वेद कहते हैं- मानव प्रकृति में अपना प्रतिबिम्ब, विश्व शान्ति खुद स्थापित होगी

अनुज राज पाठक, दिल्ली

“विश्व-शान्ति हेतु उपाय हमें वेद में दिखाई देते हैं। अगर वेदों के अनुसार हम विश्व-शान्ति के उपायों को अपनाएँ तो हम युद्धों से बच सकते हैं। विश्व को परिवार मानने की संकल्पना सर्वप्रथम वेद प्रस्तुत करते हैं। यहाँ विश्व से तात्पर्य धरती मात्र नहीं, अपितु पूरा ब्रह्मांड है। इस ब्रह्मांड में प्रत्येक तत्त्व को परिवार माना है “वसुधैव कुटुम्बकम्”। इसी परिवार की शान्ति की चर्चा वेद करता है। यहाँ सवाल हो सकता है कि आखिर हमें विश्व शान्ति क्यों चाहिए? इसका उत्तर है- ब्रह्मांड में प्रत्येक तत्त्व शान्त होगा, तभी विश्व उन्नति करेगा। जैसे- शरीर का एक भी अंग कष्ट में है, तो पूरा शरीर तकलीफ़ का अनुभव करेगा। यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे। जो शरीर में वही विश्व में, इसलिए हम शान्त, तो विश्व शान्त, सुखमय।”

“भारतीय संस्कृति तप, स्वाध्याय, शुद्धि आदि को अपनी नियमति दिनचर्या का हिस्सा बनाने पर जोर देती हैं। जब तक हम अपनी, अपने घर की शुद्धि नहीं करेंगे, तब तक अच्छी चीजों को कैसे जगह देंगे। इसलिए वेद मंत्र शुद्धि की बात करते हैं। मन की शुद्धि और शरीर की शुद्धि दोनों आवश्यक है। हम बाहर से और अंदर से शुद्ध होंगे तो व्यक्ति सदैव स्वस्थ होगा। बाहर से शुद्ध होने के लिए दुनिया भर के साबुन आदि प्रयोग करते हैं। मगर आन्तरिक शुद्धता चाहिए तो वेद के कथनों को मानना पड़ेगा। स्वच्छता का संकल्प केवल बाह्य न ही अपितु आन्तरिक भी हो।” 

“वेद आदेश देता है कि “सं गच्छध्वं सं वदध्‍वं” (ऋ;10.191.2.) मन शुद्ध होगा, आन्तरिक शान्ति होगी, तभी मानव पारिवारिक भाव से, बन्धुत्त्वभाव से विश्व के कल्याण हेतु कार्य कर पाएगा, “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्”। आज के शोध भी कहते हैं कि वेद के मंत्र हमें और हमारे जीवन को ही केवल व्यवस्थित नहीं करता, अपितु समस्त प्रकृति को सुव्यवस्थित करने की विधियों की व्यवहारिक व्याख्या करता है।”

लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में वास्तु विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ.देवी प्रसाद त्रिपाठी जी ने एक अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान इस तरह के उद्गारों से वेदों की महत्ता बताई। आयोजन इसी विश्वविद्यालय की ओर से किया गया था। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलपति  प्रो मुरली मनोहर पाठक ने कहा, “वेद विश्व-शान्ति के लिए उपाय देते हुए कहता है कि मानव को अपना प्रतिबिम्ब प्रकृति में देखना चाहिए। इससे मानव प्रकृति के प्रति कृतज्ञता से भर जाएगा। और विश्व में शान्ति स्वत: होने लगेगी।” इस दौरान पूर्व केन्द्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ और देश-विदेश के अन्य विद्वानों ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए वेदों की महत्ता पर रोशनी डाली। 
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(नोट : अनुज दिल्ली में संस्कृत शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापकों में शामिल हैं। अच्छा लिखते हैं। इससे पहले डायरी पर ही ‘भारतीय दर्शन’ और ‘मृच्छकटिकम्’ जैसी श्रृंखलाओं के जरिए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। समय-समय पर दूसरे विषयों पर समृद्ध लेख लिखते रहते हैं।)

(अनुज से संस्कृत सीखने के लिए भी उनके नंबर +91 92504 63713 पर संपर्क किया जा सकता है)
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