वास्तव में पहलगाम आतंकी हमले का असल जिम्मेदार है कौन?

समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश

पहलगाम की खूबसूरत वादियों के नजारे देखने आए यात्रियों पर नृशंसता से गोलीबारी कर कत्लेआम किया गया है। इसमें 26 लोगों को जानें गईं। लेकिन यह हमला अप्रत्याशित नहीं था। इससे बस यही साबित हुआ कि अमन-शान्ति के हमारे खयाल कितने बेमानी हैं। लेकिन ऐसी हरकत को अंजाम देने वाले मोमिनों को क्या यह आसान या कुदरती रहा होगा? यह कत्लेआम किस जहनियत से आता है, यह सवाल बेहद अहम है। शायद इसीलिए यह सबको भीतर तक उद्वेलित करता है। फौरी प्रतिक्रिया तो रोष और प्रतिरोध की आती है। जहाँ बात सुने, वहीं पाकिस्तान को गालियाँ और इस्लाम को सारे हिंसाचार की जड़ बताने की होड़ सी चल पड़ी है। लेकिन ये यह सब बेहद सतही है। सो आइए, थोड़ी गहराई से तलाशे कि ऐसे घटनाक्रम की जवाबदेही कहाँ आन टिकती है।

जिन असलहा-हथियारों ने बेकसूर लोगों की जान ली, उन बन्दूक और गाेलियों की अपनी कोई चेतना तो है नहीं? कत्लेआम को अंजाम देने वाले आततायी तो इंसान ही है। उनके नजरिए से देखें तो उनके पास हिंसा करने के ठोस कारण हैं। इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि कत्लेआम करने वाले जंगली, पागल या यूँ ही दहशतगर्द हैं। उनके पास सियासी-कौमी तकरीरे हैं। ऐसी हरकतों के लिए खास नजरिया या ठोस मजहबी रजामन्दी भी है। वे अपनी सोच और ईमान के पक्के हैं। इससे सवाल उठता है कि क्या आततायियों के दिमाग में ऐसी विचारधारा डालने वाले लोग इस घटना जिम्मेदार हैं? या ऐसे विचारक या मसीहा, जो सियासी, कौमी-मजहबी या नैतिकता के तकाजे पर दूसरों के प्रति हिंसा काे जायज करार देते हैं? या फिर ऐसे इल्मयाफ्ता, जो जाहिलों की ताकत का इस्तेमाल अपनी जेब और खजाने भरने के लिए करते है? मेरी नजर में इन सवालों से भी पूरा जवाब नहीं मिलने वाला। क्योंकि हर समूह तंत्र अपने हितों के लिए कुछ ऐसा करता ही है, जो दूसरों के हितों के खिलाफ होता है। 

तो फिर प्रश्न यक्ष बनकर बैठा दिखता है कि ऐसे घटनाक्रम के लिए वास्तव में जिम्मेदार कौन है? हमारा यह मानना है कि भारत जैसे देश में ऐसी घटना के लिए औपनिवेशिकता से पैदा हुआ तमस (अन्धेरा) जिम्मेदार है। वही असल दोषी है। यह तमस है, जिसने भारत के श्रेष्ठ नैतिक सामाजिक मूल्यों के संवाहकों को हाशिए पर पहुँचा दिया है। परिणामस्वरूप आम भारतीय अपनी निजी साभ्यतिक दृष्टि से सत्य को देखने और उसके आलोक में सही निर्णय लेने में असमर्थ है। संवैधानिक सोच, न्यायिकता, भोगवादी शिक्षा के माध्यम से यह तमस हमारे मानस और चरित्र में उतर आया है। सूक्ष्म, छद्म उदात्तवादी नैतिकता के मुखौटे के रूप में यह तमस अदालतों और सत्ता के गलियारों में प्रबल है।

औपनिवेशिक लूट को सरल और सहज बनाने के लिए अस्तित्व में आए अदालतों को देखें। न्याय के पुतले-और कारिन्दे निर्लज्जता से न्याय का प्रहसन करते हुए आततायियों के लिए रात के अन्धेरे और दिन के उजाले में विद्रूप बहसें करते पाए जाते हैं। राष्ट्र द्वारा प्रदत्त वृहद सुरक्षा व्यवस्था, पैसा और सत्ता को उपभोग करने वाले ये बाबू-अफसर बौद्धिक और नीतिगत स्तर पर भारत के हितों की तिजारत करते हैं। दो कौड़ी के भोगों के लिए विदेशी संस्थान और संगठनों के लाभ के लिए लिए देश के हित बेचने की फिराक में बैठे रहते हैं। महजबी बुनियाद पर गुनाह करने वालों को अपराधबोध से मुक्त करने के लिए पारम्परिक इतिहास की चोरी करते हैं। उसके बारे में झूठ फैलाते हैं।

