भीड़ में अपना कोना खोजकर कुछ किस्से कहानियाँ सुनना, सुनाना… यही जीवन है

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से, 19/3/2022

ज़िन्दगी एक लम्बा ट्रैफिक है। आने-जाने वाले वाहनों की भीड़ है। छोटे-बड़े वाहन सड़क पर हर तरफ पसरे हैं। कोलाहल है, आवाज़ें हैं। कर्कश शोर है और धूल-धुआँ लगातार हर पल हर जगह बना हुआ है। मैं इसके बीच से गुजरता हूँ और हर झटके और छोटे-बड़े वाहनों के टल्ले से रोज अपने को बचाकर ले आता हूँ। गहरे अवसाद और तनाव के क्षणों में मेरा खालीपन, मेरी उदासी यह सब याद करके अपनी पीठ थपथपाती है। बहादुर होने का ख़ुद को ही ख़िताब देती है कि मुफ़लिसी के चरम दिनों में और इस क़दर व्यस्त संसार को अनथक देखते-समझते हुए तुम फिर लौट आए जीवन में। किसी के पास समय नहीं कि काँधे पर दो पल महीन सा एक गर्म हाथ रख दे और पूछ ले कि ठीक तो हो न? 

इस कोने पर बैठकर मैं मशीनीकृत सरकती भीड़ को देखता हूँ। अपने इस छोटे से कोने पर रखी हुई लोहे की बेंच को महसूसता हूँ, जो हर मौसम में अलग हो जाती है। इन दिनों मरी हुई देह के मानिन्द शुष्क पड़ी रहती है और जब आता हूँ लगभग पाँच किलोमीटर चलकर तो चहक उठती है। फिर कहानियाँ सुनाने लगती है। दिन भर आए मुसाफ़िरों की कि कौन क्या ख़ुशी, ग़म और अबोले किस्से छोड़ गया सिसकते हुए। यहाँ 10 मिनिट रोज़ बैठकर पूरी दास्तान सुनता हूँ। बरसात में सामने से पानी भर-भर बरसता है या गर्मी में लू की लपेट चलती है पर संसार की न भीड़ कम होती है और न वाहनों का शोर या रफ़्तार। 

सोचता हूँ, कहाँ जाना चाहते हैं ये सब इतनी तेज़ी से? क्या पा लेना चाहते हैं? आख़िर सबसे आगे जाकर भी ऐसा क्या पा लेंगे, जिससे मैं अभी तक महरूम रह गया? कहीं इस आगे-पीछे की दौड़ में सच में कुछ खोया तो नहीं? पर फिर लगता है, था ही क्या खोने-पाने को और आज जो शेष है झोली में, वह निरर्थक ही है। जो भी इकठ्ठा किया बाँट रहा हूँ अब बहुत शिद्दत से। पूरी तिजोरी खाली कर देना है इन चन्द साँसों के थमने के पहले। जीवन किसी शेड जैसा हो गया है। हर तरफ से खुला और मौसमों के अनुरूप बदलता हुआ। 

बहरहाल, भीड़ में अपना कोना खोजकर कुछ किस्से कहानियाँ सुनना और सुनाना और हर दिन की स्मृतियाँ एकत्रित करने का नाम ही शायद जीवन हो। मेरे बाद इस शेड में जो भी बैठेगा, एक दिन मेरी भी सभी कहानियाँ सुनकर निश्चित ही रोमांचित होगा। और अनायास ही कहेगा, अरे, जो ज़िन्दा था अब तक, ख़त्म हुआ और यह सब कुछ बर्दाश्त करता रहा। 

एक गोरिला ग्लास बेचने वाला रोज़ सुबह आकर दुकान सजाता है। दिन भर ग्राहकों को रिझाता है और अँधेरा घिरने पर अपनी केनोपी और सामान समेटकर पता नहीं कहाँ खो जाता है। लम्बी अँधियारे भरी रात की सुरंग में। उसके चेहरे पर कभी शिकन देखता हूँ और कभी एक तिल मुस्कुराहट। पर वो बे-नागा आता है और सजाने-समेटने के क्रम को जारी रखता है। 

