निकोबार के सुन्दर समुद्र तटों पर ‘विकास-लीला’ का साया मँडरा रहा है।
टीम डायरी
राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने अण्डमान-निकोबार बन्दरगाह परियोजना को मंजूरी दे दी। अभी 16 फरवरी, सोमवार को इस सम्बन्ध में आदेश जारी किया गया। परियोजना से जुड़ी जितनी भी आपत्तियाँ थीं, विरोध में जो याचिकाएँ लगाई गईं, उन सभी को खारिज कर दिया गया।
इस परियोजना के सम्बन्ध में सबसे ज्यादा आपत्तियाँ गलतिया-खाड़ी से जुड़ी योजना पर हैं। यह इलाका निकोबार द्वीप समूह में है। प्राकृतिक और पारिस्थितिक रूप से बेहद संवेदनशील है। यहाँ दुर्लभ किस्म के कछुओं का निवास रहा है। लेकिन अब एनजीटी के आदेश के बाद भारत सरकार इस पूरे क्षेत्र में 13 ऐसे स्थान बनाएगी, जहाँ से भारत सहित अन्य देशों के भी मालवाहक जहाज ठहरेंगे। आ-जा सकेंगे, माल परिवहन का काम करेंगे।
इतना ही नहीं। छोटी-बड़ी अन्य आधारभूत परियोजनाएँ भी यहाँ चलाई जाएँगीं। जैसे- नागरिक और सैन्य उपयोग के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, गैस और सौर ऊर्जा संयंत्र, लगभग 166 वर्ग किलोमीटर में करीब तीन लाख लोगों के रहने के लिए एक नगर, आदि। करीब 72 हजार करोड़ रुपए खर्च किए जाने हैं, इस सब पर।
जाहिर तौर पर इसके लिए इन द्वीपों पर रहने वाले आदिवासियों की जमीनें अधिगृहीत की जाएँगी। उन्हें जंगल के उनके सुरक्षित स्थानों से बेदखल किया जाएग। लाखों पेड़ काटे जाएँगे। उनकी जगह कंक्रीट के ढाँचे खड़े किए जाएँगै। प्रकृति की परिस्थितिकी को हटाया जाएगा। उसकी जगह मानव-निर्मित परिस्थितिकी बनेगी।
इसके लिए प्रशासन पूरा दबाव बना रहा है कि आदिवासी खुद अपनी जमीन, अपने इलाके छोड़ दें। सरकार को समर्पित कर दें। वरना..फिर जो करना है, वह ऐसे या वैसे किया ही जाएगा।आदिवासियों ने लगातार इसका विरोध किया है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि वे अपने पुरखों की जमीन नहीं छोड़ेंगे। लेकिन उनकी अभी तक तो एक भी नहीं चली है। आगे भी शायद ही चले क्योंकि सरकार को यहाँ चमत्कारिक ‘विकास-लीला’ खेलनी है।
तो आगे इस ‘विकास-लीला’ के परिणाम क्या होंगे, जानते हैं? अण्डमान-निकोबार के ‘आदिम’ मजबूर होकर जमीन-जंगल छोड़कर बाहर निकलेंगे। ये लोग, जो अभी पूरे हरे-भरे क्षेत्रों में किसी राजा की तरह विचरण करते हैं, आगे रूखे कंक्रीट के जंगलों में किन्हीं बेदिल लोगों के रहम-ओ-करम पर बेचारों की तरह रहेंगे। इतना ही नहीं, आजीविका के लिए भी अभी की आत्मनिर्भरता से हाथ धो बैठेंगे और जीवन चलाने के लिए किसी ‘जी-राम-जी’ जैसी योजना के तहत 200-500 रुपए की दिहाड़ी पर मजदूरी करेंगे। और तब ये आदिवासी नहीं ‘विकसित’ कहाएँगे।
है न ‘विकास-लीला’ विचित्र सी? पर क्या करें, सरकारों की ‘विकास-लीला’ ऐसी ही होती है।
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