शिवाजी ‘महाराज’ : जब ‘शक्तिशाली’ पुरन्दरगढ़ पर चढ़ आए ‘अजेय’ मिर्जा राजा

बाबा साहब पुरन्दरे द्वारा लिखित और ‘महाराज’ शीर्षक से हिन्दी में प्रकाशित पुस्तक से

मिर्जा राजा जयसिंह। राजस्थान के आमेर के महाराजा थे। बहुत बहादुर। बड़े कूटनीतिज्ञ भी। आठ साल की उमर में वह मुगल सम्राट जहाँगीर के सरदार की हैसियत से फौज में दाखिल हुए (जन्म सन् 1606)। इस तरह बादशाह की खिदमत की सीख उन्हें घुट्‌टी में ही पिलाई गई थी। जबकि महाराज शिवाजी राजे को इसी उमर में बादशाह से बगावत करने की शिक्षा मिली थी। इस समय (सन् 1665) मिर्जा राजा 56 साल के थे। लगातार 47 साल उन्होंने दिल्ली दरबार की बहुत वफादारी से चाकरी की थी। उन्होंने अनगिनत लड़ाइयाँ लड़ी थीं। हर कहीं उन्हें जीत ही जीत मिली थी। वह सुशील थे। धार्मिक प्रवृत्ति के थे। कछवाह नामक अच्छे खानदान से वह आए थे।

आज तक कभी भी पराजय से पाला नहीं पड़ा था उनका। और इस बार उन्हें मुकाबला करना था, किसी के सामने कभी न झुकने वाले शिवाजी राजे से। हमेशा की तरह शिवाजी राजे पर भी विजय ही पानी थी। वरना उनकी साख ही मिट जाती। लेकिन इस मराठा को जीतना इतना आसान न था। मिर्जा राजा जानते थे कि कोशिशों में कहीं कोई कमी नहीं आनी चाहिए। इसीलिए सैनिकी सामर्थ्य के साथ ईश्वरी कृपा के लिए वह लगातार धार्मिक अनुष्ठान भी कर रहे थे। अपने कुल के उपाध्याय को साथ ही लेते आए थे वह। मिर्जा राजा को सलाह दी गई थी, “देवी अनुष्ठान करो, तभी यश मिलेगा।” इसी के मुताबिक, उन्होंने कोटिचण्डी का होम-हवन तथा ग्यारह कोटि लिंगार्चन करने का संकल्प किया था। बगलामुखी कालरात्रि देवी का जाप एवं अनुष्ठान भी उन्होंने किया था।

मराठों के राज्य में घुसकर मराठों के घर-बार उजाड़ने के लिए मिर्जा राजा ने कई फौजबन्द सरदारों को तैनात किया। मराठों का सर्वस्व और स्वराज्य आग की लपटों में झुलसने लगा। खुद मिर्जा राजा दिलेर खान के साथ पुणे से पुरन्दरगढ़ की तरफ चले (दिनांक 15 मार्च 1665)। सासवड़ पहुँचने में उन्हें 15 दिन लगे। पुरन्दर की तलहटी में मुगल फौज पहुँच गई (दिनांक 31 मार्च 1665)। अब दिलेर खान मोर्चाबन्दी करने में व्यस्त हो गया। वह पुरन्दरगढ़ को अपनी मुट्ठी में कर लेने को आतुर था। इसलिए मुस्तैदी से अपनी फौज को जगह-जगह तैनात कर रहा था।

पुरन्दर की तलहटी में मुगलों की अजस्त्र सेना फैली थी। दूर-दूर तक सफेद खेमे शामियाने, घुड़सवार, सांडनीस्वार, बड़ी-बड़ी तोपें, हाथी और पैदल सिपाही दिखाई दे रहे थे। पुरन्दर पर बहुत ही जबर्दस्त संकट आ गया था। आज तक के सारे संकटों से बड़ा। लेकिन पुरन्दर और मराठा सिपाही उसे देखकर जरा भी नहीं डरे। वे तो उसी अकड़ से खड़े थे मानो ऐसे संकटों को गले लगाना उनका रोज का खेल हो।