शरीर, आत्मा और इस काया-माया के यही दुष्चक्र हैं। हर बार एक पड़ाव पार करके लम्बी अन्धी सुरंग में जाना है और फिर स्वस्फूर्त ऊर्जा के संग इसी भीड़ और सड़क पर लौट आना है बारम्बार। जबकि हर बार का हश्र हमें मालूम है! 
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(संदीप जी स्वतंत्र लेखक हैं। यह लेख उनकी ‘एकांत की अकुलाहट’ श्रृंखला की 51वीं कड़ी है। #अपनीडिजिटलडायरी की टीम को प्रोत्साहन देने के लिए उन्होंने इस श्रृंखला के सभी लेख अपनी स्वेच्छा से, सहर्ष उपलब्ध कराए हैं। वह भी बिना कोई पारिश्रमिक लिए। इस मायने में उनके निजी अनुभवों/विचारों की यह पठनीय श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी की टीम के लिए पहली कमाई की तरह है। अपने पाठकों और सहभागियों को लगातार स्वस्थ, रोचक, प्रेरक, सरोकार से भरी पठनीय सामग्री उपलब्ध कराने का लक्ष्य लेकर सतत् प्रयास कर रही ‘डायरी’ टीम इसके लिए संदीप जी की आभारी है।) 
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इस श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ  ये रहीं :
50.लड़ना न पड़े, ऐसी व्यवस्था आज तक हम किसी सभ्यता में बना नहीं पाए हैं
49. मार्च आ गया है, निश्चित ही ब्याज़ आएगा, देर-अबेर, उम्मीद है, फिर…
48. एक समय ऐसा आता है, जब हम ठहर जाते हैं, अपने आप में 
47.सब भूलना है, क्योंकि भूले बिना मन मुक्त होगा नहीं
46. एक पल का यूँ आना और ढाढ़स बँधाते हुए उसी में विलीन हो जाना, कितना विचित्र है न?
45.मौत तुझसे वादा है…. एक दिन मिलूँगा जल्द ही
44.‘अड़सठ तीरथ इस घट भीतर’
43. ठन, ठन, ठन, ठन, ठन – थक गया हूँ और शोर बढ़ रहा है
42. अपने हिस्से न आसमान है और न धरती
41. …पर क्या इससे उकताकर जीना छोड़ देंगे?
40. अपनी लड़ाई की हार जीत हमें ही स्वर्ण अक्षरों में लिखनी है
39. हम सब बेहद तकलीफ में है ज़रूर, पर रास्ते खुल रहे हैं
38 जीवन इसी का नाम है, ख़तरों और सुरक्षित घेरे के बीच से निकलकर पार हो जाना
37. जीवन में हमें ग़लत साबित करने वाले बहुत मिलेंगे, पर हम हमेशा ग़लत नहीं होते
36 : ऊँचाईयाँ नीचे देखने से मना करती हैं
35.: स्मृतियों के जंगल मे यादें कभी नहीं मरतीं
34 : विचित्र हैं हम.. जाना भीतर है और चलते बाहर हैं, दबे पाँव
33 : किसी के भी अतीत में जाएँगे तो कीचड़ के सिवा कुछ नहीं मिलेगा
32 : आधा-अधूरा रह जाना एक सच्चाई है, वह भी दर्शनीय हो सकती है
31 : लगातार भारहीन होते जाना ही जीवन है
30 : महामारी सिर्फ वह नहीं जो दिखाई दे रही है!
29 : देखना सहज है, उसे भीतर उतार पाना विलक्षण, जिसने यह साध लिया वह…
28 : पहचान खोना अभेद्य किले को जीतने सा है!
27 :  पूर्णता ही ख़ोख़लेपन का सर्वोच्च और अनन्तिम सत्य है!
26 : अधूरापन जीवन है और पूर्णता एक कल्पना!
25 : हम जितने वाचाल, बहिर्मुखी होते हैं, अन्दर से उतने एकाकी, दुखी भी
24 : अपने पिंजरे हमें ख़ुद ही तोड़ने होंगे
23 : बड़ा दिल होने से जीवन लम्बा हो जाएगा, यह निश्चित नहीं है
22 : जो जीवन को जितनी जल्दी समझ जाएगा, मर जाएगा 
21 : लम्बी दूरी तय करनी हो तो सिर पर कम वज़न रखकर चलो 
20 : हम सब कहीं न कही ग़लत हैं 
19 : प्रकृति अपनी लय में जो चाहती है, हमें बनाकर ही छोड़ती है, हम चाहे जो कर लें! 
18 : जो सहज और सरल है वही यह जंग भी जीत पाएगा 
17 : विस्मृति बड़ी नेमत है और एक दिन मैं भी भुला ही दिया जाऊँगा! 
16 : बता नीलकंठ, इस गरल विष का रहस्य क्या है? 
15 : दूर कहीं पदचाप सुनाई देते हैं…‘वा घर सबसे न्यारा’ .. 
14 : बाबू , तुम्हारा खून बहुत अलग है, इंसानों का खून नहीं है… 
13 : रास्ते की धूप में ख़ुद ही चलना पड़ता है, निर्जन पथ पर अकेले ही निकलना होगा 
12 : बीती जा रही है सबकी उमर पर हम मानने को तैयार ही नहीं हैं 
11 : लगता है, हम सब एक टाइटैनिक में इस समय सवार हैं और जहाज डूब रहा है 
10 : लगता है, अपना खाने-पीने का कोटा खत्म हो गया है! 
9 : मैं थककर मौत का इन्तज़ार नहीं करना चाहता… 
8 : गुरुदेव कहते हैं, ‘एकला चलो रे’ और मैं एकला चलता रहा, चलता रहा… 
7 : स्मृतियों के धागे से वक़्त को पकड़ता हूँ, ताकि पिंजर से आत्मा के निकलने का नाद गूँजे 
6. आज मैं मुआफ़ी माँगने पलटकर पीछे आया हूँ, मुझे मुआफ़ कर दो  
5. ‘मत कर तू अभिमान’ सिर्फ गाने से या कहने से नहीं चलेगा! 
4. रातभर नदी के बहते पानी में पाँव डालकर बैठे रहना…फिर याद आता उसे अपना कमरा 
3. काश, चाँद की आभा भी नीली होती, सितारे भी और अंधेरा भी नीला हो जाता! 
2. जब कोई विमान अपने ताकतवर पंखों से चीरता हुआ इसके भीतर पहुँच जाता है तो… 
1. किसी ने पूछा कि पेड़ का रंग कैसा हो, तो मैंने बहुत सोचकर देर से जवाब दिया- नीला! 

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