यह हमारी सरकारों की अंतहीन आपराधिक अनदेखी है

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 18/8/2022

भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन के सतीनाथ षड़ंगी। भोपाल के फोटोग्राफरों को उनकी पीठ पर पड़े डंडों का नजारा याद है। पीड़ितों की आवाज बनकर सत्ता की आंख की किरकिरी बने रहे सतीनाथ पर उनके हुलिए से शायद ही कोई यकीन करे कि यह शख्स एक इंजीनियर हैं। वे हादसे के बाद अपनी जिंदगी में आए मोड़ को याद कर रहे हैं…
जब हादसा हुआ तो हम एक साथ तीन लोग थे। एक अनिल सद्गोपाल, दूसरे आलोक प्रतापसिंह, जो सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया से भी जुड़े थे। उन्होंने हमें मोर्चे से निकाल दिया। तीसरे थे, विभूति झा, जो बाद में संन्यास लेकर झाबुआ चले गए।

यूनियन कार्बाइड से 40 टन जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट और दीगर गैसों के रिसाव के भयानक दुष्प्रभावों को तब एकमात्र सरकारी रेडियो भी कम करके आंक रहा था, जो आज 25 सालों बाद भी इतनी भयावहता के साथ यहां देखे जा सकते हैं। शुरू में हमने गैस पीड़ितों के लिए तीन क्लिनिक चलाने की कोशिश की। पहला क्लिनिक 20 दिन ही चला। यह यूनियन कार्बाइड परिसर में ही था। बाद में दो और बस्तियों में खोलें, लेकिन इस कोशिश पर पुलिस प्रशासन ने पानी फेरा। पुलिस वाले मरीजों को आकर धमकाते थे कि सरकारी अस्पताल क्यों नहीं जाते, यहां क्यों आते हो? सरकार सच्चाई छुपाना चाहती थी। ताकि गैस के असली आंकड़े ही सामने न आ पाएं। सरकारी अस्पतालों में हजारों गर्भवती महिलाओं के गर्भपात के जैविक अंश खत्म किए गए ताकि यह पता ही न चल सके कि यह गैस का असर है।

सरकारी तंत्र ने हमारी कमर तोड़ने की पूरी कोशिश की। 21 जून 1985 के दिन आधी रात को मुझे क्लिनिक से पकड़ा था। हम अगले दिन बैरागढ़ में प्रदर्शन करने वाले थे। उन्हीं दिनों मतभेद के चलते जब मोर्चे से मैं बाहर आया तो जून 1986 में भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन बनाया। उसी साल सितंबर में पुलिस ने हमारे कार्यालय में छापा मारा। उनका आरोप था कि हम जासूसी करते हैं। केस कायम किया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में उन्हें अपनी इज्जत बचाने के लाले पड़े।

मैं गैस पीड़ितों की मदद के लिए आगे आए दूसरे संगठनों से भी जुड़ा। इनमें अब्दुल जब्बार और बालकृष्ण नामदेव जैसे कार्यकर्ताओं के संगठन भी शामिल हैं। इन 25 सालों में भारत की छोटी-बड़ी सब अदालतों के अलावा अमेरिकी अदालत भी शामिल हैं। अमेरिकी अदालत में 15. नवंबर 1999 को हमने मामला दायर किया। जॉन कीनन नाम के उसी जज की अदालत में जो 1986 में यह फैसला दे चुका था कि भोपाल का मामला अमेरिकी अदालत में नहीं, भारत की ही अदालत में जाना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि अमेरिकी कानून के हिसाब से मुआवजा ज्यादा देना पड़ता। फिर हम पानी मिट्टी में जहर का मामला लेकर 1999 में अमेरिका की अदालत में गए तो वहां के कायदे के मुताबिक मामला जॉन कीनन के पास ही आया। तीन बार मामला खारिज हुआ। हम हर बार अपील में जीते। इसमें यूनियन कार्बाइड और वारेन एंडरसन के खिलाफ आम पीड़ित लोग याचिकाकर्ता हैं।

इस संघर्ष का हासिल यह है कि जिस बहुराष्ट्रीय कंपनी डाऊ केमिकल ने अपने व्यावसायिक विस्तार के लिए 2001 में यूनियन कार्बाइड को टेकओवर किया, उसमें हम पूंजी निवेश को रोक पाए हैं। डाऊ पुणे के पास एक ग्लोबल रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर शुरू करना चाहती थी। लोगों ने उनके परिसर को जलाकर राख कर दिया। महाराष्ट्र सरकार को भी कहना पड़ा कि डाऊ को वहां इजाजत नहीं दी जाएगी।

