भारत में बच्चियों को मारने या महिलाओं को सती बनाने के तरीके कैसे थे?

माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 13/9/2021

नवजात बच्चियों की हत्या का विवरण देते हुए स्लीमैन लिखते हैं, “एक ख़ास किस्म की जड़ी का रस नवजात बच्चियों के मुँह में डाला जाता था। फिर उन्हीं के पेट से निकली पहली विष्ठा (मल) उनके मुँह में भर दी जाती थी। इससे बच्ची थोड़ी ही देर में मर जाती थी। इसके बाद उसे उसी कमरे में गड्‌ढा खोदकर गाड़ दिया जाता था, जहाँ उनका जन्म हुआ। फिर उस गड़ढे को मिट्‌टी और गोबर से ढँक दिया जाता था। इसके बाद 13वें दिन परिवार के कुल पुरोहित को उसी कमरे में भोजन कराने का नियम था। अपने लिए भोजन पुरोहित ख़ुद बनाता था, उसी कमरे में। उसे लकड़ियाँ दी जातीं। घी, जौ, चावल और तिल भी। वह काँसे के बर्तन में जौ, चावल और तिल को उबालता था। उनके ऊपर घी डालता। फिर उसे पूरा ख़ुद खाता था। यह प्रक्रिया अग्नि में आहुति देने के समान समझी जाती थी। यह भी कि पुरोहित ने बच्ची की हत्या का पाप ख़ुद पर लेकर उस परिवार को उससे मुक्त कर दिया है।… प्रायश्चित्त की यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद मारी गई बच्ची के माता-पिता फिर उस कमरे में पहले की तरह रहने लगते थे।”

नवजात बच्चियों को मारने की प्रथा राजपूतों में अधिक थी। लेकिन राजपूत चूँकि अधिकांश ज़मींदार थे इसलिए उनके ख़िलाफ़ बोलने से लोग बचते थे। स्लीमैन ने राजपूत ज़मींदारों के यहाँ काम करने वाले कुछ लोगों से इस बारे में बात की। लेकिन उन्होंने साफ कह दिया, “अगर हम कुछ कहेंगे या ऐसे अपराध की तरफ़ ध्यान देते हुए भी दिखेंगे, तो हमारी ज़िंदगी सुरक्षित नहीं रहेगी।” हालाँकि हो सकता है, यह कुछ अतिरंजना हो। लेकिन यह तथ्य था कि उस समय हिंदुस्तान में महिलाएँ संपत्ति की तरह देखी जाती थीं। और बच्चियों के प्रति ज़्यादातर लोग उदासीन ही थे। उनके रहने, न रहने, मारे जाने से किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। उनके प्रति आम-सुहानुभूति तक नहीं थी। इन हालात के मद्देनज़र सरकार ने 1870 के दशक के आख़िर में एक और कानून बनाया। इसके जरिए बच्चों के जन्म का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया। समय-समय पर यह बताना भी ज़रूरी किया कि अगर बच्ची पैदा हुई है तो वह सुरक्षित है, ज़िंदा है। इससे धीरे-धीरे नवज़ात बच्चियों को मारने की कुप्रथा पर थोड़ी लगाम लगी।

इसी तरह, सती प्रथा भी थी। भारत में यह कुप्रथा प्राचीन समय से चली आ रही थी। सती औरतें पति की मृत देह के साथ चिता पर बैठकर ख़ुद को ज़िंदा जला लेती थीं। यह कुप्रथा भी हिंदुओं की ऊँची जातियों में ज़्यादा थी। मुसलिम शासकों ने इसे हतोत्साहित करने की कुछ कोशिश की। औरंगज़ेब ने 17वीं सदी के आख़िर में एक आदेश जारी किया। इसमें कहा गया कि किसी भी महिला को ख़ुद को आग में जलाने की इजाज़त नहीं होगी। लेकिन इस आदेश के बावज़ूद यह कुप्रथा जारी रही। ख़ास तौर पर राजपूत राजाओं की रियासतों में। मिसाल के तौर पर 1780 में जब मारवाड़ के तत्कालीन राजा का निधन हुआ तो उनके साथ उनकी 64 पत्नियाँ भी सती हो गईं। इसी तरह पंजाब के एक सिख राजा की मृत देह के साथ उनकी 10 बीवियों और लगभग 300 उपपत्नियों ने भी मौत को गले लगा लिया। 

