किसी के भी अतीत में जाएँगे तो कीचड़ के सिवा कुछ नहीं मिलेगा

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 23/10/2021

किसी के भी अतीत में जाएँगे तो कीचड़ के सिवा कुछ भी नहीं मिलेगा। मेरे से लेकर तुम्हारे अतीत तक इतना कीचड़ है कि हम यह पूरी धरती 10 बार ढाँक सकते हैं। इसलिए बस वर्तमान में रहें, जब भी किसी से मिलें मुस्कुरा दें- अपना और उसका वही चेहरा ज़ेहन में रहे, जो अभी साँस ले रहा है। थोड़ा भी दिमाग़ पर जोर डालेंगे तो दिक्क़त होगी। 

हम सब एक-दूसरे के व्यवहार से परेशान हैं। हम सबके पास एक-दूसरे के व्यवहार के दर्जनों किस्से हैं। ख़राब, उपेक्षा, जली-कटी बातों के घाव नासूर की तरह भीतर ज़िन्दा हैं। हमारे पास कहने को बहुत है, सुनने को कुछ नहीं। जबकि ज़रूरत ये है कि जब भी किसी से मिलें-जुलें, मान लें कि यह पहली और आख़िरी मुलाकात है। इसके बाद कभी नहीं मिलेंगे। इसलिए बस मिल लें, कुछ कहना हो तो जज़्ब कर लें। सुनना हो तो यूँ सुनें, जैसे चींटी की कही चींटी सुन लेती है। यन्त्रवत् और आगे बढ़ जाती है। 

हम सबको दूसरों से शिकायतें हैं। इतनी कि गिनती नहीं है। पर रुकिए आपसे भी सबको असंख्य शिकायतें है। हम सबको एक-दूसरे से इतनी शिकायतें है कि हम अगले हजार जन्मों तक उन शिकायतों को प्रत्यक्ष कह-सुन नहीं पाएँगे। यह मनुष्यगत कमजोरियाँ हैं। मुझ में, आप में, हम सब में हैं। मैं तो नहीं बच पाया इन मनुष्यगत कमजोरियों से, आप बच सकें तो बच जाएँ। शायद जीवन का उद्धार हो जाए। 

हम तर्कवान हैं पर बुद्धिहीन एवं परपीड़क भी। इसी में जीवन का सर्वाधिक समय जाया करते हैं। सारी ऊर्जा और ताक़त दूसरों को ओछा और बेवकूफ़ साबित करने में लगा देते हैं। अपने दिन का दोगुना यानि 48 घंटे हम षड्यंत्र रचते हैं। कुतर्क की नैया पर खेवैया बनकर भवसागर पार करना चाहते हैं। यह स्वाभाविक है क्योंकि हमें बचपन से सिखाया गया है कि हम जानवर से श्रेष्ठ हैं। पर कभी अपने भीतर के जानवर को ही देख समझ लें और पशुवृत्ति अपना लें तो सम्भवतः मनुष्येत्तर मनुष्य बन जाएँगे। 

वस्तुतः हम समावेशी नहीं हैं। हम अवसाद में रहते हैं क्योंकि हर समावेश हमारी आरामतलबी को चोट देता है। हमसे सवाल करता है। भिन्न प्रकार से सोचने को मज़बूर करता है। बदलाव अपनाने की बात करता है और हम इस सबसे बचना चाहते हैं। 

हम करना चाहते हैं – प्रयोग, नवाचार, या आविष्कार परन्तु किसी बन्धन में बँधना नहीं चाहते क्योंकि इसमें नियमितता है। यह सख़्त अनुशासन और प्रतिबद्धता की माँग करता है। जबकि मनुष्य मूल रूप से इतनी जल्दी उकता जाता है कि अपने एक विचार, एक सत्य से कि उस पर सेकेंड भी क़ायम नहीं रह पाता। कुछ अलग, कुछ नया करने के ज़ूनून में खपा देता है हर बार अपने को। चिन्ता यहीं से शुरू होती है। माया के संग मस्त रहकर मोह त्यागना चाहता है। एक पत्नी व्रत लेने के बाद भी चार-पाँच सम्बन्ध बनाकर भी उसकी भूख शान्त नहीं होती। 

इसलिए हम थोपते हैं। इसलिए समाज में जाति से लेकर विभिन्न ढाँचे बने रहते हैं। ऊँच-नीच, अमीर-ग़रीब की विभेदक रेखा हर बार वृहत्तर और भव्य स्वरुप में बढ़ती जाती है। हम सब यही चाहते हैं। यही हमारा प्रारब्ध भी है। 

हम सुधरना नहीं चाहते। हम मनुष्य बनकर मनुष्यता को नष्ट करने के नित नए औज़ार खोजते हैं। उन्हें पैना करते हैं। फिर एक दिन अपने को पाक-साफ करके अमर हो जाना चाहते हैं। इसलिए कि कोई हमारे बारे में, हमारे भले चेहरे और सद्कर्मों के बारे में दो घड़ी ठहरकर बोले। 

हमें क्यों सम्बन्धों के जाल में फँसना चाहिए?