केंद्र सरकार यूनियन कार्बाइड पर आपराधिक मामले को खत्म करना चाहती थी। एंडरसन के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी है। हमारी कामयाबी यह है कि हम मध्यप्रदेश सरकार के झूठ का पर्दाफाश कर पाए। अगर 10-15 हजार गैस पीड़ितों को पीने का साफ पानी नसीब हो पाया है तो वह इसी लड़ाई का हासिल है। यह दुर्भाग्य है कि ऐसे हादसों के समय भी हमारी सरकारों का रवैया मालदार बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गोद में बैठने का रहा है। मैं खुलकर कहता हूं कि अर्जुनसिंह से लेकर बाबूलाल गौर और शिवराजसिंह चौहान तक, जयराम रमेश से लेकर मोंटेकसिंह अहलूवालिया और पी. चिदंबरम् तक सब के सब नेता इन कंपनियों के हितैषी हैं। यह मैं दस्तावेजी सबूतों के आधार पर कह रहा हूं। यह याद करना मुश्किल है कि गैस त्रासदी में कोई एक नेता भी पूरी संवेदनशीलता के साथ अपनी पीड़ित जनता के साथ खड़ा नजर आया हो, जो निर्वाचित नेता होने के कारण उनकी पहली जिम्मेदारी थी। जैसी मदद यूनियन कार्बाइड को अर्जुनसिंह के समय मिली, डाऊ केमिकल को वही मदद शिवराजसिंह चौहान देते दिखे। वे लोगों की दिक्कतें कुबूल करने को राजी नहीं है। यह हमारी सरकारों की अंतहीन आपराधिक अनदेखी है।