इस तमस के खिलाफ कोई रुख अख्तियार न कर हम संविधान और न्यायिक व्यवस्था के नाम पर तमाम आततायियों को संरक्षण देते हैं। फिर अपेक्षा करते हैं कि हमारे हितों के लिए सरकार या कोई और लड़े। यह तमस है, जाे उन भटके हुए आततायियों को सन्देश दे रहा होता है कि लूट-खसोट, बलात्कार और हत्याएँ न सिर्फ जायज हैं, बल्कि इसकी कोई कीमत भी नहीं चुकानी पड़ती। पहलगाम में हिंसा के लिए आमंत्रण पत्र हमारे अदालती तंत्र ने दिया है। उस कपटी नैतिकता ने दिया है, जिसने यथार्थ सत्य और न्याय तवज्जो नहीं है। याद रखिए, जब हम अपने तात्कालिक क्षुद्र हितों के लिए सत्य, न्याय और नीति के साथ दगाबाजी करते हैं, तब अपने प्रतिरक्षा के अधिकार को भी त्याग रहे होते हैं। तमस से कमजोर हुई हमारी फितरत ही पहलगाम के कत्लेआम घटना की कारक है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से पाकिस्तान को नेस्तनाबूत करने या गैर-मोमिनो के खिलाफ इस्लाम के रूख को गरियाने से पहले हमें यह सोचने की जरूरत है कि हम कब भोग, सुरक्षा और मोह को त्याग कर सत्य और नैतिकता के पक्ष में खड़े होने के लिए तैयार होंगे? 

—-

(नोट : समीर #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सुधी-सदस्यों में से एक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि हैं। विशेष रूप से धर्म-कर्म और वैश्विक मामलों पर वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ, व्यंग्य आदि भी लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं। समीर ने सनातन धर्म, संस्कृति, परम्परा पर हाल ही में डायरी पर सात कड़ियों की अपनी पहली श्रृंखला भी लिखी है।) 

—– 

समीर के पिछले लेख 

6- आधुनिक विज्ञान तात्कालिक फायदों के साथ विकृतियाँ भी देता है, पढ़िए कैसे!
(मानव स्वास्थ्य और विज्ञान श्रृंखला-अन्तिम भाग)
5- स्वस्थ जीवन को लेकर विज्ञान की दृष्टि अपूर्ण, इसमें सुधार जरूरी  (
मानव स्वास्थ्य और विज्ञान श्रृंखला-दूसरा भाग)
4- सरल नैसर्गिक जीवन मतलब अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी!
(मानव स्वास्थ्य और विज्ञान श्रृंखला-पहला भाग)
3- सवाल है कि 21वीं सदी में भारत को भारतीय मूल्यों के साथ कौन लेकर जाएगा?
2 – यू्क्रेन-रूस युद्ध का पटाक्षेप कैसे विश्व इतिहास का अप्रत्याशित मोड़ बनने वाला है?
1 – भारत को भी अब शिद्दत से ‘अपना भारतीय एलन मस्क’ चाहिए, है कोई?

सोशल मीडिया पर शेयर करें
From Visitor

Share
Published by
From Visitor

Recent Posts

56 साल के ‘युवा’ सत्ता के लिए आग भड़का रहे और 28 साल के देश को नई ऊँचाई दे रहे!

अभी सोमवार, 20 जुलाई को संसद का मॉनसून सत्र शुरू हुआ। इससे कुछ समय पहले… Read More

4 hours ago

वंदेमातरम

जय जय श्री राधे Read More

1 day ago

‘सरल भक्तमाल’- 11..: तर्क कोई कितने भी दे, वैष्णव भक्ति के मूल सम्प्रदाय तो चार ही हैं!

कलि युग में भक्ति मार्ग पाखण्ड से घिरा रहता है, इसलिए भगवान के भजन-पूजन, नाम… Read More

3 days ago

फिल्म ‘थ्री इडियट’ के फुनसुक वाँगड़ू नहीं हैं सोनम वाँगचुक, फिर भी ऐसा प्रचार क्यों?

शिक्षा प्रणाली में मूलभूत सुधार और केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की माँग… Read More

4 days ago

केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मण्डल ने अंग्रेजी को ‘विदेशी भाषा’ कह दिया, तो हाय-तौबा क्यों?

भाषा को लेकर बेवजह की हाय-तौबा मची हुई इन दिनों। वजह वही, पीढ़ियों से भारतीय… Read More

5 days ago

जिन्हें सच्ची खुशी की तलाश, वे आईआईटी प्रवेश परीक्षा में जानबूझकर फेल भी हो जाते हैं!

जिन्दगी अपनी है, चुनाव भी अपने ही होते हैं। ऐसा अक्सर कहा जाता है। लेकिन… Read More

6 days ago