(संदीप जी स्वतंत्र लेखक हैं। यह लेख उनकी ‘एकांत की अकुलाहट’ श्रृंखला की 33वीं कड़ी है। #अपनीडिजिटलडायरी की टीम को प्रोत्साहन देने के लिए उन्होंने इस श्रृंखला के सभी लेख अपनी स्वेच्छा से, सहर्ष उपलब्ध कराए हैं। वह भी बिना कोई पारिश्रमिक लिए। इस मायने में उनके निजी अनुभवों/विचारों की यह पठनीय श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी की टीम के लिए पहली कमाई की तरह है। अपने पाठकों और सहभागियों को लगातार स्वस्थ, रोचक, प्रेरक, सरोकार से भरी पठनीय सामग्री उपलब्ध कराने का लक्ष्य लेकर सतत् प्रयास कर रही ‘डायरी’ टीम इसके लिए संदीप जी की आभारी है।) 
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इस श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ  ये रहीं :  
32वीं कड़ी : आधा-अधूरा रह जाना एक सच्चाई है, वह भी दर्शनीय हो सकती है
31वीं कड़ी : लगातार भारहीन होते जाना ही जीवन है
30वीं कड़ी : महामारी सिर्फ वह नहीं जो दिखाई दे रही है!
29वीं कड़ी : देखना सहज है, उसे भीतर उतार पाना विलक्षण, जिसने यह साध लिया वह…
28वीं कड़ी : पहचान खोना अभेद्य किले को जीतने सा है!
27वीं कड़ी :  पूर्णता ही ख़ोख़लेपन का सर्वोच्च और अनन्तिम सत्य है!
26वीं कड़ी : अधूरापन जीवन है और पूर्णता एक कल्पना!
25वीं कड़ी : हम जितने वाचाल, बहिर्मुखी होते हैं, अन्दर से उतने एकाकी, दुखी भी
24वीं कड़ी : अपने पिंजरे हमें ख़ुद ही तोड़ने होंगे
23वीं कड़ी : बड़ा दिल होने से जीवन लम्बा हो जाएगा, यह निश्चित नहीं है
22वीं कड़ी : जो जीवन को जितनी जल्दी समझ जाएगा, मर जाएगा 
21वीं कड़ी : लम्बी दूरी तय करनी हो तो सिर पर कम वज़न रखकर चलो 
20वीं कड़ी : हम सब कहीं न कही ग़लत हैं 
19वीं कड़ी : प्रकृति अपनी लय में जो चाहती है, हमें बनाकर ही छोड़ती है, हम चाहे जो कर लें! 
18वीं कड़ी : जो सहज और सरल है वही यह जंग भी जीत पाएगा 
17वीं कड़ी : विस्मृति बड़ी नेमत है और एक दिन मैं भी भुला ही दिया जाऊँगा! 
16वीं कड़ी : बता नीलकंठ, इस गरल विष का रहस्य क्या है? 
15वीं कड़ी : दूर कहीं पदचाप सुनाई देते हैं…‘वा घर सबसे न्यारा’ .. 
14वीं कड़ी : बाबू , तुम्हारा खून बहुत अलग है, इंसानों का खून नहीं है… 
13वीं कड़ी : रास्ते की धूप में ख़ुद ही चलना पड़ता है, निर्जन पथ पर अकेले ही निकलना होगा 
12वीं कड़ी : बीती जा रही है सबकी उमर पर हम मानने को तैयार ही नहीं हैं 
11वीं कड़ी : लगता है, हम सब एक टाइटैनिक में इस समय सवार हैं और जहाज डूब रहा है 
10वीं कड़ी : लगता है, अपना खाने-पीने का कोटा खत्म हो गया है! 
नौवीं कड़ी : मैं थककर मौत का इन्तज़ार नहीं करना चाहता… 
आठवीं कड़ी : गुरुदेव कहते हैं, ‘एकला चलो रे’ और मैं एकला चलता रहा, चलता रहा… 
सातवीं कड़ी : स्मृतियों के धागे से वक़्त को पकड़ता हूँ, ताकि पिंजर से आत्मा के निकलने का नाद गूँजे 
छठी कड़ीः आज मैं मुआफ़ी माँगने पलटकर पीछे आया हूँ, मुझे मुआफ़ कर दो  
पांचवीं कड़ीः ‘मत कर तू अभिमान’ सिर्फ गाने से या कहने से नहीं चलेगा! 
चौथी कड़ीः रातभर नदी के बहते पानी में पाँव डालकर बैठे रहना…फिर याद आता उसे अपना कमरा 
तीसरी कड़ीः काश, चाँद की आभा भी नीली होती, सितारे भी और अंधेरा भी नीला हो जाता! 
दूसरी कड़ीः जब कोई विमान अपने ताकतवर पंखों से चीरता हुआ इसके भीतर पहुँच जाता है तो… 
पहली कड़ीः किसी ने पूछा कि पेड़ का रंग कैसा हो, तो मैंने बहुत सोचकर देर से जवाब दिया- नीला!

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