पुरन्दरगढ़ महाराष्ट्र का प्रख्यात किला है। कन्हा और नीरा नदी की घाटियों पर हुकूमत चलानी हो, तो पुरन्दर पर काबू होना निहायत जरूरी है। यह गढ़ खड़ा है सासवड़ की दक्षिण में तीन कोस पर तथा शिरवल की उत्तर में तीन कोस पर। इसका विस्तार बहुत बड़ा है। एक ही ऊँचे पहाड़ पर। नीचे से ऊपर तक की ऊँचाई 2500 फुट। दो किले बनाए गए हैं। एक का नाम है वज्रगढ़। दूसरे का पुरन्दरगढ़। इन जुड़वाँ किलों के दरमियान एक दर्रा है। दरें का नाम है भैरवखिंड। यह भैरवगढ़ तलहटी से 2100 फुट की ऊँचाई पर है। वज्रगढ़ छोटा है और उसके अनुपात में पुरन्दर बहुत बड़ा।

पुरन्दर किले के घेरे में एक छोटा अन्दरूनी किला है। यह दर्रे से 400 फुट की ऊँचाई पर है। इस अन्दरूनी छोटे किले में जाने के लिए दो दरवाजे हैं। एक है उत्तर की तरफ। पहाड़ी चट्‌टान पर से माता लक्ष्मी के मन्दिर तक जाने वाली राह पर। नाम है सर दरवाजा। दूसरा दरवाजा दक्षिण की तरफ है। उसका नाम है फत्ते अथवा केदार दरवाजा। अन्दरूनी किले के दरवाजे तथा चारदीवारियाँ बहुत ही मजबूत हैं। पुरन्दर के मचान पर भी उत्तर दिशा में एक भव्य ‘बिनी का’ यानी अघाड़ी का दरवाजा है। इसके तीन मशहूर बुर्ज हैं। फत्ते बुर्ज, शेंदन्या बुर्ज और कड़ेलोट बुर्ज। ये तीनों मर्दानी अकड़ में खड़े हैं।

इस जानलेवा कगार पर से गुनहगारों को सजा के तौर पर नीचे गिरा दिया जाता था। वैसे नीचे का गहरा दर्रा देखकर ही दिल दहल जाता है। बताते हैं, शेंदर्या बुर्ज को बहुत कठिन स्थान पर बाँधा जा रहा था। बँधा हुआ बुर्ज बार-बार ढहा जा रहा था। तब निजामशाही अमल में, हुजूर के हुक्म से एक दम्पति को यहाँ जिन्दा गाड़ दिया गया था। उनकी बलि चढ़ा दी गई थी। दम्पति गढ़ की तलहटी के चिलेवाड़ी गाँव के थे। इसके बाद बुर्ज बनकर तैयार हो गया। फौलाद की तरह मजबूत हो गया। इस बुर्ज का दूसरा नाम ‘यशवन्त राव’ भी है।

पुरन्दर का अन्दरूनी किला सुरक्षा की दृष्टि से बहुत पुख्ता है। इसके केदार और सर ये दोनों ही दरवाजे जवाँमर्द हैं। मुगली घेरे में (दिनांक 31 मार्च से 11 जून 1665 तक) इन दोनों ही दरवाजों ने शक्तिशाली मुगलों को काफी देर तक बाहर ही रोके रखा था। मचान पर भैरवदर्रे की पश्चिम में सफेद और काला ये दो बुलन्द बुर्ज थे। आज वे मौजूद नहीं हैं। लेकिन मुगली युद्ध में इन्होंने भी बड़ी बहादुरी दिखाई। गढ़ बहुत बहादुर था। ‘पुरन्दर’ का मतलब है इन्द्र। सम्भाजी राजे का जन्म इसी किले पर हुआ था (दिनांक 14 मई 1657)|

