इनकी कहानी इन दिनों सोशल मीडिया पर सुर्खियों में हैं।
टीम डायरी
खुशी पाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। ज्यादातर लोग अमूमन बड़ी से बड़ी नौकरी करने की कोशिश करते हैं। मोटी तनख्वाह, ऊपर की कमाई का बंदोबस्त, और इस सबके लिए बॉस की चापलूसी, मालिकों की जी-हुजूरी, ऐसा कुछ भी करना पडृे तो कोई गुरेज नहीं। रोज दो-चार बातें, ताने सुनने पड़ जाएँ तो हर्ज नहीं। क्योंकि महीने की शुरुआत में मिलने वाली तनख्वाह से जो सुकून मिलता है, वह बाकी हर चीज को पीछे छोड़ देता है, ऐसा उन्हें लगता है। वहीं जो लोग नौकरी नहीं करते, वे दिन-रात अपने धंधे में मरते-खपते हैं, उसकी तीन-13 में उलझे रहते हैं। शरीर काे जलाते हैं। दिमाग को कुंद कर लेते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि खूब पैसे से खूब-सारा सुख मिलता है!
लेकिन क्या यही सच है? बहुत लोगों के लिए यही सच हो सकता है, लेकिन सबके लिए नहीं। इस लेख के साथ तस्वीर में जो लड़की दिख रही है, वह भी उन चुनिंदा लोगों में शामिल है, जो मानते हैं कि खुश रहने के लिए पैसा सब कुछ नहीं। यह लड़की कुछ वक्त पहले तक सूचना-तकनीक क्षेत्र की एक बड़ी कम्पनी में नौकरी करती थी। प्रबंधक के पद पर थी। इस हैसियत में तनख्वाह अमूमन दो लाख रुपए महीना महीना या उससे ज्यादा होती है। पूरे नौ साल इसने वह नौकरी की, फिर छोड़ दी। अपना ऑटो रिक्शा खरीदा और खुद उसे लेकर बेंगलुरू की सड़कों पर उतर गई। आज ऑटो चलाकर वह महीने में करीब 60 हजार रुपए कमाती है। अब कमाई कम, खुशी ज्यादा है। अभी हाल ही में एक महिला ने उसके ऑटो में सफर किया। इसी दौरान दोनों की बात हुई। बातों ही बातों में उसकी यह कहानी सामने आ गई। इसे सोशल मीडिया पर साझा किया तो लोगों ने हाथों-हाथ लिया।
उन्होंने लिखा, “कभी-कभी अनौपचारिक बातचीत से बड़ी दमदार कहानियाँ निकल आती हैं। आज मैं एक महिला ऑटो-चालक से मिली। वह गजब के आत्मविश्वास से भरी हुई थी। सलीकेदार कपड़े पहने थे उसने और चेहरे पर सुकून साफ झलक रहा था। मैंने उससे पूछा कि पुरुषों की प्रधानता वाले इस पेशे में कैसे उसका आना हुआ? और कैसा महसूस होता है उसे यह काम करके? उसने जो जवाब दिया, वह मेरे जेहन में घर कर गया। उसने बताया कि वह नौ साल तक एक सूचना-तकनीक क्षेत्र की कम्पनी में प्रबंधक थी। मगर उसने वह नौकरी छोड़ दी क्योंकि उसमें बेवजह का तनाव बहुत था। लगातार दबाव रहता था। इससे वह मानसिक रूप से बुरी तरह थक जाती थी। उसके ठीक उलट आज वह अपना ऑटो चलाती है। महीने में 60 हजार रुपए कमाती है, लेकिन खुशी बहुत है, जीवन में शांति है। अपना समय, अपना काम, सब अपने हिसाब से नियमित करती है।”
यह कहानी साझा करने वाली महिला ने इसके साथ ही खुद से और अपने जैसे लोगों से एक सवाल भी किया। उन्होंने लिखा, “अक्सर ही ऐसा होता है न कि हम अपने लक्ष्यों, अपने सपनों के पीछे भागते-भागते खुद से यह पूछना भूल जाते हैं कि हमें खुशी आखिर मिलती किस चीज से है?” सच है, यह सवाल पूछिए खुद से। ईमानदारी से ढूँढिए अपनी सच्ची खुशी और हाथ पकड़ कर ले आइए उसे अपनी जिन्दगी में वापस। वरना वक्त निकलने के बाद पछतावे के अलावा कुछ भी हाथ में नहीं रहेगा।
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