इस्लाम में जब गौवंश का वध अनिवार्य नहीं, तो ये हमेशा इसे फसाद का मुद्दा क्यों बनाते हैं?

टीम डायरी

कानून ने सख्ती दिखाई, तो पूरे तमिलनाडु में बकरीद के दौरान गौवंश का वध लगभग नहीं ही किया गया। इसी तरह असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की सरकारों ने भी सख्ती बरती तो मुस्लिमों ने वहाँ भी गौवंश के वध से परहेज किया। इसका मतलब क्या? यही कि गौवंश के वध के बिना भी मुसलमान अपना त्योहार मना सकते हैं। तो फिर आखिर गौवंश के वध को यह समाज हमेशा लड़ाई-झगड़े का मुद्दा बनाने की कोशिश क्यें करता है? यह प्रश्न भारत के बहुसंख्य हिन्दू समाज के लिए एक पहेली बना हुआ है। 

यह विषय अभी विचार के लिए इसलिए सामने आया क्योंकि दो दिन पहले ही मद्रास उच्च न्यायालय ने इस बारे में बहुत स्पष्ट टिप्पणी की है। बुधवार, 27 मई को न्यायाधीशों ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा, “बकरीद पर गाय की कुर्बानी देना, इस्लाम मानने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए अपने धार्मिक विश्वास और विचारों को दिखाने के लिहाज से कोई अनिवार्य काम नहीं है। यह सिलसिला तो अंग्रेजों के जमाने में शुरू हुआ। अंग्रेज सेना की खान-पान सम्बन्धी जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत में गौवंश का बड़ी तादाद में वध किया जाने लगा था। जबकि उससे पहले तो कई मुस्लिम शासकों ने इस पर प्रतिबंध तक लगा रखा था।” 

इससे आगे न्यायाधीशों का कहना था, “गौवंश की रक्षा महात्मा गाँधी के दिल के भी बहुत करीब का मुद्दा था। कई राज्यों ने गौवंश पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। उन कानूनों को अदालतों ने भी सही ठहराया है। देश की शीर्ष अदालत भी कह चुकी है कि सभी मुस्लिम बकरीद के दिन गायों की कुर्बानी नहीं देते।” इन सन्दर्भों के साथ मद्रास उच्च न्यायालय ने बकरीद के मौके पर तमिलनाडु में गौवंश के वध को पूरी तरह रोक दिया। साथ ही, राज्य पुलिस को यह आदेश दिया कि वह बकरीद के अगले दिन अदालत में इस बाबत प्रतिवेदन दाखिल करे। उसमें बताए कि अदालत के आदेश का पालन सही से हुआ या नहीं। पुलिस ने प्रतिवेदन दिया भी है। 

यहाँ फिर याद दिला दें कि पश्चिम बंगाल में अभी नई बनी सरकार ने गौवंश का वध रोकने के सम्बन्ध में कुछ नियम सार्वजनिक किए हैं। उन नियमों का वहाँ सख्ती से पालन किए जाने की सूचना है। असम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, जैसे राज्यों की सरकारों ने भी इसी तरह के कदम उठाए हैं। उनका पालन भी करवाया है। लेकिन फिर भी कुछ लोग हैं, जो इस संवेदनशील विषय को लड़ाई-झगड़े का मुद्दा बनाने से पीछे नहीं हट रहे हैं। मसलन- बंगाल में अभी-अभी का बना एक नेता है हुमायूँ कबीर। उसका कहना था, “सरकार के पास अधिकार है कि वह गाय के सम्बन्ध में कोई आदेश जारी कर सकती है। वह मुसलमानों से कह सकती है कि वे गाय न खाएँ। लेकिन कुर्बानी तो होगी उसे कोई रोक नहीं सकता। गाय की भी कुर्बानी होगी। बकरी भी होगी। ऊँट की भी होगी।” 

इतना ही नहीं, मई 2017 का मसला तो लोग अब भी भूले नहीं होंगे। उस वक्त केरल में देश की सबसे पुरानी पार्टी के कुछ नेताओं ने सड़क के बीचों-बीच गौवंश का वध कर उसका माँस खाया था। यह उनके विरोध प्रदर्शन का तरीका था, यह बताने के लिए वे गौवंश के वध पर रोक को नहीं मानेंगे। अभी भी अलबत्ता, कुछ राज्यों की सरकारों व अदालतों की सख्ती के कारण ही मुस्लिम समाज गौवंश के वध से परहेज कर रहा है। निश्चित रूप से मजबूरी के कारण। नहीं तो बीच-बीच में गौवंश वध के खिलाफ आवाजें क्यों उठतीं भला? ऐसे में सवाल फिर वही है कि गौवंश का वध मुस्लिमों की धार्मिक आस्था के लिहाज से अनिवार्य नहीं है। ऐसा होता तो वे मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले का पुरजोर विरोध कर रहे होते। तो फिर वे इस मसले को फसाद का जरिया क्यों बनाते हैं? 

देश के साम्प्रदायिक ताने-बाने के लिहाज से यह बेहद अहम सवाल है। इसका जवाब खास तौर पर मुस्लिम समाज को देना ही चाहिए।

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Neelesh Dwivedi

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