पुरन्दरगढ़ के चारों तरफ छोटे-छोटे देहात और बस्तियाँ बिखरी हुई थी। बान्दलवाड़ी, बेतालवाड़ी, चिव्हेवाड़ी, कालरी और भी कई देहात। गढ़ पर तैनात मराठा सिपाहियों के घर-परिवार इन्हीं देहातों में रहते थे। इन देहातों ने स्वराज्य के लिए लड़ने वाले कई दबंग सिपाही दिए थे।
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(नोट : यह श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी पर डायरी के विशिष्ट सरोकारों के तहत प्रकाशित की जा रही है। छत्रपति शिवाजी के जीवन पर ‘जाणता राजा’ जैसा मशहूर नाटक लिखने और निर्देशित करने वाले महाराष्ट्र के विख्यात नाटककार, इतिहासकार बाबा साहब पुरन्दरे ने एक किताब भी लिखी है। हिन्दी में ‘महाराज’ के नाम से प्रकाशित इस क़िताब में छत्रपति शिवाजी के जीवन-चरित्र को उकेरतीं छोटी-छोटी कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ उसी पुस्तक से ली गईं हैं। इन्हें श्रृंखला के रूप में प्रकाशित करने का उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि पुरन्दरे जी ने जीवनभर शिवाजी महाराज के जीवन-चरित्र को सामने लाने का जो अथक प्रयास किया, उसकी कुछ जानकारी #अपनीडिजिटलडायरी के पाठकों तक भी पहुँचे। इस सामग्री पर #अपनीडिजिटलडायरी किसी तरह के कॉपीराइट का दावा नहीं करती। इससे सम्बन्धित सभी अधिकार बाबा साहब पुरन्दरे और उनके द्वारा प्राधिकृत लोगों के पास सुरक्षित हैं।) 
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शिवाजी ‘महाराज’ श्रृंखला की पिछली 20 कड़ियाँ 
32- शिवाजी ‘महाराज’ : सिन्धुदुर्ग यानी आदिलशाही और फिरंगियों को शिवाजी की सीधी चुनौती
31- शिवाजी महाराज : जब शिवाजी ने अपनी आऊसाहब को स्वर्ण से तौल दिया
30-शिवाजी महाराज : “माँसाहब, मत जाइए। आप मेरी खातिर यह निश्चय छोड़ दीजिए”
29- शिवाजी महाराज : आखिर क्यों शिवाजी की सेना ने तीन दिन तक सूरत में लूट मचाई?
28- शिवाजी महाराज : जब शाइस्ता खान की उँगलियाँ कटीं, पर जान बची और लाखों पाए
27- शिवाजी महाराज : “उखाड़ दो टाल इनके और बन्द करो इन्हें किले में!”
26- शिवाजी महाराज : कौन था जो ‘सिर सलामत तो पगड़ी पचास’ कहते हुए भागा था?
25- शिवाजी महाराज : शिवाजी ‘महाराज’ : एक ‘इस्लामाबाद’ महाराष्ट्र में भी, जानते हैं कहाँ?
24- शिवाजी महाराज : अपने बलिदान से एक दर्रे को पावन कर गए बाजीप्रभु देशपांडे
23- शिवाजी महाराज :.. और सिद्दी जौहर का घेरा तोड़ शिवाजी विशालगढ़ की तरफ निकल भागे
22- शिवाजी महाराज : शिवाजी ने सिद्दी जौहर से ‘बिना शर्त शरणागति’ क्यों माँगी?
21- शिवाजी महाराज : जब 60 साल की जिजाऊ साहब खुद मोर्चे पर निकलने काे तैयार हो गईं
20-  शिवाजी महाराज : खान का कटा हुआ सिर देखकर आऊसाहब का कलेजा ठंडा हुआ
19- शिवाजी महाराज : लड़ाइयाँ ऐसे ही निष्ठावान् सरदारों, सिपाहियों के बलबूते पर जीती जाती हैं
18- शिवाजी महाराज : शिवाजी राजे ने जब अफजल खान के खून से होली खेली!
17- शिवाजी महाराज : शाही तख्त के सामने बीड़ा रखा था, दरबार चित्र की भाँति निस्तब्ध था
16- शिवाजी ‘महाराज’ : राजे को तलवार बहुत पसन्द आई, आगे इसी को उन्होंने नाम दिया ‘भवानी’
15- शिवाजी महाराज : कमजोर को कोई नहीं पूछता, सो उठो! शक्ति की उपासना करो
14- शिवाजी महाराज : बोलो “क्या चाहिए तुम्हें? तुम्हारा सुहाग या स्वराज्य?
13- शिवाजी ‘महाराज’ : “दगाबाज लोग दगा करने से पहले बहुत ज्यादा मुहब्बत जताते हैं”

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Neelesh Dwivedi

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