हम संघर्षशील लोगों के मन में अगर किसी के प्रति जरा सी भी इज्जत है तो उन गरीब औरतों के प्रति, जिन्होंने अपना सब कुछ बरबाद होने के बावजूद हिम्मत नहीं हारी और इस निर्मम व्यवस्था से टकराए। हकीकतों का पर्दाफाश किया। वे लड़ रहे हैं और जीत रहे हैं। डाऊ कंपनी में पूंजी निवेश को रोक लेना बड़ी सफलता है। डाऊ केमिकल ने मुंबई और चेन्नई की हाईकोर्ट में मुझ पर अपने व्यावसायिक नुकसान और मानहानि के मामले लगाए हैं। भोपाल का वह खौफनाक मंजर आंखों से कभी ओझल नहीं होता। इस कभी न भुला सकने वाले हादसे के शिकार लोगों के लिए कुछ करना सिर्फ यहीं तक सीमित लड़ाई का हिस्सा नहीं है। यह मुद्दा अब कंपनियों के आपराधिक कुकर्मों, औद्योगिक प्रदूषण और खतरे में पढ़े जनस्वास्थ्य का भी सवाल है। हमें इन सबसे जागरूक होने की जरूरत है।
(जारी….)
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(नोट : विजय मनोहर तिवारी जी, मध्य प्रदेश के सूचना आयुक्त, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार हैं। उन्हें हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार ने 2020 का शरद जोशी सम्मान भी दिया है। उनकी पूर्व-अनुमति और पुस्तक के प्रकाशक ‘बेंतेन बुक्स’ के सान्निध्य अग्रवाल की सहमति से #अपनीडिजिटलडायरी पर यह विशेष श्रृंखला चलाई जा रही है। इसके पीछे डायरी की अभिरुचि सिर्फ अपने सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकार तक सीमित है। इस श्रृंखला में पुस्तक की सामग्री अक्षरश: नहीं, बल्कि संपादित अंश के रूप में प्रकाशित की जा रही है। इसका कॉपीराइट पूरी तरह लेखक विजय मनोहर जी और बेंतेन बुक्स के पास सुरक्षित है। उनकी पूर्व अनुमति के बिना सामग्री का किसी भी रूप में इस्तेमाल कानूनी कार्यवाही का कारण बन सकता है।)
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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ  
46. सिर्फ तीन शख्सियतों ने गैस पीड़ितों के प्रति मानवीय संवेदनशीलता दिखाई
45. सरकार स्वर्णिम मध्यप्रदेश का नारा दे रही है, मुझे हंसी आती है
44. सियासत हमसे सीखिए, ज़िद नहीं समझौता कीजिए!
43 . सरकार घबराई हुई थी, साफतौर पर उसकी साठगांठ यूनियन कार्बाइड से थी!
42. लेकिन अर्जुनसिंह वादे पर कायम नहीं रहे और राव पर उंगली उठा दी
41. इस मुद्दे को यहीं क्यों थम जाना चाहिए?
40. अर्जुनसिंह ने राजीव गांधी को क्लीन चिट देकर राजनीतिक वफादारी का सबूत पेश कर दिया!
39. यह सात जून के फैसले के अस्तित्व पर सवाल है! 
38. विलंब से हुआ न्याय अन्याय है तात् 
37. यूनियन कार्बाइड इंडिया उर्फ एवर रेडी इंडिया! 
36. कचरे का क्या….. अब तक पड़ा हुआ है 
35. जल्दी करो भई, मंत्रियों को वर्ल्ड कप फुटबॉल देखने जाना है! 
34. अब हर चूक दुरुस्त करेंगे…पर हुजूर अब तक हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे थे? 
33. और ये हैं जिनकी वजह से केस कमजोर होता गया… 
32. उन्होंने आकाओं के इशारों पर काम में जुटना अपनी बेहतरी के लिए ‘विधिसम्मत’ समझा
31. जानिए…एंडरसरन की रिहाई में तब के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की क्या भूमिका थी?
30. पढ़िए…एंडरसरन की रिहाई के लिए कौन, किसके दबाव में था?
29. यह अमेरिका में कुछ खास लोगों के लिए भी बड़ी खबर थी
28. सरकारें हादसे की बदबूदार बिछात पर गंदी गोटियां ही चलती नज़र आ रही हैं!
27. केंद्र ने सीबीआई को अपने अधिकारी अमेरिका या हांगकांग भेजने की अनुमति नहीं दी
26.एंडरसन सात दिसंबर को क्या भोपाल के लोगों की मदद के लिए आया था?
25.भोपाल गैस त्रासदी के समय बड़े पदों पर रहे कुछ अफसरों के साक्षात्कार… 
24. वह तरबूज चबाते हुए कह रहे थे- सात दिसंबर और भोपाल को भूल जाइए
23. गैस हादसा भोपाल के इतिहास में अकेली त्रासदी नहीं है
22. ये जनता के धन पर पलने वाले घृणित परजीवी..
21. कुंवर साहब उस रोज बंगले से निकले, 10 जनपथ गए और फिर चुप हो रहे!
20. आप क्या सोचते हैं? क्या नाइंसाफियां सिर्फ हादसे के वक्त ही हुई?
19. सिफारिशें मानने में क्या है, मान लेते हैं…
18. उन्होंने सीबीआई के साथ गैस पीड़तों को भी बकरा बनाया
17. इन्हें ज़िन्दा रहने की ज़रूरत क्या है?
16. पहले हम जैसे थे, आज भी वैसे ही हैं… गुलाम, ढुलमुल और लापरवाह! 
15. किसी को उम्मीद नहीं थी कि अदालत का फैसला पुराना रायता ऐसा फैला देगा
14. अर्जुन सिंह ने कहा था- उनकी मंशा एंडरसन को तंग करने की नहीं थी
13. एंडरसन की रिहाई ही नहीं, गिरफ्तारी भी ‘बड़ा घोटाला’ थी
12. जो शक्तिशाली हैं, संभवतः उनका यही चरित्र है…दोहरा!
11. भोपाल गैस त्रासदी घृणित विश्वासघात की कहानी है
10. वे निशाने पर आने लगे, वे दामन बचाने लगे!
9. एंडरसन को सरकारी विमान से दिल्ली ले जाने का आदेश अर्जुन सिंह के निवास से मिला था
8.प्लांट की सुरक्षा के लिए सब लापरवाह, बस, एंडरसन के लिए दिखाई परवाह
7.केंद्र के साफ निर्देश थे कि वॉरेन एंडरसन को भारत लाने की कोशिश न की जाए!
6. कानून मंत्री भूल गए…इंसाफ दफन करने के इंतजाम उन्हीं की पार्टी ने किए थे!
5. एंडरसन को जब फैसले की जानकारी मिली होगी तो उसकी प्रतिक्रिया कैसी रही होगी?
4. हादसे के जिम्मेदारों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए थी, जो मिसाल बनती, लेकिन…
3. फैसला आते ही आरोपियों को जमानत और पिछले दरवाज़े से रिहाई
2. फैसला, जिसमें देर भी गजब की और अंधेर भी जबर्दस्त!
1. गैस त्रासदी…जिसने लोकतंत्र के तीनों स्तंभों को सरे बाजार नंगा किया!  

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Neelesh Dwivedi

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Neelesh Dwivedi

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