अनुज राज पाठक, दिल्ली
अभी कुछ दिन पहले की बात है। दिल्ली के बड़े अस्पताल में किसी मित्र के साथ जाना हुआ। वहाँ डॉक्टर के इंतिज़ार में एक माँ अपने छोटे बच्चे के साथ बैठी थी। बच्चा बार-बार माँ से दूध की ज़िद कर रहा था। जबकि माँ हर बार उसे समझा रही थी, “घर चलेंगे, तब दूध पीना।” मेरा ध्यान उन माँ-बेटे पर चला गया।
दरअस्ल, मेरी भी छोटी सी बिटिया है। वह ऐसे ही कहीं भी दूध पीने की ज़िद पकड़ लेती है। मैं जब भी पत्नी और बच्चों के साथ बाहर होता हूँ, तो अक्सर ऐसी स्थिति से दो-चार होता रहता हूँ। इसीलिए मुझे उस माँ की परेशानी समझते देर नहीं लगी और तुरन्त ही मुझे उसकी समस्या का समाधान भी सूझ गया।
मुझे ध्यान आया कि प्रसूति विभाग जहाँ होते हैं, वहाँ प्राय: एक केबिन छोटे बच्चों को दूध पिलाने के लिए (बेबी फीडिंग रूम) भी होता है। मैंने आस-पास नज़र दौड़ाई तो वह केबिन मुझे दिख भी गया। लिहाज़ा, साहस जुटाकर मैंने उस बच्चे की माँ को उसके बारे में बता दिया। इससे उसकी दिक़्क़त कुछ कम हुई।
आज इस घटना को यहाँ बताने का कारण यह कि दुनियाभर में मई के दूसरे रविवार को (जो आज है) ‘मदर्स डे’ मनाया जाता है। माँ के प्रति सम्मान, प्रेम प्रदर्शित करने के लिए तमाम बातें की जाती हैं। पर वास्तव में हमारा समाज ‘मदर की क़दर’ करता नहीं है। हाँ, ‘मदर केयर’ की बातें ख़ूब बढ़-चढ़ कर करता है।
अब ‘बेबी फीडिंग रूम’ जैसी बेहद ज़रूरी, संवेदनशील सुविधा की बात ही ले लीजिए। अक़्सर इसके इंतिज़ाम ऐसी जगहों पर किए जाते हैं कि वे माताओं को ठीक तरह से दिखते भी नहीं और वे परेशान होती रहती हैं। कहीं-कहीं तो इन सुविधा-कक्षों पर अतिक्रमण हो चुका होता है। और कहीं ये होते ही नहीं।
उदाहरण के लिए दिल्ली मेट्रो। उसी दिन जब मैं से अपने घर लौट रहा था तो, मेरी नज़र लगातार मेट्रो स्टेशनों पर ‘बेबी फीडिंग’ रूम ढूँढ रही थी। मगर आश्चर्य कि मुझे वे कहीं नहीं मिले। हाँ, इस क्रम में एक अन्य जानकारी ज़रूर मिली कि दिल्ली मेट्रो अपने हर स्टेशन पर सार्वजनिक शौचालय की भी सुविधा नहीं देती।
अब बताइए, इस तरह ‘मदर की क़दर’ तो क्या ‘मदर की केयर’ भी कैसे होती होगी? ‘मातृ दिवस’ के बहाने आज ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर भी बात कर ली जाए, विचार हो जाए, तो कितना बेहतर हो!
#MothersDay #BabyFeedingRoom
——
(नोट : अनुज दिल्ली में संस्कृत शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापकों में शामिल हैं। अच्छा लिखते हैं। इससे पहले डायरी पर ही ‘भारतीय दर्शन’ और ‘मृच्छकटिकम्’ जैसी श्रृंखलाओं के जरिए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। समय-समय पर दूसरे विषयों पर समृद्ध लेख लिखते रहते हैं।)
अभी सोमवार, 20 जुलाई को संसद का मॉनसून सत्र शुरू हुआ। इससे कुछ समय पहले… Read More
कलि युग में भक्ति मार्ग पाखण्ड से घिरा रहता है, इसलिए भगवान के भजन-पूजन, नाम… Read More
शिक्षा प्रणाली में मूलभूत सुधार और केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की माँग… Read More
भाषा को लेकर बेवजह की हाय-तौबा मची हुई इन दिनों। वजह वही, पीढ़ियों से भारतीय… Read More
जिन्दगी अपनी है, चुनाव भी अपने ही होते हैं। ऐसा अक्सर कहा जाता है। लेकिन… Read More