श्रीकृष्ण-सुदामा की मित्रता और भेंट का प्रसंग आज भी एक मिसाल की तरह पेश किया जाता है।
टीम डायरी
सिख पन्थ की पवित्र शबद कीर्तन की इस भक्ति रचना को गौर से सुनिए। नीचे दिए गए वीडियो में रागी जत्थे के सदस्य भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता का प्रसंग गा रहे हैं, “हरिजी आए, हरिजी आए, छड सिंहासन हरिजी आए।” इसकी भाषा कठिन नहीं है। थोड़ा ध्यान देने पर एक-एक पद समझ आ जाएगा।
समझते-समझते वह तस्वीर सामने आ जाएगी कि कैसे भगवान अपने मित्र के आने का समाचार सुनते ही नंगे पैर दौड़ पड़े थे। सुदामा को दंडवत् प्रणाम किया। गले लगाया। आँसुओं से अपने मित्र के पैर धोए। क्योंकि वह ब्राह्मणों को पूज्य मानते थे। सुदामा जब द्वारिका का वैभव देखकर दंग रह गए और श्रीकृष्ण के लिए अपने घर से लाया हुआ चार मुट्ठी चिऊड़ा (चावल का उत्पाद) उनसे छिपाने लगे तो भगवान ने देख लिया। उनसे उन्हेांने वह पोटली छीनकर भोग लगाया और प्रेम के उस हर दाने के बदले पूरे जगत का ऐश्वर्य सुदामा पर न्यौछावर कर दिया।
और ये मनोरम दृश्य खींचने के माध्यम बने शबद के सुर, संगीत और संगति पर भी ध्यान दीजिएगा। कितनी अनुरूपता है उनमें भी…
…और शबद कीर्तन में गाया जाने वाला यह इक़लौता भजन नहीं है। श्रीकृष्ण की तरह ही श्रीराम के लीला-प्रसंगों को भी इसमें ऐसे ही गाते है। और दूसरे स्वरूपों की लीलाएँ भी। लेकिन लगता है, जो सिख पन्थ और सनातन के बीच बैर बोने में लगे हैं, वे शायद ऐसी शबद कीर्तन को भी सुनते नहीं। क्योंकि अगर सुनते तो उन्हें मानना पड़ता कि अस्ल में दोनों धाराओं के बीच अलगाव जैसी बात है ही नहीं। उनका स्रोत और दिशा एक है।
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