्तक से ली गईं हैं। इन्हें श्रृंखला के रूप में प्रकाशित करने का उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि पुरन्दरे जी ने जीवनभर शिवाजी महाराज के जीवन-चरित्र को सामने लाने का जो अथक प्रयास किया, उसकी कुछ जानकारी #अपनीडिजिटलडायरी के पाठकों तक भी पहुँचे। इस सामग्री पर #अपनीडिजिटलडायरी किसी तरह के कॉपीराइट का दावा नहीं करती। इससे सम्बन्धित सभी अधिकार बाबा साहब पुरन्दरे और उनके द्वारा प्राधिकृत लोगों के पास सुरक्षित हैं।) 
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शिवाजी ‘महाराज’ श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ 
16- शिवाजी ‘महाराज’ : राजे को तलवार बहुत पसन्द आई, आगे इसी को उन्होंने नाम दिया ‘भवानी’
15- शिवाजी महाराज : कमजोर को कोई नहीं पूछता, सो उठो! शक्ति की उपासना करो
14- शिवाजी महाराज : बोलो “क्या चाहिए तुम्हें? तुम्हारा सुहाग या स्वराज्य?
13- शिवाजी ‘महाराज’ : “दगाबाज लोग दगा करने से पहले बहुत ज्यादा मुहब्बत जताते हैं”
12- शिवाजी ‘महाराज’ : सह्याद्रि के कन्धों पर बसे किले ललकार रहे थे, “उठो बगावत करो” और…
11- शिवाजी ‘महाराज’ : दुष्टों को सजा देने के लिए शिवाजी राजे अपनी सामर्थ्य बढ़ा रहे थे
10- शिवाजी ‘महाराज’ : आदिलशाही फौज ने पुणे को रौंद डाला था, पर अब भाग्य ने करवट ली थी
9- शिवाजी ‘महाराज’ : “करे खाने को मोहताज… कहे तुका, भगवन्! अब तो नींद से जागो”
8- शिवाजी ‘महाराज’ : शिवबा ने सूरज, सूरज ने शिवबा को देखा…पता नहीं कौन चकाचौंध हुआ
7- शिवाजी ‘महाराज’ : रात के अंधियारे में शिवाजी का जन्म…. क्रान्ति हमेशा अँधेरे से अंकुरित होती है
6- शिवाजी ‘महाराज’ : मन की सनक और सुल्तान ने जिजाऊ साहब का मायका उजाड़ डाला
5- शिवाजी ‘महाराज’ : …जब एक हाथी के कारण रिश्तों में कभी न पटने वाली दरार आ गई
4- शिवाजी ‘महाराज’ : मराठाओं को ख्याल भी नहीं था कि उनकी बगावत से सल्तनतें ढह जाएँगी
3- शिवाजी ‘महाराज’ : महज पखवाड़े भर की लड़ाई और मराठों का सूरमा राजा, पठाणों का मातहत हुआ
2- शिवाजी ‘महाराज’ : आक्रान्ताओं से पहले….. दुग्धधवल चाँदनी में नहाती थी महाराष्ट्र की राज्यश्री!
1- शिवाजी ‘महाराज’ : किहाँ किहाँ का प्रथम मधुर स्वर….

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Neelesh Dwivedi

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