हालाँकि हिंदुस्तान में सती प्रथा ग़लत नहीं मानी जाती थी। बल्कि यह एक अर्धधार्मिक आयोजन जैसा था। अंग्रेजों ने शुरू में इस कुप्रथा को रोकने के लिए कोई अधिकृत नीति नहीं बनाई। मग़र 1803 में लॉर्ड वेलेज़्ली ने पहली बार कंपनी के अधिकार वाले इलाकों में सती प्रथा को पूरी तरह ख़त्म करने का प्रस्ताव किया। लेकिन उन्होंने सबसे पहले यह विचार कलकत्ता में उच्चतम न्यायालय के सामने पेश किया। इस पर अदालत ने कहा, “सरकार को सुझाव दिया जाता है कि वह धर्म के जानकारों से इस पर मशविरा करे। स्थानीय लोगों की पूर्वधारणाओं को ध्यान में रखे। उसी के मुताबिक आगे कदम बढ़ाए।” लिहाज़ा सरकार ने बीच का रास्ता निकाला। अधिकारियों को 1812 में आदेश दिया गया कि वे सिर्फ़ ‘उन्हीं मामलों महिलाओं को सती होने की इजाज़त दें, जिनमें उनका धर्म (हिंदु) इसका समर्थन करता हो। अन्य सभी मामलों में इसे अधिकारपूर्वक रोका जाए’। इस निर्देश के मुताबिक, 16 साल से ऊपर की कोई विधवा अगर इच्छा से सती होना चाहे तो उसे इजाज़त दी जा सकती थी। लेकिन अगर वह गर्भवती है तो इजाज़त नहीं दी जानी थी। सरकार ने पुलिस को भी इस पर नज़र रखने के लिए कहा कि किसी महिला को ज़बरदस्ती या नशा आदि देकर सती होने पर मज़बूर न किया जाए।  

अलबत्ता सरकार के ऐसे इंतज़ामों से सती होने वाली महिलाओं की संख्या कमी नहीं हुई, बल्कि बढ़ गई। जैसे, 1785 में बंगाल में सती होने वाली महिलाओं की संख्या 378 थी। लेकिन 1818 में यह 839 हो गई। यही नहीं, ऐसे मामलों में पुलिस की मौज़ूदगी से अब ऐसा लगने लगा, जैसे महिलाओं को सती होने की इजाज़त सरकार से ही मिल गई हो। हालाँकि इसका दूसरा पहलू यह रहा कि 1820 तक सरकार के भीतर ही इस कुप्रथा को रोकने की आवाज़ें मज़बूती से उठने लगीं। कारण कि सरकार के पास अब सबूतों की भरमार हो रही थी। प्रत्यक्ष विवरण मिल रहे थे। 

इसी क्रम में बंगाल के निचले इलाके के एक पुलिस अधीक्षक ईवर ने 1818 में सरकार को सती प्रथा से जुड़े मामले में रपट दी थी। इसमें लिखा, “किसी विधवा को जब पहली बार पति की चिता के साथ जलने का संकेत दिया जाता है तो वह स्वाभाविक तौर पर डर जाती होगी। लेकिन काफ़ी मशक्कत के बाद उसे धीरे-धीरे समझाया जाता है। थोड़ी जोर-ज़बरदस्ती की जाती है। तब कहीं वह हिचकिचाते हुए सहमति देती है। उस महिला को अपनों की ही भीड़ में एक मित्र, शुभचिंतक भी ऐसा नहीं मिलता, जो उसे उसकी सुरक्षा करने का मशविरा दे।… विधवा औरत को इस विषय पर सोचने-विचारने का मौका मिले, इससे पहले ही वह जला दी जाती है।… पूरा गाँव उसे नदी किनारे तक ले जाने में मदद करते हुए दिखता है। साथ ही, उसे पति की चिता पर बिठाने में भी।”

(जारी…..)

अनुवाद : नीलेश द्विवेदी 
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(नोट : ‘ब्रिटिश भारत’ पुस्तक प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से जल्द ही प्रकाशित हो रही है। इसके कॉपीराइट पूरी तरह प्रभात प्रकाशन के पास सुरक्षित हैं। ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ श्रृंखला के अन्तर्गत प्रभात प्रकाशन की लिखित अनुमति से #अपनीडिजिटलडायरी पर इस पुस्तक के प्रसंग प्रकाशित किए जा रहे हैं। देश, समाज, साहित्य, संस्कृति, के प्रति डायरी के सरोकार की वज़ह से। बिना अनुमति इन किस्सों/प्रसंगों का किसी भी तरह से इस्तेमाल सम्बन्धित पक्ष पर कानूनी कार्यवाही का आधार बन सकता है।)
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पिछली कड़ियाँ : 
27. अंग्रेज भारत में दास प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुप्रथाएँ रोक क्यों नहीं सके?
26. ब्रिटिश काल में भारतीय कारोबारियों का पहला संगठन कब बना?
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24. अंग्रेजों ने ज़मीन और खेती से जुड़े जो नवाचार किए, उसके नुकसान क्या हुए?
23. ‘रैयतवाड़ी व्यवस्था’ किस तरह ‘स्थायी बन्दोबस्त’ से अलग थी?
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21: अंग्रेजों की विधि-संहिता में ‘फौज़दारी कानून’ किस धर्म से प्रेरित था?
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